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पुस्तक अंशः जंगल के दावेदार, महाश्वेता देवी ने यों लिखी बिरसा मुंडा के संघर्ष की गाथा

आज बिरसा मुंडा की जयंती है. महाश्वेता देवी का उपन्यास 'जंगल के दावेदार' बिरसा के विद्रोह की रोमांचकारी, मार्मिक, प्रेरक सत्यकथा है. साहित्य आजतक पर इसी का अंश

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aajtak.in नई दिल्ली, 15 November 2019
पुस्तक अंशः जंगल के दावेदार, महाश्वेता देवी ने यों लिखी बिरसा मुंडा के संघर्ष की गाथा उपन्यास जंगल के दावेदार का कवर [सौजन्यः राधाकृष्ण प्रकाशन]

आज बिरसा मुंडा की जयंती है. आदिवासी स्वाभिमान के नायक, लोक देवता के रूप में स्थापित बिरसा का साहित्य से नाता बेहद घना है. बिरसा के जीवन संघर्ष ने समूचे भारतीय साहित्य, विशेषकर बंगला साहित्य को इतना प्रभावित किया कि एक समूचा दौर आदिवासी समुदाय, उनके जनजीवन और आंदोलन के विश्लेषणात्मक चित्रण से भर गया. हालांकि यह अनायास ही नहीं हुआ.
सुप्रसिद्ध बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी ने अपनी आत्मकथा तक में इसका जिक्र किया और लिखा कि सत्तर के दशक में साहित्यकारों एवं बंगाल के बुद्धिजीवियों के मानसिक नपुंसकता और अंधकार के क्षय का सबसे भयानक चेहरा हम देख सकते हैं. जहां देश और मनुष्य रक्ताक्त अभिज्ञता में जूझ रहे थे, वहीं बंगला साहित्य एक बड़े गंभीर दुख दर्द को छोड़कर परी देश के अलौकिक स्वप्न बाग में मिथ्या फूल खिलाने का 'व्यर्थ' आत्मघाती खेल में व्यस्त रहा गया था.
बिरसा मुंडा का जन्म साल 1875 में रांची के लिहातु में हुआ था. यह कभी बिहार का हिस्सा था पर अब यह झारखंड में आ गया है. साल्गा गांव में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद बिरसा चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढ़ने आए. बिरसा मुंडा को अपनी भूमि, संस्कृति से गहरा लगाव था. कहते हैं जब वह अपने स्कूल में पढ़ रहे थे तभी मुण्डाओं, मुंडा सरदारों जमीन जबरिया छिनी जाने लगी.
सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ यहीं से विद्रोह पनपने लगा. यहीं से बिरसा मुण्डा आदिवासियों के भूमि आंदोलन के समर्थक बन गए. उनके भाषणों में, वाद-विवाद में आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत बढ़ने लगी..और यहीं से शुरू हुआ उनके जीवन का संघर्ष.
महाश्वेता देवी ने बिरसा मुंडा के इसी जीवन संघर्ष पर बंगला उपन्यास ‘अरण्यर अधिकार’ लिखा, जो हिंदी में ‘जंगल के दावेदार’ नाम से छपा. महाश्वेता देवी का यह उपन्यास केवल एक साहित्यिक, व्यक्तिपरक या ऐतिहासिक आख्यान भर नहीं है, इसका एक अलग महत्त्व है. उन्होंने बेबस आदिवासियों के बीच मिशनरी गतिविधियों के पाखंड को भी उजागर किया है कि कैसे एक पादरी डॉ नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उसके अनुदेशों का पालन करें तो वह मुंडा सरदारों की छीनी हुई जमीन वापस करा देगा.
1886 से 1890 तक बिरसा का चाईबासा मिशन के साथ रहना उनके व्यक्तित्व का निर्माण काल था. यही वह दौर था जिसने बिरसा मुंडा के अंदर बदले और स्वाभिमान की ज्वाला पैदा कर दी. मुंडा सरदारों ने जब 1886-87 में भूमि वापसी का आंदोलन किया, तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बल्कि ईसाई मिशनरियों ने इसकी भी भर्त्सना की.
बिरसा मुंडा की बगावत के पीछे की वजहों में एक वजह वादाखिलाफी व फरेब भी था. कहते हैं बिरसा के तेवरों को देखते हुए उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया. 1890 में बिरसा तथा उसके पिता चाईबासा से वापस आ गए.
बिरसा मुंडा पर संथाल विद्रोह, चुआर आंदोलन, कोल विद्रोह का भी व्यापक प्रभाव पड़ा. अपनी जाति की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी. उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि मुंडाओं का शासन वापस लाएंगे तथा अपने लोगों में जागृति पैदा करेंगे. ‘जंगल के दावेदार’ बिरसा के इसी संघर्ष-यात्रा और अंग्रेजों के दमन की गाथा है. इस उपन्यास के बारे में लिखा गया हैः
बिहार के अनेक जिलों के घने जंगलों में रहनेवाली आदिम जातियों की अनुभूतियों, पुरा-कथाओं और सनातन विश्वासों में सिझी सजीव, सचेत आस्था का चित्रण! जंगलों की माँ की तरह पूजा करनेवाले, अमावस की रात के अँधेरे से भी काले -और प्रकृति जैसे निष्पाप- मुंडा, हो, हूल, संथाल, कोल और अन्य बर्बर (?), असभ्य (?) जातियों द्वारा शोषण के विरुद्ध और जंगल की मिल्कियत के छीन लिए गए अधिकारों को वापस लेने के उद्देश्य से की गई सशस्त्र क्रान्ति की महागाथा!
25 वर्ष का अनपढ़, अनगढ़ बिरसा उन्नीसवीं शती के अन्त में हुए इस विद्रोह में संघर्षरत लोगों के लिए ‘भगवान’ बन गया था - लेकिन ‘भगवान’ का यह सम्बोधन उसने स्वीकार किया था उनके जीवन में, व्यवहार में, चिन्तन में और आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में आमूल क्रान्ति लाने के लिए. कोड़ों की मार से उधड़े काले जिस्म पर लाल लहू ज्यादा लाल, ज्यादा गाढ़ा दीखता है न! इस विद्रोह की रोमांचकारी, मार्मिक, प्रेरक सत्यकथा है- जंगल के दावेदार. हँसते-नाचते-गाते, परम सहज आस्था और विश्वास से दी गई प्राणों की आहुतियों की महागाथा- जंगल के दावेदार ! तो साहित्य आजतक पर पढ़िए इसी उपन्यास का अंश.

पुस्तक अंशः जंगल के दावेदार

9 जून, साल 1900. राँची की जेल.
सवेरे आठ बजे बिरसा खून की उल्टी कर, अचेत हो गया. बीरसा मुण्डा- सुगाना मुण्डा का बेटा; उम्र पच्चीस वर्ष- विचाराधीन बन्दी. तीसरी फरवरी को बीरसा पकड़ा गया था, किन्तु उस मास के अन्तिम सप्ताह तक बीरसा और अन्य मुण्डाओं के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था. उस समय मुण्डा लोगों की ओर से बैरिस्टर जेकब लड़ रहे थे. वह अब भी लड़ रहे हैं. बीरसा को पता था कि जेकब उनकी ओर से लड़ेंगे. बिरसा को पता था कि जेकब को उसके लिए लड़ना न पड़ेगा. क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत-सी धाराओं में बिरसा को पकड़ा गया था, लेकिन बिरसा जानता था कि उसे सजा नहीं होगी.
भोला बिरसा अनजान है, लेकिन वह एक तसवीर के बाद दूसरी तसवीर- इसे पहचान सकता है- सब देख सकता है. भात मुण्डा लोगों के जीवन में स्वप्न ही बना रहता है. घाटो एकमात्र खाद्य है जो मुण्डा लोगों को खाने को मिलता है. इसी से भात का मिलना एक सपना बना रहता है. किसी-न-किसी तरह भात के सपने ने ही बीरसा के जीवन को नियन्त्रित कर रखा था. अधिकतर समय बीरसा की जोरों की शिकायत रहती है- 'मुण्डा केवल घाटो ही क्यों खाएँ? दिकू लोगों की तरह वे भात क्यों न खाएं? और भात राँधा था, इसलिए तीसरी फरवरी को बिरसा पकड़ा गया. बिरसा सो रहा था. औरत भात पका रही थी. नीले आकाश में धुआँ उठ रहा था, बीरसा नींद की गोद में था; तभी लोगों ने उठता हुआ धुआँ देख लिया.
उसके बाद बनगाँव- उसके बाद खुंटी- उसके बाद राँची. बीरसा के हाथों में हथकड़ियाँ थीं; दोनों ओर दो सिपाही थे. बीरसा के सिर पर पगड़ी थी; धोती पहने था. बदन पर और कुछ नहीं था- इसी से हवा और धूप एक साथ चमड़ी को छेद रहे थे. राह के दोनों ओर लोग खड़े थे. सभी मुण्डा थे. औरतें छाती पीट रही थीं; आकाश की ओर हाथ उठा रही थीं आदमी कह रहे थे, 'जिन्होंने तुम्हें पकड़वाया है, वे माघ महीना भी पूरा होते न देख पाएँगे वे अगर जाल फैलाए रहते हैं तो उस जाल में पकड़े शिकार को उन्हें घर नहीं ले जाने दिया जाएगा.'
किन्तु बिरसा उन पर खफा नहीं होगा. पकड़वा दिया; क्यों न पकड़वा देते? डिप्टी कमिश्नर ने उन्हें गिनकर पाँच सौ रुपए नहीं दिये क्या? पाँच सौ रुपए बहुत होते हैं! किसी भी मुण्डा के पास तो पाँच सौ रुपए कभी नहीं हुए; नहीं होते. मुण्डा अगर रात में सोते-सोते सपना भी देखता है तो सपने में बहुत होता है तो वह महारानी मार्का दस रुपए देख पाता है. उन्हें पाँच सौ रुपए मिले हैं- क्यों न बिरसा को पकड़वा देते?
असल में बिरसा को अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था. नींद क्यों आ गई ? नींद न आ जाती तो वह जागता रहता. आग जलाकर भात न रांधने देता. जब आग न सुलगती, आसमान में धुआँ न उठता, कोई भी देख या जान न पाता! राह चलते-चलते बीरसा के मन में हो रहा था- इस समय भी अचेत बीरसा के मन में आया- वह आग उन्होंने बुझा तो दी थी न? मुण्डा लोगों को कम ही ध्यान रहता है. धक-धक जलती आग से जंगल जल जाता है, दावानल लपलपाकर फैल जाती है, और बरसों के लिए जंगल सूखा, और बड़ा गरम हो जाता है. इसी से तो बिरसा ने ‘उलगुलान’ में सबकुछ अच्छी तरह जला डालना चाहा था. उलगुलान की आग में जंगल नहीं जलता; आदमी का रक्त और हृदय जलता है! उस आग में जंगल नहीं जलता! मुण्डा लोगों के लिए जंगल नए सिरे से माँ की तरह बन जाता है- बीरसा की माँ की तरह; जंगल की सन्तानों को गोदी में लेकर बैठता है. इसीलिए तो बिरसा ने जंगल का अधिकार चाहा था! वह जंगलों को दिकू लोगों के अधिकार से छीन लेगा. जंगल मुण्डा लोगों की माँ है और दिकू लोगों ने मुण्डा लोगों की जननी को अपवित्र कर रखा है. बीरसा ने उलगुलान की आग जलाकर माँ-जंगल को शुद्ध करना चाहा था. उसके बाद मुण्डा और हो, कोल और संथाल उराँव लोगों ने जंगल के स्वामित्व का दावा, छोटा नागपुर के अरण्य का अधिकार, पलामू, सिंहभूम, चक्रधरपुर- सारे जंगलों का अधिकार चाहा था जिससे वे माँ की गोद में फिर से पसर सकें.
बीरसा समझ गया कि अब वह चला जाएगा, क्योंकि आज ही सवेरे उसने खून की बड़ी भयानक कै की थी. अचेत होते-होते भी अपने खून का रंग देखकर बीरसा मुग्ध हो गया था. खून का रंग इतना लाल होता है! सबके ही खून का रंग लाल होता है; बात उसे बहुत महत्त्व की और जरूरी लगी. मानो यह बात किसी को बताने की जरूरत थी! किसे बताने की जरूरत थी? किसे पता नहीं है? अमूल्य को पता है, बीरसा को मालूम है, मुण्डा लोग जानते हैं. साहब' लोग नहीं जानते. जेकब जानता है. लेकिन जेल का सुपरिटेंडेंट, डिप्टी कमिश्नर- ये लोग नहीं जानते. नहीं जानते- इसलिए न वे लोग फौज की टुकड़ी, और बन्दूक, और तोप लेकर लँगोटी लगाए तीर-बरछा-बलोया और पत्थर का सहारा लेनेवाले मुण्डा लोगों को मारने आए थे. बीरसा अगर बोल सकता तो कह जाता- 'साहब लोगो! खून के रंग में कोई अंतर नहीं होता. मारने पर जितनी तुमको चोट लगती है, मुण्डा लोगों को भी उतनी ही लगती है. मुण्डा लोगों के जीवन पर तुम लोगों ने जबरदस्ती अधिकार जमा लिया है. उस अधिकार को छोड़ने में तुमको जैसा लगता है, जंगल की आबाद जमीन को दिकू लोगों के हाथों में देते मुण्डा लोगों को भी वैसा ही लगता है.'
किन्तु बीरसा कुछ कह न पाया. वह आँखें नहीं खोल पाता है -किसी ने अन्दर जैसे महुआ के तेल की मशाल और ढिबरी बुझा दी हो! जैसे कोई बीरसा को हिला रहा है! कह रहा है: सो जाओ, सो जाओ, सो रे।
***
पुस्तक: जंगल के दावेदार
लेखक: महाश्वेता देवी
विधा: उपन्यास
प्रकाशन:
राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य:
299/- रुपए पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 284

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