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जन्मदिन विशेषः अरुण माहेश्वरी की पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' का अंश

अरुण माहेश्वरी ने आर्थिक विषयों के सजग टिप्पणीकार और एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके द्वारा लिखी पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' का अंश

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 04 June 2019
जन्मदिन विशेषः अरुण माहेश्वरी की पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' का अंश पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' का कवर [ राजकमल प्रकाशन ]

अरुण माहेश्वरी ने आर्थिक विषयों के सजग टिप्पणीकार और एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. 4 जून, 1951 को जन्में माहेश्वरी ने अपनी शोधपरक वैचारिक पुस्तकों से काफी ख्याति अर्जित की. छात्र जीवन में मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आंदोलन से जुड़े अरुण कभी सीपीआई-एम के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से संबद्ध थे. उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का संपादन किया तो 'साहित्य में यथार्थ: सिद्धांत और व्यवहार', 'कला और साहित्य के सौंदर्यशास्त्रीय मानदंड', 'पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति', 'पाब्लो नेरुदा: एक कैदी की खुली दुनिया', 'एक और ब्रह्मांड', 'हरीश भादानी', 'धर्म, संस्कृति और राजनीति', 'समाजवाद की समस्याएं' और 'सिरहाने ग्राम्शी' जैसी पुस्तकें लिखीं. उन्होंने कुछ पुस्तकों का अनुवाद भी किया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में इनकी किताब 'आरएसएस और उसकी विचारधारा' को एक पाठ्य-पुस्तक की तरह संघ पर सबसे प्रामाणिक पुस्तक कहा जाता रहा है. इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल में 34 सालों की कम्युनिस्ट सरकार और भूमि-सुधार के क्षेत्र में उसके ऐतिहासिक कामों का जो प्रामाणिक आख्यान उनकी पुस्तक 'पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति' में मिलता है. 'नई आर्थिक नीति: कितनी नई', सन् '91 के बाद से भारतीय अर्थ-व्यवस्था के नए ऐतिहासिक मोड़ पर अपने तरह की अकेली किताब है.

युगांतकारी मार्क्सवादी चिंतक अन्तोनियो ग्राम्शी को केन्द्र में रख कर लिखी गई उनकी पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' ग्राम्शी की तरह के एक गहन और बहु-स्तरीय चिंतक की मूल स्थापनाओं को जिस सफाई से पेश करती ही, वह अन्यत्र शायद ही कहीं मिलेगा. चिली के विश्व-प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार विजेता कवि पाब्लो नेरुदा पर 'पाब्लो नेरुदा : एक क़ैदी की खुली दुनिया' को डा. नामवर सिंह ने हिन्दी में नेरुदा के जीवन और कृतित्व पर लिखी गई सबसे अधिक प्रामाणिक और तथ्यमूलक पुस्तक कहा था. केंद्रीय साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठित 'भारतीय साहित्य के निर्माता' श्रंखला में हिन्दी के सर्वजनप्रिय जनकवि हरीश भादानी पर इनकी किताब इस जनकवि के संपूर्ण व्यक्तित्व का जो विवेचन प्रस्तुत करती है, अप्रतिम है.

अरुण माहेश्वरी ने अपनी पहली पुस्तक, 'साहित्य में यथार्थ : सिद्धांत और व्यवहार' से ही हिन्दी में वाद-विवाद-संवाद की श्रेष्ठ मार्क्सवादी परंपरा में अपना ख़ास स्थान बना लिया था. परवर्ती दिनों में 'जनसत्ता' हिंदी दैनिक में इनके स्तंभ 'चतुर्दिक' तथा अक्सर प्रकाशित होने वाले राजनीतिक लेखों ने हिंदी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. आज अरुण माहेश्वरी के जन्मदिन पर हम उनके द्वारा लिखी और राजकमल से प्रकाशित पुस्तक 'सिरहाने ग्राम्शी' का अंश साहित्य आजतक के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे.

इस पुस्तक के बारे में लेखक ने लिखा था- फासिस्टों के नर-मेघी यातना और मृत्यु शिविरों से लेकर साइबेरिया के निर्वासन शिविरों और अमेरिकी जेल-औद्योगिक गठजोड़ वाले कैदखानों तक की कमोबेश एक ही कहानी है! नागरिक स्वतंत्रता की प्रमुख अमेरिकी कार्यकर्ता एंजिला डेविस की शब्दावली में- आज भी जारी दास प्रथा की कहानी! सुधारगृह कहे जाने वाले भारतीय जेल इनसे शायद ही अलग हैं!

इटली में फासिस्टों के जेल में बीस साल के लिए सजायाफ्ता मार्क्सवादी विचारक और कम्युनिस्ट नेता अन्तोनिओ ग्राम्शी ने सजा के दस साल भी पूरे नहीं किये कि उनके शरीर ने जवाब दे दिया! मृत्यु के एक महीना पहले उन्हें रिहा किया गया था! लेकिन जेल में बिताए इन चाँद सालों के आरोपित एकांत का उन्होंने इटली के इतिहास, उसकी संस्कृति, मार्क्सवादी दर्शन तथा कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में गहरे विवेचन के लिए जैसा इस्तेमाल किया उसने उनकी जेल डायरी को दुनिया के श्रेष्ठतम जेल-लेखन के समकक्ष रख दिया! खास तौर पर कम्युनिस्ट पार्टियों में शामिल लोगों के लिए तो इसने जैसे सोच-विचार के एक पूरे नये क्षेत्र को खोल दिया !

ग्राम्शी का यह पूरा लेखन कम्युनिस्टों को, किसी भी मार्क्सवादी के लिए अपेक्षित, तमाम वैचारिक जड़ताओं से मानसिक तौर पर उन्मुक्त करने का एक चुनौती भरा लेखन है! एक ऐसे विचारक के साथ जेल में बिताए चंद दिनों की यह डायरी किसी भी पाठक के लिए, खास तौर पर राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी अनुभव साबित हो सकती है! इसकी पारदर्शी भाषा, अंतस्थित सूक्ष्म वेदना और स्वच्छंद विचार-प्रवाह ने इस पुस्तक को अपने प्रकार की एक अनूठी कृति का रूप दिया है !

पुस्तक अंशः सिरहाने ग्राम्शी; एक कम्युनिस्ट की जीवन-लीला
                                   - अरुण माहेश्वरी

ग्राम्शी एक राजनीतिक सिद्धान्तकार हैं. साहित्य और संस्कृति के नाना विषयों पर उन्होंने आश्चर्यजनक विश्लेषणात्मक ढंग से रोशनी डाली है. लेकिन यह सब मूलत: इटली की कम्युनिस्ट पार्टी और उस देश में समाजवादी क्रान्ति की जरूरतों के तहत ही किया गया है. इटली के समाज की वर्गीय संरचना क्या है, इसका सांस्कृतिक इतिहास क्या रहा है, लोगों की मानसिक बुनावट कैसी है, अर्थव्यवस्था के विकास का स्वरूप और रास्ता क्या है- यह सब कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक जरूरतों के अन्तर्गत ही उनके विचार के विषय बने हैं.

लेकिन राजनीति की अपनी कुछ विडम्बनाएँ हैं. वह सामाजिक परिवर्तन के कितने ही महत् और दूरगामी उद्देश्य को लेकर क्यों न चल रही हो, काफी हद तक समसामयिकता उसका प्रस्थान और गन्तव्य दोनों ही होते हैं. इसीलिए राजनीतिक चिन्तन में दर्शनशास्त्रीय तात्त्विक चिन्ताओं की तरह की चिरन्तरता और सनातनता नहीं होती. वह हमेशा एक देश-काल सापेक्ष सत्य होता है, कोई ध्रुव, अटल सत्य नहीं. यही वजह है कि राजनीतिक नेता और सिद्धान्तकार भी अक्सर अपने विचारों और विश्लेषणों में काफी तेजी से फेर-बदल करते हुए देखे जा सकते हैं.

मैं यहाँ दलबदलू, अवसरवादी राजनीतिज्ञों की बात नहीं कर रहा हूँ. उनके लिए तो भूत, वर्तमान, भविष्य किसी के भी परिप्रेक्ष्य में सिवाय अपने निजी स्वार्थ के देश, काल, समाज कुछ नहीं होता. मैं उन गम्भीर राजनीतिवेत्ताओं की बात कर रहा हूँ जो अपने समय के सभी घात-प्रतिघातों के बीच भविष्य को एक स्वरूप प्रदान करने के लिए वर्तमान में हस्तक्षेप करने पर विचार किया करते हैं. ग्राम्शी ऐसे पहली पंक्ति के अहम मार्क्सवादी राजनीतिवेत्ताओं में एक प्रमुख स्थान रखते हैं. वे मार्क्सवादी दर्शन के एक सिद्ध विचारक, समाजवादी क्रान्ति के विज्ञान के विशेषज्ञ और विश्व परिस्थितियों के प्रखर ज्ञाता थे. 1891 में जन्मे ग्राम्शी की मृत्यु 27 अप्रैल, 1937 को हुई थी. मृत्यु के पहले लगभग 10 वर्ष उन्होंने मुसोलिनी के जेल में काटे. 1926 में वे अन्य कई कम्युनिस्ट नेताओं के साथ गिरफ्तार किए गए थे और 1928 के जून महीने में उन्हें 20 साल 8 महीने की सजा सुनाई गई. जेल में रहते हुए ही वे काफी बीमार हो गए और बीमारी की संगीन अवस्था में 1937 के आरम्भ में उन्हें जेल से रिहा किया गया. इसी साल 25 अप्रैल को उनके दिमाग की नस फट गई और  27 अप्रैल, 1937 को उनकी मृत्यु हो गई.

ग्राम्शी 17-18 वर्ष की उम्र में ही इटली के समाजवादियों के सम्पर्क में आ गए थे तथा कार्ल मार्क्स की रचनाओं का अध्ययन शुरू कर दिया था. 1913 से वे इटली के कम्युनिस्टों के सम्पर्क में आ गए. स्नातक की पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर 1915 में वे सिर्फ 24 साल की उम्र में तुरिन से प्रकाशित समाजवादी अखबार 'अवन्ती!' तथा समान विचार के दूसरे अखबारों में काम करने लगे. इसके साथ ही अलग से उन्होंने भाषाशास्त्र पर भी अपनी थिसिस के लिए अध्ययन जारी रखा.

इस प्रकार शुरू से कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाशनों से जुड़कर ग्राम्शी उस समय के विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन की सभी विचारधारात्मक बहसों से सिर्फ परिचित ही नहीं रहते थे, बल्कि निरन्तर लेखन के जरिए उन बहसों में शिरकत भी किया करते थे. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से गहरे सम्बन्धों के साथ वे इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रमुख नेता बन गए थे. 1917 की रूस की समाजवादी क्रान्ति के बाद पूरे यूरोप के राजनीतिक एजेंडे पर समाजवाद आ चुका था और इसके साथ ही पश्चिमी यूरोप में, खासतौर पर जर्मनी, इटली और स्पेन में पूँजीवाद के सबसे खूँखार और बर्बर रूप—नाजीवाद और फासीवाद—उभरकर सामने आए थे. उससे पूरे यूरोप का राजनीतिक दृश्यपट काफी उलझनों भरा और तरल स्थिति में था. समाजवादी क्रान्ति रूस से आगे नहीं बढ़ पाई. जन्म के साथ ही समाजवादी सोवियत संघ को साम्राज्यवादियों की नाकेबन्दी का सामना करना पड़ा था. नाजीवाद और फासीवाद ने कम्युनिस्टों को उन्हीं के सांगठनिक तौर-तरीकों के आधार पर परास्त करने की रणनीति अपनाई थी. थोथे, लोक-लुभावन नारों की उनके पास कमी नहीं थी. साथ में आधुनिक राज्य की शक्ति के प्रयोग से उन्होंने संसदीय जनतंत्र को सरेआम कुचलकर विरोधियों के बर्बर दमन का रास्ता अपनाया. रूस तक सीमित रह गई समाजवादी क्रान्ति का जहाज, वहाँ से और कहीं जा ही नहीं सका.

इसीलिए 1917 और उसके चन्द वर्षों बाद तक के विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन की स्थिति एक थी और 1922 में मुसोलिनी और फिर हिटलर और फ्रैंको के उदय, राजसत्ताओं पर उनके बलात् अधिकार और कम्युनिस्टों सहित जनतांत्रिक विपक्ष की सभी पार्टियों और व्यक्तियों को नेस्तनाबूद कर देने के उद्देश्य से चलाए गए क्रूरतम दमन चक्र के समय की स्थिति दूसरी थी. कहाँ तो कम्युनिस्ट क्रान्ति के विजय-रथ के सर्वत्र दौड़ जाने की कल्पना की जा रही थी, और कहाँ यूरोप के पूरे कम्युनिस्ट आन्दोलन के सामने अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया. स्तालिन ने बुर्जुआ द्वारा फेंक दिए गए जनतंत्र के झंडे को कम्युनिस्टों द्वारा उठाने का आह्वान इन्हीं परिस्थितियों में किया था. फिनलैंड के दिमित्रोव ने फासीवाद-नाजीवाद विरोधी सभी ताकतों के संयुक्त मोर्चे के निर्माण को कम्युनिस्टों का सबसे प्रथम और महत्त्वपूर्ण कर्तव्य बताया था.

कहने का तात्पर्य यह कि ग्राम्शी जिस समय इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के एक महत्त्वपूर्ण नेता और मार्क्सवादी विचारक और सिद्धान्तकार के रूप में सक्रिय थे, उस काल में इटली सहित पूरे यूरोप की राजनीतिक परिस्थिति में भारी उथल-पुथल मची हुई थी. रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर भी तब कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर तीव्र विचारधारात्मक संघर्ष की घटनाएँ घट चुकी थीं. लेनिन की 'एक देश में समाजवाद' और 'नई आर्थिक नीति' (हृश्वक्क) जैसे मुद्दों पर प्लाखनोव, ट्राटस्की आदि नेताओं के साथ तीव्र बहस हुई थी. ट्राटस्की 'विश्व समाजवादी क्रान्ति' और 'सनातन क्रान्ति' की तरह के विचारों पर अड़े हुए थे. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के अन्दर भी साम्राज्यवादी युद्ध के बारे में दृष्टिकोण को लेकर भारी मतभेद थे. स्तालिन और ट्राटस्की का विरोध एक और ही प्रकार की खुली शत्रुता की दिशा में मुड़ चुका था. ट्राटस्की को पलायन करके दूसरे देश में शरण लेनी पड़ी थी. कम्युनिस्ट पार्टी और सोवियत राज्य के बीच सम्बन्धों का स्वरूप क्या हो, राज्य के अधिकारों और नागरिकों के अधिकारों के बीच समाजवाद के अन्तर्गत कैसे सही सन्तुलन बनाए रखा जाए, पूँजीवाद की पतनशीलता और उसके अवश्यम्भावी पराभव के बारे में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के आकलनों और लगातार घोषणाओं के बावजूद विकसित पूँजीवादी देशों में कम्युनिस्ट आन्दोलन के नगण्य प्रभाव और पूँजीवाद के निरन्तर शक्तिशाली होते जाने का रहस्य क्या है- ये सारे प्रश्न ग्राम्शी के रहते ही विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के सामने उभरकर आ गए थे. आज 90 वर्ष बाद, सोवियत संघ और समाजवादी शिविर के अन्त के बाद तो ये सभी सवाल पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन को बुरी तरह मथ रहे हैं. इसी प्रकार कम्युनिस्ट पार्टी का सांगठनिक स्वरूप कैसा हो, क्या एक नौकरशाही ढंग के कमांड सिस्टम के आधार पर चलने वाला कम्युनिस्ट पार्टी का ढाँचा उस ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर सकता है जो उसे पूरी मानव सभ्यता को एक नया, पूरी तरह समतापूर्ण, न्यायपूर्ण और मानवोचित स्वरूप देने की जिम्मेदारी प्रदान करता है?

गौर करने लायक बात यह है कि ग्राम्शी ने इन सारे सवालों पर खासतौर पर अपने जेल जीवन के वक्त बहुत ही गम्भीरता से विचार किया था. उन्होंने ऐसे किसी भी कष्टदायी सवाल से कतराने के बजाय उनको सही भावना के साथ एक मार्क्सवादी विचारक के रूप में स्वीकारा था. वे उनसे टकराए और उस टकराहट में अपने अन्दर की भी ऐसी बहुत सी बद्धमूल अवधारणाओं को तोड़ा जो सच्चाई से दूर थी और इसी के बीच से समाजवादी क्रान्ति के नए रास्ते का सन्धान करने की कोशिश की. जो सवाल आज भी कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए विकट प्रश्न बने हुए हैं, उन पर ग्राम्शी का गहन अन्तर्दृष्टि के साथ किया गया आलोकपात इतना अभिनव और विचारोत्तेजक है कि मृत्यु के 75 साल बाद भी वे सभी मार्क्सवादी विचारकों और राजनीतिविदों के लिए आकर्षण का विषय बने हुए हैं.

उपरोक्त विवरण से जाहिर है कि ग्राम्शी ने अपने जीवनकाल में कम्युनिस्ट आन्दोलन के उत्थान और पतन के अनेक रूपों को देखा था, परिस्थितियों में तेजी से हुए परिवर्तनों को पहचाना था और उनका विश्लेषण करते हुए क्रान्तिकारी कार्यों की नई सैद्धान्तिकी के निर्माण की पेशकश की थी. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर उनके लेखन में किसी को भी अनेक प्रकार की विसंगतियों और अन्तर्विरोधों के दिग्दर्शन हो सकते हैं. यही तो चालू राजनीतिक घटनाक्रमों के विश्लेषणों के किसी भी संकलन की विडम्बना है. यही वजह है कि शुरू में हमने उन्हें एक राजनीतिक सिद्धान्तकार बताकर जिस बात से अभिहित कराने की कोशिश की है, वह इन्हीं यत्किंचित् विसंगतियों और अन्तर्विरोधों की बात है. इन्हीं की पड़ताल पर हम ग्राम्शी का अपना क्रिटीक तैयार करना चाहते हैं. इससे वे सारी बातें सामने आएँगी, जिनके कारण आज भी पूरे मार्क्सवादी, कम्युनिस्ट हलके में ग्राम्शी का डंका बज रहा है.

एरिक हाब्सवाम ने इस संकलन की भूमिका में बहुत सही लिखा है कि ''सही कहें तो मुख्यत: एक कम्युनिस्ट चिन्तक के रूप में ग्राम्शी ने इटली से बाहर लोगों का ध्यान इसलिए आकर्षित किया कि उसने उन देशों के लिए मार्क्सवादी रणनीति प्रदान की जिनमें अब तक क्रान्ति एक प्रेरणा हो सकती थी, लेकिन मॉडल नहीं. अर्थात् गैर-क्रान्तिकारी वातावरण और परिस्थितियों में समाजवादी आन्दोलन की रणनीति.''

गले में दर्द है. लगता है कुछ उपचार करना पड़ेगा. यहाँ घर की तरह भाप वगैरह लेने की व्यवस्था नहीं है.
***

पुस्तकः सिरहाने ग्राम्शी
लेखक: अरुण महेश्वरी
विधाः डायरी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्यः हार्डबाउंड रुपए 400/-
पृष्ठ संख्याः 168

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