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पुस्तक अंश- शेखर: एक जीवनी; अज्ञेय ने कहा था, इसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है

हमारे दौर के सर्वाधिक बौद्धिक समझे जाने वाले लेखकों में से एक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी कालजयी कृति 'शेखर: एक जीवनी' का अंश

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 30 April 2019
पुस्तक अंश- शेखर: एक जीवनी; अज्ञेय ने कहा था, इसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है अज्ञेय के उपन्यास 'शेखर: एक जीवनी' का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

'शेखर: एक जीवनी' अज्ञेय का सबसे अधिक पढ़ा गया उपन्यास है. यह हिंदी की एक ऐसी कथा-कृति जिसे इसके प्रकाशित होने के बाद से हर पीढ़ी का प्यार मिला. चाहे वह साहित्य की अभिरुचि वाला छात्र हो या आम पाठक इससे गुजरने के बाद हर कोई जीवन की एक भरी-पूरी छलछलाती नदी में डूबकर निकल आने जैसा अनुभव करता है. उपन्यास का नायक शेखर स्वयं अज्ञेय हैं अथवा कोई और व्यक्ति, यह हमेशा कौतूहल का विषय रहा है. कुछ लोग इसे पूरी तरह उनकी आत्मकथात्मक कृति मानते हैं, लेकिन स्वयं अज्ञेय का कहना है कि यह 'आत्म-जीवनी’ नहीं है. वे कहते हैं कि 'आत्म-घटित’ ही आत्मानुभूति नहीं होता, पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है. यदि हममें सामर्थ्य है कि हम उसके प्रति खुले रह सकें..शेखर में मेरापन कुछ अधिक है.’

'शेखर: एक जीवनी' की कथा ऐसी नहीं है कि इसे 'एक आदमी की निजी बात’ कहकर उड़ाया जा सके. अज्ञेय इसे अपने युग और समाज का प्रतिबिम्ब मानते हैं. उन्हीं के शब्दों में 'इसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है, वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है.’ बहुआयामी और संश्लिष्ट चरित्रों के साथ अपने समय-समाज और उनके बीच अपनी अस्मिता को आकार देते व्यक्ति की वेदना को तीव्र और आवेगमयी भावात्मकता के साथ अंकित करते इस उपन्यास के नायक शेखर के बारे में अज्ञेय की टिप्पणी है: 'शेखर कोई बड़ा आदमी नहीं है, वह अच्छा आदमी भी नहीं है. लेकिन वह मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश कर रहा है. .उसके साथ चलकर आप पाएँगे कि आपके भीतर भी कहीं पर एक शेखर है, जो जागरूक, स्वतंत्र और ईमानदार है, घोर ईमानदार.'

हमारे दौर के सर्वाधिक बौद्धिक समझे जाने वाले लेखकों में से एक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी इस कालजयी कृति 'शेखर: एक जीवनी' का अंश प्रकाशक राजकमल प्रकाशन के सौजन्य से-

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पुस्तक अंशः शेखर: एक जीवनी

किसी ने मुझे फूल भेजे हैं.

यदि धूप और छाँह एक-दूसरे के परिपूरक हैं, तो क्यों इन फूलों को देखकर यह भावना नहीं जागती, क्यों इस कोठरी के पाँच कदम लम्बे और तीन कदम चौड़े, लोहे की कड़ियों से घिरे हुए अन्धकार के टुकड़े में, मुझे इन फूलों को देखकर सम्पूर्णता का भान नहीं होता, क्यों इनके बिखरे-बिखरे सफेद सौन्दर्य में खुली-खुली सी पीली आँखें देखकर मुझे अत्यन्त अपूर्ति, अखंड शून्यता का अनुभव होता है! क्यों मेरे अन्दर एक उत्कट विद्रोह, एक सर्वनाशक जिज्ञासा जागती है...

भाङ् भाङ् भाङ् कारा

आघाते आघात कर

अरे आज कि गान गेये छे पाखी

एशेछे रविर कर!

जिसने ये फूल भेजे हैं, वह क्या समझती होगी कि उसने मुझे क्या भेज दिया, क्या मुझे झुलसाए डालता है, पर जिसके लिए मैं फिर भी उसका कृतज्ञ हूँ!

वह मेरी शिष्या थी, पर मैं उसका गुरु नहीं था. मैं उसे केवल पढ़ाता ही था, पर वह मुझे कभी गुरु नहीं समझ पाई, उसके लिए मैं था एक बड़ा-सा भाई- किन्तु ऐसा भाई जिससे प्रेम किया जा सके, जिस पर झुका जा सके, जिसके आधार पर स्वप्न बुने जा सकें- और जो उपेक्षा से उन्हें तोड़ दे!

मैं पढ़ाता था, बड़ी मेहनत से पढ़ाता था. पर वह कुछ भी नहीं सीख पाती थी! नित्य मैं उससे पूछता, 'पिछला सबक याद किया है?’ तब वह सिर झुकाकर एक निरर्थक-सी मुस्कुराहट लेकर चुप रह जाती थी. तब मैं बार-बार पूछता था, फिर डाँट देता था, और कहता था, 'ऐसे पढ़ाई नहीं हो सकती.’ और पुराने सबक को दुहराने बिठा देता था.

तब वह बिलकुल नहीं पढ़ती थी. किताब सामने रखकर बड़ी मननशीलता से उसे देखती रहती थी, उन आँखों से जो बड़ी-बड़ी बूँदों से भरी हुई होती थीं और कुछ भी नहीं देख सकती थीं...

तब मैं स्नेह के (किन्तु बहुत थोड़े से स्नेह के!) स्वर में कहता था, 'अच्छा आज आगे पढ़ा देता हूँ. कल दोनों सबक याद कर लेना!’ और वह पढ़ती थी। और दूसरे दिन फिर वही हाल!

एक दिन मुझे बहुत क्रोध आया. तब उसकी आँसू-भरी आँखें देखकर मैंने झुँझलाए स्वर में कहा, 'पढ़ती-लिखती तो कुछ हो नहीं, और कुछ कहता हूँ तो रो पड़ती हो! हटो कल से मैं नहीं आऊँगा.’

मैं उठ खड़ा हुआ. तब वह दीन स्वर में बोली, 'मुझे फुरसत कहाँ मिलती है? अम्माँ सारे दिन तो पचीसों काम बताती रहती हैं?’

गुरु कैसे मान जाए! अम्माँ भी आई. उनसे भी पूछा, 'इसे कितना समय पढ़ने के लिए मिलता है?’

'सारा दिन तो किताब लिये बैठी रहती है. मैं तो पढ़ाई के डर से कभी कुछ कहती भी नहीं! क्यों, ठीक नहीं पढ़ती क्या?’

मुझे कहना सच ही चाहिए था, पर मैंने कहा, 'नहीं, पढ़ती तो है, पर थोड़ी देर और पढ़ा करे तो-’ वे चली गईं. तब मैंने फिर उससे पूछा, 'क्यों?’ वह क्या कहती? किताब सामने रखकर कितनी देर स्वप्न देखे जा सकते हैं, इसकी भी कोई सीमा है!

मैंने और कठोर स्वर में कहा, 'क्यों, अब?’

'अब ध्यान से पढ़ूँगी?’ तब मैं पढ़ाने लगा.

तब एक दिन ऐसा आया कि मैं उसे पढ़ाने नहीं गया. दो दिन नहीं, तीन दिन नहीं. चौथे दिन मैंने उसके पिता को पत्र लिख दिया कि मैं नहीं पढ़ा सकूँगा. उन्होंने दूसरे ही दिन एक चेक मेरे नाम भेज दिया.

कहानी समाप्त हो गई. पर दूसरे दिन उनका नौकर, एक छोटा लड़का, मेरे पास आया और बोला, 'बीबीजी पूछती हैं, पढ़ाने नहीं आइएगा?’

मैंने डपटकर कहा, 'कौन बीबीजी?’

'छोटी. उन्होंने बुलाया है.’

मैंने फिर पूछा, 'शीला ने?’

'हाँ.’

उसे शायद पता नहीं था कि पढ़ाई कैसे समाप्त हो चुकी है. मैंने कहा, 'उनसे कहना, नहीं आ सकता. उनके पिता ने पढ़ाई बन्द कर दी है.’

वह चला गया. मुझे यह विचार नहीं हुआ कि मैं कैसी कायरता से झूठ बोला हूँ. मैं यही सोचता रहा कि मैंने विजय पा ली है!

उस विजय ही में मेरी हार हुई. यदि मैं उसे सच ही कहला देता कि मैंने ही इनकार किया है, तब शायद वह अपने को अन्याय का भागी समझकर ही कुछ सांत्वना पाती, मैंने उसके लिए भी स्थान नहीं छोड़ा और तब से उसकी उलहना भरी छाया मेरे साथ-साथ आती है और रोती सी कहती है- झूठे! झूठे!

मैं इससे बचकर भागता हूँ. भागता आया हूँ और अब भी फूलों की ओर देखकर सोच रहा हूँ, इन मुरझाए हुए फूलों से कहाँ भागूँ?

पर क्यों भागूँ?

शीला, मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया. अपने को अब तक अवश्य धोखा देता आया हूँ. मैं जो झूठ बोला था, उसने तुम्हें नहीं भुलाया, मैं ही उसमें भूला था. पर आज मैं अपनी भूल जाना गया हूँ. आज मैं तुम्हें कष्ट देने वाला तुम्हारा भाई, जो तुम्हारी श्रद्धा को कृतज्ञता से स्वीकार करता है, जो अपनी लज्जा भुलाकर कहता है कि उसने झूठ बोलकर अपने को तुमसे नहीं, अपने आपसे छिपाया था. यही उसका प्रतिदान है जो तुम्हें अब तक नहीं मिला, जो शायद अब तुम्हें कभी नहीं मिल सकता, किन्तु जिसे यह आज चुकता कर चुका है.

जब तक फूल ताजे थे, तब तक यह नहीं दीखता था कि ये कैसे बँधे हुए हैं. मैंने इन्हें अपनी कोठरी के जँगले से बाँध दिया था, पर उन्हें बाँधने वाला फीते का टुकड़ा नहीं दीखता था, काले लोहे के सीखचों के साथ लगे हुए ये सफेद कोमल फूल, एक बड़े अमधुर सत्य की याद बड़े मधुर ढंग से दिला देते थे...

आज वह फीता दीखता है. उसके अपरिवर्त्त फन्दे में फूल सूख चुके हैं, अपना स्मारक भर रह गए हैं और विवश-से लटक रहे हैं. याद दिला रहे हैं किसी चीज़ की- जाने किसकी! कह रहे हैं, वासना नश्वर है, मुरझा जाती है और तब प्रेम-तन्तु ही जीवन की स्थिरता बनाए रखता है...या शायद इससे उलटा! कह रहे हैं, जब प्रेम मर जाता है, तब वासना उसके शव को उठाए-उठाए फिरती है और उससे अपने को धोखे में छिपाना चाहती है...कह रहे हैं, और कुछ याद दिला रहे हैं, किसी ओर इंगित कर रहे हैं...

'रम्य तटी रावी’ का एक तट, जो और कैसा भी हो रम्य नहीं है. तट पर छोटी झाड़ियों और ठूँठे वृक्षों का घना जंगल. खिंची हुई आह की तरह गर्म और निस्तब्ध रात. ऊपर पेड़ों की सूखी शाखों में उलझा हुआ एकाध तारा, नीचे मरे हुए और धूल हुए पत्तों की सूखी आहों की भाफ और सामने... एक बिखरा हुआ शव. उसके दोनों हाथ कटे हुए हैं. एक पैर कटा हुआ है, पेट खुल-सा गया है और उसमें से अँतड़ियाँ बाहर गिरी पड़ रही हैं. फटी-फटी आँखें, ऊपर शाखों के जाल को भेदकर देख रही हैं किसी तारे को, और मुँह एक बिगड़ी हुई दर्द भरी मुस्कुराहट लिये हुए हैं...

उसे मरे देर हो गई. जिस व$क्त एक भयानक विस्फोट से वह मानव-विभूति टूटे हुए स्तम्भ की तरह गिरी, उस वक्त वहाँ एक-दो दर्शक थे किन्तु जब वह मरा, तब जीवन की उलझन को सुलझाने में उसका सहायक कोई नहीं था. वे गए थे साहाय्य प्राप्त करने- एक को वहीं छोड़कर. पर रात होने को आई और उसके रुके हुए प्रतीक्षमान प्राण और अधिक नहीं सह सके... तब वह अन्तिम प्रहरी ढूँढ़ने चला...और जब उन्हें ढूँढ़कर लाया, जब वे सब वहाँ पहुँचे उसे उठा ले चलने के लिए, तब वह खो गया था? अपने दुख और दर्द की, और अपने आशा और क्रियाशीलता की स्मृति-स्वरूप वह विकृत मुस्कान छोड़कर चला गया था.

वे चार-पाँच जन उस शरीर के पास खड़े हैं. वे रो नहीं रहे हैं, आँसू नहीं बहा रहे हैं. वे अपने चिरसंचित अरमान बहा रहे हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य एक विस्फोट का धुआँ बनकर उड़ गया है. घने जंगल की शाखों के उलझे जाल में से धीरे-धीरे छनकर निकल गया है, तड़प-तड़पकर किन्तु चुपचाप, एक भरी हुई मुस्कान छोड़कर उस निविड़ एकान्त में जब कि अन्तिम प्रहरी भी उसे छोड़कर चला गया था और उसकी अपनी अन्तर्वेदना ही एकमात्र प्रहरी बनकर उस निविड़तम हताशा के क्षारपुंज पर एक व्यर्थ पहरा दे रही थी...

उस बीहड़ में उस फटी हुई आँख के अन्धेपन ने क्या देखा, यदि हम जान पाते...

वे चार-पाँच उसके पास खड़े हैं. कतार बाँधे, सावधान मुद्रा में, सिर झुकाए हुए. किसी आदर की भावना से वे सब एक साथ ही उसे हाथ उठाकर नमस्कार करते हैं और बहुत देर तक वैसे ही रह जाते हैं...

वे सब चुप हैं, इस दृश्य को पूरा करने वाली भैरवी उनके अन्तस्तल में कहीं मूक स्वर में बज रही है...

यही है उस कवि-हृदय सिपाही की अन्त्येष्टि, उस विद्रोही के विद्रोह का अन्तिम उफान.

दृश्य फीका पड़ जाता है. एक निस्सीम श्वेत आकाश में पड़ा हुआ रह जाता है केवल वह शरीर जमते हुए रक्त के एक छप्पड़ में...

उसके दोनों ओर दो आकार- एक स्त्री और एक पुरुष. वे एक-दूसरे को देख रहे हैं, उनकी आँखें नीचे पड़े उस शव को नहीं देखतीं, उनके हृदय नहीं अनुभव करते कि वे किसी भव्य पवित्रता की समाधि भ्रष्ट कर रहे हैं. वे मिलते हैं, बाँहों से एक-दूसरे को घेरकर बाँधते हैं, आलिंगन करते हैं किसी दानवी भूख से और उसी शव के आर-पार! फिर-

भ्रम! मैं देख रहा हूँ जँगले से लटके हुए सूखे हुए नरगिस के गुच्छे को और उसे घेरे हुए फीते के टुकड़े को.

मानव के लिए झूठ, छल और मक्कारी अत्यन्त सहज है, क्योंकि ईश्वर ने मानव को अपना प्रतिरूप बनाया और ईश्वर हमारे ज्ञान में सबसे बड़ा झूठ और छलिया और मक्कार है....

नहीं तो जो चित्र मुझे दीखता है, उसका क्या कारण है? क्या मानव इतनी नीचता और इतने ज्वलन्त आत्मत्याग के आगे इतनी नीचता कर सकता है?

पुस्तकः शेखर एक जीवनी (पहला भाग- उत्थान)

लेखकः अज्ञेय

विधा- उपन्यास

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

मूल्यः 250 रुपए, पेपरबैक

पृष्ठ संख्याः

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