माया का मालकौंस, कवित्वपूर्ण अहसास दिलाते फिल्मी गीतों को परखती एक किताब

फिल्मी गीत संगीत पर पहले भी पुस्तकें आई हैं... धुनों की यात्रा आदि. पर 'माया का मालकौंस' ऐसी पहली किताब है जो बड़े सुचिंतित अंदाज में गीत के साथ कभी-कभी उस पूरी फिल्म के इतिहास को उद्घाटित कर बैठती है, जिसमें उस गीत को पिरोया गया है.

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डॉ ओम निश्चलनई दिल्ली, 16 July 2019
माया का मालकौंस, कवित्वपूर्ण अहसास दिलाते फिल्मी गीतों को परखती एक किताब पुस्तक 'माया का मालकौंस' का कवर [सौजन्यः यश पब्लिकेशंस]

कभी गुलजार ने अपने फिल्मी गीतों के एक संग्रह में एक गीत को लिखने के पीछे की उधेड़बुन को गहराई से टांका था. गीत था: 'मोरा गोरा अंग लइले. मोहे श्याम रंग दइ दे'. गीत की रचना कैसे हुई, किस परिवेश में हुई. इस गीत में क्या कुछ तब्दीलियां हुईं. कैसे यह अपने अंतिम रूप में गाया और फिल्माया गया, गुलजार ने बहुत खूबी से इसकी कहानी बयान की है. गीत ऐसे ही बनता है. खास तौर पर फिल्मी दुनिया में.

एक वक्त था, लोग गीत लिखते थे और उसे उपयुक्त सीन में फिल्माया जाता था. फिर कहानी पर आधारित दृश्य पर आधारित गीत लिखे जाने लगे. फिर किसी खास दृश्य के लिए जो गीत लिखा जाने वाला है उसकी क्या धुन होगी, किस राग में वह उपनिबद्ध होगा, इसे ध्या‍न में रख कर गीत लिखवाए जाने लगे. सिद्ध गीतकार या शायर के लिए यह कोई कठिनाई की बात नहीं है. वह कल्पयना मुक्त उड़ान न भर कर निर्दिष्ट दृश्य, थीम, राग व रागिनी का अनुसरण करते हुए गीत लिखेगा. पर गीत में प्राण भरने वाले तत्वों में केवल गीत या गीतकार की भूमिका ही नहीं है. उसके संगीतकार की भी उसमें बड़ी भूमिका है. गीत को जब संगीत की लय ताल पर ढाल कर गाया जाता है, तो उस गीत की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाती है. वह बोल उठता है. तभी शुष्क से शुष्क हृदय में भी गीतों की एक रागिनी बजती रहती है.

अभी हाल ही में फिल्मी गीतों पर सुपरिचित युवा कवि सुशोभित शक्तावत की 'माया का मालकौंस' नाम से पुस्तक आई है, जिसमें उन्होंने लोकप्रिय फिल्म गीतों की विवेचना की है. उस गीत की विशेषता, गीतकार की विशेषता, संगीतकार, लय, राग, बोल, बनावट, मुरकी आदि पर बातें की हैं तथा गीत की लोकप्रियता व कर्णप्रियता पर भी चिंतन किया है.

एक कवि, खास तौर पर सुशोभित जैसा युवा कवि जिनके दो संग्रह 'मलयगिरि का प्रेत' और 'मैं बनूंगा गुलमोहर' अभी हाल ही में आए हों तथा वह शुद्ध काव्यानुभूति का कवि हो, वह जब फिल्मी गीतों या लिरिक्स पर लिखता है, तो वह केवल गीतों का काव्यगत वैशिष्ट्य नहीं होता, वह उसकी पूरी सांगीतिक संरचना, दृश्यांकन, अर्थ निष्पत्ति, साज़, संगतकार के सहमेल से फिल्माए गए गीत पर अनुचिंतन और विवेचन होता है और तब लगता है विवेचक केवल साहित्यिक वैशिष्ट्य का प्रेक्षक नहीं है, वह किसी फिल्म में गीत की पूरी संगति असंगति, प्रस्तुततीकरण, तुक ताल का पूरा निरूपण होता है.

फिल्मी गीत संगीत पर पहले भी पुस्तकें आई हैं... धुनों की यात्रा आदि. पर 'माया का मालकौंस' ऐसी पहली किताब है जो बड़े सुचिंतित अंदाज में गीत के साथ कभी-कभी उस पूरी फिल्म के इतिहास को उद्घाटित कर बैठती है, जिसमें उस गीत को पिरोया गया है. इस क्रम में कभी-कभी संगीत देने वाले संगीतकार की पूरी संगीत यात्रा का ही उद्घाटन हो जाता है.

49 गीतों के इस अनुचिंतन विवेचन में सुशोभित ने वे सारे लोकप्रिय धुनों वाले गीत लिए हैं जिन्हें अक्सर लोगों ने केवल सुना ही नहीं, उन्हें पूरी शिद्दत से गाया और जिया है. आज कवियों की संजीदा पीढ़ी फिल्मी गीतों को लेकर नाक भौं सिकोड़ती है पर इन शुचिताग्रहों को परे झटकर कर अध्ययनशील सुशोभित ने गीत की पूरी वेदना-संवेदना और उल्लास में उतर कर उनका अवगाहन किया है और हमारे लिए मोती सरीखे तत्व खोज कर अपने छोटे-छोटे रम्य चर्चापरक आलेखों में उड़ेल दिया है.

पुस्तक में 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी', 'पिया बिना पिया बिना', 'ये दुनिया वाले पूछेंगे', 'जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे', 'जाने मन जाने मन, तेरे दो नयन', 'पंख होते तो उड़ आती रे', 'इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा', 'ऐ दिले नादां, तुम तो प्यार हो', 'ये रात भीगी भीगी', 'तुमको देखा तो ये ख्यात आया', 'कहां से आए बदरा', 'इस नदी को मेरा आईना मान लो', 'ये नयन डरे डरे', 'पिया बाज यक तिल जिया जाए ना', 'दिल है कि मानता नहीं', 'आओगे जब तुम ओ साजना अँगना फूल खिलेंगे', 'ऐ रंगरेज मेरे', 'मेरे रश्के क़मर' जैसे गीत शामिल हैं.

दिलीप कुमार और वैजयंती माला पर फिल्माए गए गीत 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी...' पर लिखते हुए वे इस गीत की मस्ती, आपसदारी, गायिकी, अदाकारी, तुकबंदी, दिलीप-बैजयंती की सुकूनदेह जोड़ी, साहिर की लाजवाब कर देने वाली अदायगी और ओपी नैयर की मौसिकी सबकी बात करते हैं और कहते हैं, ''नैयर मर गया, साहिर मर गया, रफ़ी मर गया, दिलीप कुमार बुड्ढा हो गया पके फल की तरह पर कमबख्त एक ये गीत ही है जो बूढ़ा होने नहीं पाता.'' गीत में तुक की क्या अहमियत होती है इसे गोरिये से मेरिये की तुक मिलाने की साहिर की दिल जीत लेने वाली कला से पहचाना जा सकता है. सुशोभित ने तमाम पहलुओं के साथ इसे खास तौर पर रेखांकित किया है.

मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे एक गीत 'पिया बिना पिया बिना...' की विवेचना करते हुए सुशोभित उचित ही लिखते हैं कि जिस तरह यश और प्रेम के द्वंद्व में डूबी स्त्री के मन को मथकर यह गीत मजरूह ने लिखा है, उसी अंतर्भाव के साथ लता ने इसे बर्मन के संगीत निर्देशन में भावप्रवणता के साथ गाया है. जब किसी फिल्म में एक गीत कामयाब होता है, तो केवल गीत नहीं, वे तमाम सरणियां और संगतियां कामयाब होती हैं, जिनसे गुजर कर गीत फिल्मों में धागे की तरह पिरोए गए होते हैं. जो वीणा की झंकृति की तरह कानों में मधुर रस घोलते हैं, अवसाद को भी जीने का एक स्पेस देते हैं.

'जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे...' शैलेंद्र के लिखे और सचिन देवबर्मन के संगीत निर्देशन में गाए इस गीत ने बंदिनी को एक दर्शनीय फिल्म बना दिया था. नूतन पर फिल्माए गए इस गीत को लता जी ने गाकर इसमें जीवन भर दिया है. इसके मीठे स्वराघात और इसके भीतर की अतुल्य मिठास की शहदीली छुवन पर तो सुशोभित का मन भी आ गया लगता है, तभी वे अपने कांप्लीमेंट्स में कहते हैं, ''ओह विमल दा, बंदिनी, सुजाता, देवदास, और मधुमती बना कर आपने हमें कितना-कितना निष्कवच बना दिया है.''

'सेहरा' से लिए गए गाने 'पंख होते तो पड़ आती रे...' कंठ से निकलते ही सुनने वाले के भीतर कुछ चिपकने सा लगता है. यह जो दिल का दाग़ न दिखला पाने की बेबसी है इसे किस तरह गाकर विचलित किया जा सकता है, इस के लिए सुशोभित लिखते हैं, ''यह तकरीर उन सभी के लिए जो अकेले में रोए हैं, जिनके आंसू किसी ने देखे नहीं, उसने भी नहीं, जिसके लिए गूँथा गया था मोतियों का वो हार.''

'सेहरा' का ही एक दूसरा गीत 'तुम तो प्यार हो...' रफी लता के युगल स्वरों में जिस तरह शहनाई व बांसुरी वादक रामलाल ने संगीत की धुन में बांधा है, वह हसरत जयपुरी के बोलों को जादुई बना देती है. पर तमाम विशेषताओं के बावजूद सुशोभित यह कहना नही भूलते कि साल 2007 में संगीत की यह अग्नि शलाका बंबई के किसी उपनगर में चुपचाप बुझ गयी और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई थी.

'चश्मे बद्दूर' के कई गीतों की चर्चा सुशोभित ने यहां की है. 'काली घोड़ी द्वार खड़ी', 'कहां से आए बदरा घुलता जाए कजरा' व' इस नदी को मेरा आईना मान लो' आदि. पर 'साथ-साथ' का यह गीत सुशोभित को दीप्ति और फारूख शेख की प्रणय आभा से मधुसिक्त जोड़ी के कारण अधिक महत्त्वपूर्ण लगता है. इस कवि पर कविवर मुक्तिबोध का प्रभाव ऐसा दृढ़तर है कि उन्हीं की शब्दावली को लेकर वह कहता है कि ''इस गीत में फारूख शेख ने एक अनिर्वचनीय सी अन्यमनस्कता को व्यक्त किया है, एक 'पीड़ित विवेक-चेतना' को कि जैसे दुष्प्राप्या की आत्महंता द्वैधा से वह गहरे गुँथा हुआ है.''

'चश्मे बद्दूर' के गाने 'कहां से आए बदरा...' में गुंथा हुआ विषाद राग ऐसा है कि विवेचक के शब्दों में, ''समय और स्पेस के सदियों और मीलों लंबे फासले पर होने के बावजूद हम उसे सुन लेते हैं.'' रोती हुई दीप्ति का हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लेना, सुनने वालों को भी भावप्रवण और वैराग्यदीप्तज बना देता है. इस गाने में दीप्ति के साथ फारूख नही, राकेश बेदी हैं. इसी फिल्मों से एक और गीत ''इस नदी को मेरा आईना मान लो'' भी लोकप्रिय गीतों में एक है, पर यह गीत बहुत खूबसूरत इसलिए भी है कि इस फिल्म में भी श्वेनतवसना दीप्तिे की नाजुकी है.

खैर, यह हर शख्स के अपने मिजाज़ पर निर्भर है कि वह किन गीतों को अपने तईं पसंद करता है. हर गीत सुनने वाले पर अलग अलग-असर करता है. सुशोभित एक कवि होने के साथ साथ कविता में जैसा मेटाफर, जैसे उपमेय व उपमान पसंद करते हैं, वह उनकी काव्याभिव्यक्ति के लिए जरूरी होता है. जिन गीतों में उनका मन रमा है , जिनमें उनके भावपूर्ण मिजाज की झलक मिलती है, जिन्हें वे जीवन, प्रेम, परस्परता के लिए अपरिहार्य मानते हैं. यहां उन गीतों के साथ उन्होंने जैसे एक सहयात्रा की है. एक गीत के साथ जुड़ी वे तमाम बातें ही सुनने पढने वालों को समृद्ध करती हैं. मोहनजोदड़ो फिल्म में एक गीत ''तू है मेरा ये संसार सारा...'' को खोलते हुए वे जो कहते हैं उसे यदि हम ध्यान से सुनें तो जैसे यह, यह मनुष्य, यह कामना, यह नश्ववरता सब कुछ हमारे भीतर बोल उठती है...
''प्रेम प्रागैतिहासिक होता है
कामना कांस्ययुगीन होती है.
हम अपनी चाहनाओं के अनवरत उपसंहार हैं, उनके क्रमिक फुटनोट्स. कामना प्रेतबाधा की तरह है, मृतकों के आहवान की तरह. वह हमारे भीतर के किसी विगत तत्व को पुकारती है और हमें और एक मरण के लिए न्योतती है..... कौन जाने हममें से कितने तब उस वक्त में उन अलक्षित प्रणयों में सम्मिलित सहभागी रहे हों. ये गीत, ये मायावी प्रसंग जाने-अनजाने हमारे भीतर, हमारे पिछले जन्मों की याद जगा जाते हों, कौन जाने.''

लोकप्रिय फिल्मी गीतों पर इसी कवित्वपूर्ण भाषा में लिखी ये सभी टिप्पणियां गाते-गुनगुनाते हुए गीत की जड़ों से फुनगियों तक की यात्रा करने जैसा अहसास देती हैं जिन्हें बांचते हुए या लिखते हुए लगता है, जैसे सुशोभित राग-विराग की किसी कविता श्रृंखला की रम्य उपत्यकाओं से गुजर रहे हैं.
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पुस्तकः माया का मालकौंस
लेखकः सुशोभित
विधाः फिल्म आलेख
प्रकाशकः यश पब्लिकेशंस
मूल्यः 175/ रुपए, पेपरबैक
पृष्ठ संख्याः 124

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित गीतकार, कवि, आलोचक एवं भाषाविद हैं. भाषा की खादी, शब्दों से गपशप सहित अनेक पुस्तकें प्रकाशित. उनसे इस पते पर संपर्क किया जा सकता है: जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, फोन 8447289976, मेल dromnishchal@gmail.com 

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