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यात्रा बिम्ब की अनूठी लेखिका उषा प्रियम्वदा के जन्मदिन पर उपन्यास अल्पविराम का अंश

उषा प्रियम्वदा के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके उपन्यास ‘अल्प विराम’ का अंश. उनका यह उपन्यास मृत्यु के कगार पर खड़े परिपक्व व्यक्ति की अपने से उम्र में आधी युवती के प्यार में आकंठ डूब जाने की कहानी है, तो...

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aajtak.in नई दिल्ली, 24 December 2019
यात्रा बिम्ब की अनूठी लेखिका उषा प्रियम्वदा के जन्मदिन पर उपन्यास अल्पविराम का अंश उषा प्रियम्वदा के उपन्यास ‘अल्प विराम’ का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

हिंदी की प्रतिष्ठित रचनाकार उषा प्रियम्वदा का आज जन्मदिन है. उत्तर प्रदेश के कानपुर में 24 दिसंबर, 1930 को वह पैदा हुईं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय  से उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने लगभग तीन साल तक देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों, जिनमें दिल्ली का लेडी श्रीराम कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय शामिल है, में प्राध्यापन किया. बाद में फुलब्राइट स्कालरशिप पर वह अमेरिका चली गईं. वहां उषा प्रियम्वदा ने ब्लूमिंगटन, इंडियाना में दो वर्ष पोस्ट डाक्टरल अध्ययन किया. बाद में विस्कांसिन विश्वविद्यालय, मैडीसन में दक्षिण एशियाई विभाग में पढ़ाने लगीं. वहीं से प्रोफेसर के पद से उन्होंने अवकाश प्राप्त किया.

उषा प्रियम्वदा की गणना उन कथाकारों में होती है, जिन्होंने आधुनिक जीवन की ऊब, छटपटाहट, संत्रास और अकेलेपन की स्थिति को पहचाना और व्यक्त किया. केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा पद्मभूषण डॉ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित उषा प्रियम्वदा ने अपने कहानी संग्रह- ज़िंदगी और गुलाब के फूल, एक कोई दूसरा और मेरी प्रिय कहानियां तथा उपन्यास- पचपन खंभे, लाल दीवारें, रुकोगी नहीं राधिका, शेष यात्रा और अंतर्वंशी से हिंदी साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई. हाल ही में राजकमल प्रकाशन से 'अल्प विराम' नाम से उनका एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है.

इस किताब के फ्लैप पर लिखा है कि उषा प्रियम्वदा का यह उपन्यास एक लम्बे दिवास्वप्न की तरह है, जिसमें तिलिस्मी, चमत्कारी अनुभवों के साथ-साथ अनपेक्षित घटनाएं भी पात्रों के जीवन से जुड़ी हुई हैं. एक ओर यह मृत्यु के कगार पर खड़े परिपक्व व्यक्ति की तर्क विरुद्ध, असंगत, अपने से उम्र में आधी युवती के प्यार में आकंठ डूब जाने की कहानी है, तो साथ ही साथ एक अविकसित, अप्रस्फुटित, अव्यावहारिक स्त्री के सजग, सतर्क और स्वयंसिद्ध होने की भी यात्रा है. यात्रा का बिम्ब उषा प्रियम्वदा के हर उपन्यास में मौजूद है. चाहे वह कैंसर से उबरने की यात्रा हो या अपने से विलग हुई सन्तान के लौटने तक की.

इस उपन्यास की कथा भी प्रमुख स्त्री पात्र की स्वयं चेतन, स्वयं सजग और स्वयं जीवन-निर्णय लेने तक की यात्रा है, और लेखिका के हर उपन्यास की तरह कहानी अन्तिम पृष्ठ पर समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठिका, पाठक के मन में अपने अनुसार समाप्ति तक चलती रहती है. इस उपन्यास में प्रवास, इतिहास और साहित्य तीन धाराओं की तरह जुड़ा हुआ है, और लेखिका ने पठनीयता के साथ-साथ पाठिका, पाठक को गम्भीरता से अपना जीवन विश्लेषण करने की ओर प्रेरित किया है.

उषा प्रियम्वदा कहती हैं, ‘अल्प विराम’ एक प्रेम कथा है. बाकी वृत्तान्त एक चौखटा है, एक फ्रेम. परन्तु फ्रेम के बिना तस्वीर अधूरी है. इसी प्रकार प्रेम कहानी प्रवाल के बिना अपूर्ण है. तो आज उषा प्रियम्वदा के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके उपन्यास ‘अल्प विराम’ का यह अंश.
***

पति उसी पुस्तक 'वार एंड पीस’ पढ़ने में लीन हो गए हैं. मैं नहीं पढ़ पाऊँगी. मैंने निश्चय कर लिया है, मैं ऐसे ही रहूँगी- घर-बार में व्यस्त, पत्नी का पूरा-पूरा दायित्व निभाती हुई. इससे मेरे क़दम धरती पर जमे हुए हैं, और न जाने क्यों मुझे रोज़-रोज़ का महत्त्वहीन जीवन अच्छा लगने लगा है!
पर हमेशा नहीं. कभी-कभी मन बहुत उचट जाता है. घर-गिरस्ती, जमुना, माधवमोहन- सबसे ऊब उठती हूँ.
''आप जिस चरण से गुज़र रही हैं, उसे अस्तित्ववादी क्राइसिस कहा जाता है,’’ पति ने हलके से मुस्कुराकर कहा.
''वह क्या?’’                                                                              
''जब हम अपने-आपसे पूछने लगते हैं- मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मेरे साथ जीवन में क्या हो रहा है?’’
''और?’’
''और भी बहुत-सी बातें. प्रस्तावना और इलिकी ने अपनी उपस्थिति से आपको बाध्य कर दिया है कि आप अपनी जीवनधारा, अपने विचार और धारणाओं को एक्ज़ामिन करें.’’
''हूँ- तो?’’
''अस्तित्ववादी विकल्प यह है कि कोई विकल्प नहीं है.’’
''यह क्या बात हुई!’’
''यही बात है- विकल्प यह है कि कोई विकल्प नहीं है.’’
''हुँह...!’’
जीवन में कोई अर्थ है या जीवन सारहीन है? हम सब एक बहुत साधारण स्तर पर जीते हैं, यह सब गूढ़ प्रश्न फिलॉसफर और थिंकर्स पर छोड़ देते हैं. बहुतेरे तो कभी यह सोचते भी नहीं. वह एक आइडेंटीटी पकड़ लेते हैं- मैं हिस्ट्री की प्रोफेसर, नारी विमुक्तीकरण की सक्रिय सदस्य- श्रीमती सो एंड सो...
अस्तित्ववादी विकल्प? क्राइसिस- जीवन के अर्थ...?
मैं न जाने कितने दिनों से मन में गुनती-तौलती रहती हूँ. एक दिन जब फिर प्रस्तावना को देखती हूँ तो जैसे लोटती-पोटती, हिलती-डुलती ज़िन्दगी धुरी पर आकर टिक जाती है. मैं मुस्कुराकर उनका स्वागत करती हूँ. उनके चेहरे पर आश्चर्य की रेखा है, ''आपके डॉक्टर साहब आज सुबह-सुबह ही निकल गए हैं, आप मेरे साथ चाय पिएँ...’’
वह हमारी बैठक में आ जाती हैं. चारों ओर नज़र घुमाती हैं. बीच का दरवाज़ा उढ़का हुआ है जिसकी दरार से हमारा शयनकक्ष दिख रहा है.
''बैठिए- मैं चाय मँगवाती हूँ.’’ मैं आवाज़ देती हूँ.
थोड़ी देर में माधवमोहन ट्रे लाकर रख देता है और चाय छानने लगता है. माधवमोहन के हर काम में सलीका है.
''आज इलिकी नहीं आईं?’’ मैंने पूछा.
''उनका बेटा बीमार है, बुखार है- तो वह सीधे कॉलेज से घर चली गईं.’’
''उनके बेटा है?’’
''हाँ, दो बेटे हैं. घर में बूढ़े सास-ससुर साथ रहते हैं. उनके पति दवाइयाँ बेचने के एजेंट हैं. अधिकतर दौरे पर रहते हैं.’’
''आप लोग घर-परिवार की जि़म्मेदारियाँ ढोते हुए भी बाहर इतना काम करती हैं?’’
प्रस्तावना ने कहा, ''आप भी कर सकती हैं.’’
मैंने उनकी तरफ़ बिस्कुट की प्लेट सरकाई, ''करूँगी- पर अभी तो...’’
''हाँ, नई शादी, नई गृहस्थी, आगे समय है.’’
प्रस्तावना इस समय हाथ में झंडा लिये नारीवादी नारे लगाती हुई स्त्री के अतिरिक्त एक समझदार महिला लग रही थीं.
''हरेक के जीवन में अस्तित्ववादी क्राइसिस तो बनी ही रहती है,’’ मैंने बहुत आसानी से कह दिया, ''असल में, प्रस्तावना जी, विकल्प तो यही है कि कोई विकल्प नहीं है.’’
प्रस्तावना ने चाय का ख़ाली प्याला मेज़ पर रख दिया. शायद पहली बार उनका ध्यान प्याले की नज़ाकत पर गया- अँगरेज़ी बोन चाइना का सुन्दर-सा प्याला- जेठानी जी का रिजेक्ट.
''अब चलती हूँ,’’ वह उठकर खड़ी हो गईं, ''हम हस्तशिल्प वस्तुओं की प्रदर्शनी करने वाले हैं, आपको निमंत्रण भेजूँगी- बाँगड़ू छपाई, कच्छ का हस्तशिल्प.’’
''ज़रूर-ज़रूर,’’ मैं उनके साथ उठ खड़ी हुई.
उनके जाने के बाद भी मैं बैठी-बैठी सोचती रही- क्या जीवन में जो कुछ मिल रहा है, उसे सहर्ष गले से लगा लूँ, सहेज लूँ? एक स्तर पर पति अच्छे लगते रहे होंगे, मैं मम्मी की बातों में कितना फँस गई थी- अमेरिका में एक विक्षिप्त-से व्यक्ति से अचानक ही उलझ गई थी. इस समय बैठे-बैठे मैंने स्पष्ट दृष्टि से अपने को तौलते हुए महसूस किया कि मैंने उन्हीं लकी शॉ को आकर्षक पाया था. उनमें एक ऐसा चुम्बकीय आकर्षण, एक ऐसी हॉरमोनल सुगन्ध थी कि मैं उनकी ओर खींचने लगी थी. उनका गाहे-बगाहे मिल जाना अच्छा लगने लगा था. जैसे एक अज्ञात, अनाम स्तर पर रविवार की प्रतीक्षा रहती थी कि दोसा फैक्टरी में वह अवश्य दिखाई देंगे. उनके बिखरे हुए घुँघराले बाल, काले फ्रेम का चश्मा, चेहरे पर एक बदहवासी मेरे मन को गुदगुदाने लगी थी.
चलो, वह अध्याय समाप्त हुआ.
पति के साथ मैं कितनी सुखी हूँ! और तब यह बोध मुझे आपादमस्तक हिला गया कि मुझे भी उनसे कितना प्यार है, जो दिन-पर- दिन गहरा होता जा रहा है! केवल शरीर का सुख ही नहीं, उनके विचारों, उनकी बातों से, उनकी मानवता से मैं कितनी अभिभूत हूँ! और जीवन यों ही चलता जाएगा, भविष्य का विस्तार रहेगा. वह पुस्तकें पढ़ेंगे, लिखेंगे और मैं छोटी बच्ची के गुड़ियों के खेल की तरह अपनी गृहस्थी चलाऊँगी- इठलाऊँगी, मुस्कुराऊँगी- कभी-कभी झुँझला भी जाऊँगी- पर सम्पूर्ण, प्रसन्न और हाँ- सार्थक!
***
पुस्तक: अल्पविराम
लेखक: उषा प्रियंवदा
विधा: उपन्यास
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: 311
मूल्य: रुपए 299/- पेपरबैक

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