कौन थे कबीर? जॉन स्ट्रैटन हौली की पुस्तक 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' का अंश

कबीर जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए जॉन स्ट्रैटन हौली द्वारा लिखित और अशोक कुमार द्वारा अनुदित पुस्तक 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' से संत कबीर पर लिखा अंश कौन थे कबीर

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aajtak.in नई दिल्ली, 18 June 2019
कौन थे कबीर? जॉन स्ट्रैटन हौली की पुस्तक 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' का अंश 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

अतीत से सीखना जरूर चाहिए, लेकिन सीखा तभी जा सकता है, जब हम अतीत के अतीतपन का सम्मान करें. वर्तमान के राजनीतिक या सामाजिक द्वंद्वों को अतीत पर आरोपित करने से वर्तमान और अतीत दोनों की समझ धूमिल होती है. जॉन स्ट्रैटन हौली अपनी किताब 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' में ऐसी ही स्थापना के साथ आते हैं.

इस पुस्तक के आरंभ में ही जॉन स्ट्रैटन हौली ने इसे ‘ऐतिहासिक तर्क और विवेक के प्रति अपील’ कहा है. वह अपनी पुस्तक में शामिल किए गए इन तीनों महानतम कवियों की रचनाशीलता और इनके समय के साथ कल्पनापूर्ण, आलोचनात्मक संवाद के महत्त्व पर बल देते हैं. ऐसे संवाद, जिन के बिना भक्ति-संवेदना का संवेदनशील अध्ययन असम्भव है.

हौली अपनी पुस्तक में मीरा, सूर और कबीर से जुड़े विशिष्ट सवालों- समय, रचनाओं की प्रामाणिकता, संवेदना का स्वभाव, लोक-स्मृति में उनका स्थान-आदि पर तो विचार करते ही हैं, इनके बहाने भक्ति-संवेदना से जुड़े व्यापक प्रश्नों की भी समीक्षा करते हैं. पाठ-निर्धारण से लेकर निर्गुण-सगुण विभाजन का सवाल भी उनके सामने है.

जॉन स्ट्रैटन हौली ने अपनी इस पुस्तक के बारे में एक बार कहा था कि मैं सबसे पहले सूरदास पर काम करना चाहता था लेकिन जब मैं पुरुषोत्तम अग्रवाल के सम्पर्क में आया, तब मेरे अंदर मीरा और कबीर के बारे में जाने की उत्सुकता बढ़ी और मैंने इसके लिए काम करना शुरू किया. आज इसका परिणाम आपके सामने है. इसके लिए मैं राजकमल प्रकाशन और पुरुषोत्तम अग्रवाल को धन्यवाद देता हूं.

'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' के बारे में आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना था कि जब हमने एक भक्ति श्रृंखला लाने के बारे में सोचा तो मेरी यही शर्त थी कि यह काम पांडुलिपियों के आधार पर होगा. खास बात यह कि यह किताब इस कसौटी पर खरी उतरती है. यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक किताब है. यह किताब बहुत ही गंभीर परिप्रेक्ष्य रखती है. यह पुस्तक समकालीन इतिहास के रूप में समृद्ध करेगी.

जॉन स्ट्रैटन हौली की किताब 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर'. उनकी मूल कृति 'भक्ति वॉयसेस: मीराबाई, सूरदास एंड कबीर इन देयर टाइम्स एंड आवर्स' का हिंदी अनुवाद है. इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है और अनुवाद अशोक कुमार ने किया है. यह पुरुषोत्तम अग्रवाल के संपादन में प्रकाशित होने वाली पुस्तक श्रृंखला 'भक्ति मीमांसा' की तीसरी किताब है. इस श्रृंखला में पहले प्रकाशित दो किताबें हैं: 'निर्गुण संतों के स्वप्न' और 'रामचरित मानस; पाठ: लीला: चित्र: संगीत.'

भारत की भक्ति परंपरा पर जॉन स्ट्रैटन हौली की चर्चित किताबें हैं- अ स्ट्रोर्म ऑफ़ सांग्स: इंडिया एंड दि आइडिया ऑफ़ दि भक्ति मूवमेंट (होर्वार्ड, 2015), सूर'स ओशन (कैनेथ ब्रायंट के साथ, होर्वार्ड, 2015), इन टू सूर'स ओशन (होर्वार्ड ओरिएंटल सीरीज, 2016), सूरदास: पोएट, सिंगर, सैंट (प्राइमस, 2018). जॉन स्ट्रैटन हॉली गुग्गेनहेम और फुलब्राइट-नेहरु फेलो रह चुके हैं और अमेरिकन अकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंस के लिए भी मनोनीत हो चुके हैं. फिलहाल कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के बर्नार्ड कॉलेज के धर्म विभाग में प्रोफेसर हैं.

कबीर जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए जॉन स्ट्रैटन हौली द्वारा लिखित, पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा संपादित और अशोक कुमार द्वारा अनुदित पुस्तक 'भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर' से संत कबीर पर लिखा अंशः

पुस्तक अंशः भक्ति के तीन स्वर: मीरा, सूर, कबीर

कौन थे कबीर?

कबीर को ग्रहण करने के इतिहास के अलावा यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि कबीर कौन थे. हम देख चुके हैं कि यह इतिहास संयोग से, धुंधला नहीं है लेकिन यह एक मूलभूत समस्या लिये हुए है. अगर हम यह मान भी लें कि बीजक के मूल सूत्र उस वाचिक परम्परा में हैं जो इसकी पांडुलिपियों से भी पुरानी है, तो हम इस तथ्य का क्या करेंगे कि पश्चिमी तथा पूर्वी परम्पराएँ एक समूह की कविताओं पर आकर नहीं मिलतीं, जिनके कोश को हम 'वास्तविक' कबीर का प्रतिनिधि मान सकते हैं. यह हमेशा उलझन में डालेगा, और जब हम कबीर के जीवन से जुड़ी किंवदंतियों पर नजर डालते हैं तो और भी उलझनें पैदा होती हैं. ये किंवदंतियाँ 16वीं सदी के अन्तिम वर्षों में उभरीं. बेशक ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि वे उनकी आवाज की ध्वनि पहचानते हैं.

20वीं सदी के मध्य में हुए महान विद्वान हजारीप्रसाद द्विवेदी इसके अच्छे उदाहरण हैं. उन्होंने कबीर का भक्तिवाला रूप प्रस्तुत किया जिसे कई लोगों ने स्वीकार किया. द्विवेदी जी का कहना था कि उनके व्यक्तित्व को ब्राह्मण समाज सुधारक स्वामी रामानन्द की शिक्षा ने स्वरूप प्रदान किया. दूसरे लोग भी गुरु की आवाज की ध्वनि को पहचानते हैं. कबीर के गीतों के प्रसिद्ध गायक नेत्रहीन राजस्थानी कलाकार बिरजापुरी महाराज कहते हैं, 'अगर किसी वाणी का अर्थ गहरा है तो बेशक वह कबीर की ही होगी; अगर ऐसा नहीं है तो वह केवल नकल है.' दुर्भाग्य से, इन गीतों के गायन से जो कबीर उभरते हैं, वे द्विवेदी जी के कबीर से काफी अलग हैं. इसलिए, जैसाकि एक विद्वान ने कहा है, यह कहना काफी नहीं होगा कि हम 'कबीर को उनके बोल और उनके सन्दर्भ में ही लें.' कौने-से बोल? कौन-से सन्दर्भ?

हम स्वामी रामानन्द से ही शुरू करें, क्योंकि कबीर को उन्हें परिभाषित करनेवाली वंश-परम्परा से जोड़ने के लिए वे बहुत महत्त्वपूर्ण हैं.

रामानन्द द्वारा कबीर को दीक्षा देने की हास्यप्रद कहानी उनके सन्तचरित का एक केन्द्र्रीय तत्त्व है. कहानी यह है कि रामानन्द गंगास्नान करने जा रहे थे तभी कबीर ने ऐसा कुछ किया कि वे कबीर से टकरा गए. रामानन्द के मुख से फूट पड़ा : 'राम!- कबीर ने इसे ही दीक्षा का मंत्र मान लिया. ठाकुर ने क्षितिमोहन सेन द्वारा उपलब्ध कराई गई कविताओं का अनुवाद करते हुए एक कविता में रामानन्द को पाया और इसने उन्हें आश्वस्त कर दिया कि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध एक ऐतिहासिक तथ्य है. लेकिन अफसोस यह है कि पुरानी पांडुलिपियों के अध्ययन से कहीं भी इस कविता का पता नहीं चलता, और न ही रामानन्द का नाम किसी और पुरानी कविता में मिलता है, जबकि यह अपेक्षा की जा सकती है कि कबीर के लिए वे अगर इतने महत्त्वपूर्ण थे, तो उनका उल्लेख किसी कविता में मिलता.

कबीर के गहन जानकार पुरुषोत्तम अग्रवाल तथा डेविड लोरेंजेन यद्यपि इससे असहमत हैं, मुझे इस जुड़ाव को सन्तचरित से पुनर्जीवित करने का कोई रास्ता नहीं सूझता. रामानन्द बेहद कम प्रमाण के साथ कई सारी समस्याओं का समाधान कर देते हैं. वे उस टूटी कड़ी को थमा देते हैं, जो कबीर के बनारसी 'पूर्वी- नास्तिक पक्ष को उस आस्तिक भक्तिवादी व्यक्तित्व से जोड़ती है जो सुदूर पश्चिम में उभरी पांडुलिपियों में व्यापक रूप से उपस्थित है. वे कबीर को विशिष्ट मठ परम्परा- रामानन्दी परम्परा- में स्थापित करते हैं और साथ ही मुसलमान परिवार की उनकी पृष्ठभूमि का सूत्र भी थमाते हैं, जैसाकि उनके नाम से स्पष्ट है. और फिर बाद में उन्हें उस तरह की भक्ति के साथ धर्मांतरण से भी जोड़ते हैं, जिसे कुछ ब्राह्मण तो अपना कहते ही हैं. यह सब काफी साफ-सुथरा है, और कविताओं में बहुत कम प्रतिध्वनित है. मुझे तो निचली जाति के उन आलोचकों का साथ देना पड़ेगा, जो यह मानते हैं कि रामानन्द तथा कबीर के बीच सम्पर्क महज एक पवित्रतावादी हस्तक्षेप था- कबीर को अपनी जड़ों से काटने का तरीका.

नाभादास ने लगभग 1600 में अपनी कृति 'भक्तमाल में कबीर का जो चित्र प्रस्तुत किया है, वह कहीं ज्यादा विश्वसनीय है. वैसे, वे भी वैष्णववाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं और खास कर रामानन्दी भी हैं. यह सच है कि नाभादास जो सामान्य सूची प्रस्तुत करते हैं, उसमें वे कबीर को रामानन्द के शिष्यों में दर्ज करते हैं लेकिन जब वे उनके बारे में प्रत्यक्ष तौर पर बात करते हैं तब तमाम पंथगत झुकावों से मुक्त रहते हैं. वे कहते हैं कि कबीर ने जातिगत भेदभावों को परिभाषित करनेवाले ब्राह्मणवादी सूत्रों के साथ ही 'युक्तिसंगत दर्शन की छह धाराओं तथा इस विचार को भी खारिज कर दिया था कि मनुष्य के जीवन को एक निश्चित क्रम का पालन करना ही चाहिए. ये वर्णाश्रम धर्म के मूलाधार थे, जो कि शास्त्रीय ब्राह्मणवादी चिन्तन के केन्द्र्रीय तत्त्व बन गए थे. नाभादास के अनुसार, कबीर असहमति के स्वर थे. अगर भक्ति नहीं है, तो यह सच्चे धर्म के बिलकुल विपरीत है. वे जिस मान्यता के लिए पहचाने जाते हैं, वह यह है कि संगठित धर्म निरर्थक है. ब्लाइ के मुताबिक, जो चीज सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह है- 'भक्ति' 'तीव्रता'.
 
समाज में उनकी जो स्थिति थी, उसके कारण यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कबीर यही रुख अपनाते, और नाभादास के मुताबिक गौर करनेवाली बात यह है कि उनके लिए जाति का कोई महत्त्व नहीं था. जैसाकि हमें केवल कुछ कविताओं से पता नहीं चलता, वे मुसलमान जुलाहे थे, जोकि हैसियत के लिहाज से काफी नीचे होता है. इसलिए, अचरज नहीं कि उनकी जैसी स्थिति में पड़े समुदाय उन्हें प्रभावशाली मानें. उनके प्रशंसकों में जाट, पंजाबी किसान हैं जो सिख समुदाय के मेरुदंड हैं और जो खुद को वर्णाश्रम धर्म के दायरे से बाहर बताते हैं. लेकिन हम यह न भूलें कि कई दूसरे लोगों- बेशक वैष्णवों तथा ब्राह्मणों तक- ने इस आह्वान को सुना.

कबीर की कविताओं के प्रारम्भिक संकलनों से जो एक महत्त्वपूर्ण सूत्र उभरता है, वह उन्हें प्रस्तुत करने के सन्दर्भों के कारण फीका पड़ जाता है, और 'इतिहास' वाले कबीर को छोड़ने से पहले उसे उसका श्रेय देने की जरूरत है. नाथों के नाम से ख्यात योगियों के समुदाय के प्रति कबीर का यह बुनियादी ऋण है. इस समुदाय की सीख शारीरिक परिवर्तन की तकनीक के प्रति दृष्टिकोण में रूपाकार लेती है, जो कबीर की कविताओं में प्राय: उपस्थित है. यह हठयोग है- सख्त शारीरिक अनुशासन के लिए कड़ा योग. ब्लाइ स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने इस आयाम को नहीं छुआ है. इसे वे 'शक्ति ऊर्जा का सम्पूर्ण विषय' ('द होल मैटर ऑफ शक्ति इनर्जी) बताते हैं. फिर भी, विचार तथा व्यवहार की एक व्यवस्था (जिसे कबीर ने कभी शक्ति से नहीं जोड़ा) के तौर पर यह धार्मिक तथा लाक्षणिक सुरक्षा का बोध (जिसे हम उनके नाम के साथ हमेशा जोड़ते रहे हैं) कराने में प्रमुख तत्त्व का काम करता है.

इसका अहसास करने के लिए हम फिर से प्राचीनतम दिनांकित पांडुलिपि को देखें. उसमें हम एक ऐसे कुएँ के बारे में पढ़ते हैं, जो उलटा है:

दुभर पनीआ भरनि न जाइ    मेरी बहुत त्रिषा गोबिन्द बिना न बुझाइ
ऊपर कूवटा लेज तलैहारी    कैसे नीर भरै पनीहारी
निघय्यै नीर भयौ घट भारी    गई निरास पांच पनिहारी
गुर उपदेस भर्यौं है नीर    राम सरनि होइ न पीवहि कबीर.

'दुभर पनीआ भरनि न जाइ' पंक्ति से शुरू होनेवाली कविता निश्चित ही अन्त:क्षेपित वीर्य के बारे में संकेत कर रही है, जिसे योगक्रिया, सम्भवत: तांत्रिक क्रिया के द्वारा मस्तिष्क की ओर क्षेपित किया गया है. चूंकि इस द्रव पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव नहीं पड़ता इसलिए इसे ज्ञानेंद्रियों (पाँच पनिहारी) के द्वारा खींचा नहीं जा सकता, और इसी वजह से 'पनिहारी' निराश हो जाते हैं. यह द्रव रहस्यमय ढंग से भारी है, यह शरीर को कब्जे में कर लेता है. ऐसा लगता है कि कबीर को नाथ योगियों की पूरी दिनचर्या मालूम है- कुंडलिनी ऊर्जाओं को नियंत्रित करना और इस अवस्था में सुख की अनुभूति करना- कम-से-कम मौखिक तौर पर- सब कुछ मालूम है. इसके बाद आश्चर्य प्रकट होता है. वे अन्त में कहते हैं कि वे इस पानी को नहीं पीएँगे. क्या वे चरम आनन्द और वीर्य स्खलन से इनकार कर रहे हैं, जैसाकि तांत्रिक लोग करते हैं? नहीं, शब्द तो ऐसा नहीं कह रहे हैं; बल्कि वे यह कह रहे हैं कि वे गुर उपदेस को मानने से इनकार कर रहे हैं. वे, जैसाकि नाथ योगी कह रहे हैं, इस बात को मानने से इनकार कर रहे हैं कि :

गगन मंडल मैं ऊंधा कूबा तहां अंमृत का बासा.
सगुरा होइ सु भरि भरि पीवै निगुरा जाइ पियासा...
 
कबीर तो राम या गोबिन्द का पान करेंगे. प्रारम्भिक पांडुलिपियों से प्राप्त कविताओं में हम कई बार इस कबीर से रू-ब-रू होते हैं- एक दिग्गज से, जो शारीरिक रूप से सक्रिय हैं, एक हठयोगी हैं, फिर भी जो अपनी पहचान अपने अन्तर में बसे सूक्ष्म गुरु से जोड़ते हैं, सच्चे गुरु राम/गोबिन्द से. यह नाथ योगी आधार का भक्ति पाठ है- सहजता, स्वत:स्फूर्तता और ईमानदारी का एक रूप, जो कि इसकी प्राथमिक लाक्षणिकता का काम करनेवाले शारीरिक द्रव अभियंत्रणा के उत्पाद से ज्यादा सरल है. अनुशासन का यह रूप- कम-से-कम अपने आप में एक लक्ष्य- उनके लिए नहीं है. आश्चर्य नहीं कि वे बनारस की गलियों में भरे रहनेवाले योगियों के बारे में बोल सकते हैं :
का नांगैं का बांधे चांम    जौ नहिं चीन्हसि आतमरांम
नांगे फिरें जोग जौ होई    बन का मिरग मुकुति गया कोई
मूंड़ मुड़ाएं जौ सिधि होई    सरगहिं भेंड़ न पहुंची कोई
बिन्दु राखि जौ तरिअै भाई   तौ खुसरै क्यूं न परम गति पाई
कहै कबीर सुनौं रै भाई     रांम नांम बिन किन सिधि पाई।

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पुस्तक: भक्ति के तीन स्वर- मीराँ, सूर, कबीर
लेखक: जॉन स्ट्रेटन हौली
अनुवाद: अशोक कुमार
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन 
विधा: आलोचना / अनुवाद
भक्ति मीमांसा श्रृंखला- सम्पादक: पुरुषोत्तम अग्रवाल
मूल्यः रुपए 250/ पेपरबैक, रुपए 895 /- हार्डबाउंड
पृष्ठ संख्याः 303

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