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योग करता हूं, फतवा जारी करने वालों का स्‍वागत है: जावेद अख्‍तर

मशहूर गीतकार जावेद अख्‍तर ने साहित्‍य आजतक के दूसरे दिन पहले सत्र में शिरकत की. इस दौरान जावेद साहब ने अपने अतीत, राष्‍ट्रवाद और पद्मावती पर बात की.

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aajtak.in [Edited by: महेन्‍द्र गुप्‍ता]नई दिल्‍ली , 12 November 2018
योग करता हूं, फतवा जारी करने वालों का स्‍वागत है: जावेद अख्‍तर जावेद अख्‍तर

मशहूर गीतकार जावेद अख्‍तर ने साहित्‍य आजतक के दूसरे दिन पहले सत्र में शिरकत की. इस दौरान जावेद साहब ने अपने अतीत और संघर्ष पर बात की. जावेद अख्‍तर ने योग पर कहा कि वे 72 साल के हैं, योग करते हैं और जिसे उनके योग करने पर फतवा जारी करना है, उसका स्‍वागत है.

अकबर रोड के नाम बदले जाने के विदाद पर जावेद अख्तर ने कहा कि बिना अकबर के देश का इतिहास पूरा नहीं होता. अकबर बहुत बड़ा आदमी था. ऐसे समय में जब यूरोप में सेक्युलर को समझा जा रहा था तब अकबर ऐसा शहंशाह था जो सेक्युलरिज्म को प्रैक्टिस कर रहा था. जावेद अख्तर ने कहा कि मुगल काल में हिंदुस्तान दुनिया का सबसे अमीर देश था.

जावेद अख्तर ने कहा कि 1999 में ऑपरेशन विजय के समय वह कारगिल, बटालिक, द्रास के दौरे पर गए थे. इस दौरान उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई. जावेद से पुण्य ने पूछा कि आखिर कभी-कई आपको राष्ट्रवाद के सवाल पर गुस्सा क्यों आ जाता है. जावेद ने कहा कि राष्ट्रवाद राजनीतिक दल और नेता दोनों से बहुत बड़ा है. यदि कोई नेता सोचे कि वह देश से बड़ा है तो यह सकी मुगालता है. जावेद ने कहा कि संभव है कि मैं सरकार से न जुड़ा हूं लेकिन देश से मैं हमेशा जुड़ा हूं.

फिल्म और इतिहास में भेद रखें

ताममहल के मुद्दे पर जावेद ने कहा कि ताजमहल भी मिस्र के पिरामिड की तरह आर्किटेक्चर का एक वंडर है. दिल्ली के आर्किटेक्चर पर मुगल काल की छवि है. जावेद ने कहा कि इस्लाम में चेहरा बनाने हराम है लिहाजा इस दौर में कला के छेत्र में म्यूजिक और पेंटिंग अपने शीर्ष पर पहुंचे. जावेद ने कहा कि फिल्म को इतिहास और इतिहास को फिल्म समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.

जब 20 साल का भी नहीं था, तब मुंबई आया था

जावेद अख्‍तर ने कहा, जिस तरह इंसान को अपनी शोहरत, फेम, पावर पर घमंड नहीं करना चाहिए, उसी तरह हमें अपने मुफलिसी और नाकामी के दिनों पर घमंड नहीं करना चाहिए. जब हमने दुख को सीने से लगा लेते हैं. हमें ये गुमान होता है कि देखो हम कहां से कहां पहुंच गए.

ये सच है कि जब मैं मुंबई आया था, तब 20 साल का भी नहीं था. स्‍टेशन उतरा तो मेरे साथ एक टीन था, जिसमें तीन जोड़ी कपड़े थे और एक जोड़ी पहने था. मेरे पास 27 नए (पैसा) थे. गनीमत है कि सिर्फ मेरे साथ लूट नहीं हुई, मेरा मर्डर नहीं हुआ, किसी बस के नीचे नहीं आया, बाकी सब मेरे साथ हुआ. सुबह खाना का इंतजाम हो जाता था तो शाम के बारे में सोचने लगता था. देखिए बलिदान कोई चॉइस नहीं है. बलिदान तो गौतम बुद्ध ने किया था. जो महलों को छोड़कर जंगल में चले गए. हमारे तो आगे भी जंगल पीछे भी जंगल है. गैंड टोटल ये हैं कि जिंदगी ने मुझ पर बड़ी मेहरबानी की और सब बुरे दिन कट गए.

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