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साहित्य आजतक: सत्य व्यास बोले- 1948 में भी होता था अबे-तबे की भाषा का इस्तेमाल

सत्य व्यास ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा केदारनाथ गुप्त ने 1948 में अबे-तबे की भाषा का इस्तेमाल अपनी किताब में किया था. भगवतीचरण वर्मा की किताब है तीन वर्ष उसमें देखेंगे तो छोटी-मोटी गालियां हैं. जिसके लिए हमें कहा जाता है कि हम भाषा को दूषित कर रहे हैं.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 02 November 2019
साहित्य आजतक: सत्य व्यास बोले- 1948 में भी होता था अबे-तबे की भाषा का इस्तेमाल साहित्य आजतक के मंच पर विजयश्री तनवीर, दिव्य प्रकाश दुबे और सत्य व्यास

  • साहित्य आजतक के दूसरे दिन की शुरुआत छठ गीत से हुई
  • बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने मंच से गाए कई भोजपुरी गीत

साहित्य का सबसे बड़ा महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' शुक्रवार (1 नवंबर) से शुरू हो गया है. कार्यक्रम का आज दूसरा दिन है. दूसरे दिन 'साहित्य आजतक' के 'हल्ला बोल' मंच पर 'साहित्य का यंगिस्तान' सेशन में तीन युवा लेखकों विजयश्री तनवीर, दिव्य प्रकाश दुबे और सत्य व्यास ने अपनी राय रखी. इस सेशन का संचालन आजतक के एग्जिक्यूटिव एडिटर सईद अंसारी ने किया. इस चर्चा के दौरान तीनों अतिथियों ने अपनी बातें बेबाकी से रखीं. चर्चा की शुरुआत करते हुए सईद ने कहा कि हमारे तीनों मेहमानों से सवाल बस यही है कि क्या जो हमारा आज का युवा है इसे अलग साहित्य चाहिए.

विजयश्री तनवीर ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि पहले क्या था कि लेखक ही रचनाएं लिखते थे और लेखक ही पढ़ते थे कवि ही कविताएं लिखते थे और कवि ही पढ़ते थे अभी युवाओं ने लेखकों से अलग एक नया पाठक वर्ग तैयार किया है. वो एक बड़ा पाठक वर्ग है, वो लेखक भी नहीं है, वह एक आम पाठक है. जो सिर्फ जुड़े हुए हैं. अपना इंटरटेनमेंट कर रहे हैं. अभी कुछ समय से हिंदी बहुत उपेक्षित हो गई थी. क्योंकि बड़ी भारी-भरकम शब्द समझ नहीं आ रहा था. युवाओं ने हिंदी को आसान कर लिखा. लेकिन बड़े लोगों ने उन्हें अंगीकार नहीं किया. मेरा कहना है कि हिंदी को बंधन मुक्त बना कर नए लोगों को भी आगे बढ़ाएं.

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दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा भाषा की शुद्धता बहुत बड़ी चीज है. एक मिसकंसेप्शन है कि हमारे दादा-नाना बहुत शुद्ध हिंदी बोलते थे लेकिन ऐसा नहीं है. जो लोग इंस्टाग्राम पर स्टोरी बना रहे होते हैं वो वैसी भाषा तो नहीं बोलेंगे. इसलिए हमने जो बातें हम चाय की टपरी पर बोलते हैं वैसी भाषा में लिखने की कोशिश की.

1948 में अबे-तबे की भाषा का इस्तेमाल
सत्य व्यास ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा केदारनाथ गुप्त ने 1948 में अबे-तबे की भाषा का इस्तेमाल अपनी किताब में किया था. भगवतीचरण वर्मा की किताब है तीन वर्ष उसमें देखेंगे तो छोटी-मोटी गालियां हैं. जिसके लिए हमें कहा जाता है कि हम भाषा को दूषित कर रहे हैं. बस इतना है कि हम उस समय में आए जब हमारी हिंदी को सोशल मीडिया का साथ भी मिला. हमने कुछ नया शुरू नहीं किया. हमें बस फोकस ज्यादा मिला. उसमें हमारी मार्केटिंग स्ट्रेटजी भी काम की रही. जो लैंग्वेज हमारी थी वो लोगों तक पहुंची और लोगों को हमारा लिखा पसंद आया.

आज स्टार हर जगह लगा हुआ है
अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार पर बात करते हुए विजयश्री तनवीर ने कहा यह एक कहानी संग्रह है और उसमें ज्यादातर कहानियां एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर्स पर केंद्रित हैं. लेकिन ऐसा सोचकर मैंने नहीं लिखा था. चौथा प्यार के बारे में मैं कहती हूं कि क्या हमारे भी कई अफेयर्स नहीं हो गए हैं. हम कई बार लोगों के प्रति झुक जाते हैं. जो आम जीवन में होता है वही मैंने लिखा है. दिव्य प्रकाश दुबे ने अपनी किताब कंडीशन अप्लाई के बारे में बात करते हुए कहा कि जो बात धीरे से कही जाती है समाज में उस बात से मैंने अप्रोच लिया था. आज स्टार हर जगह लगा हुआ है.

मेरी पहली किताब में थी भरमार गाली
सत्य प्रकाश ने चर्चा में अपनी राय रखते हुए कहा कि मुझे लगता है कि जिस तरह मैं लिखता हूं उसमें गलतियों की बहुत संभावना है क्योंकि मैं लिखते हुए खुद को बहुत फ्रीडम देता हूं. मेरी पहली किताब आई तो मैंने उसमें भरमार गाली थी. लेकिन वह बनारस की पृष्ठभूमि पर थी और वहां गाली के बिना कोई बात ही नहीं होती. दूसरी किताब मैंने दिल्ली दरबार पर लिखी जब मैंने उसे प्रकाशक के पास भेजा तो उसने कहा इसमें एक कैरेक्टर राहुल मिश्रा के 7 अफेयर हैं, ऐसा होता नहीं आम जिंदगी में. मैंने उनसे कहा कि मैं नया-नया हूं, आपको मेरी दूसरी किताब छापनी है आप 4 अफेयर कर दें लेकिन राहुल मिश्रा के 7 अफेयर थे.

कंटेंट ही किताब को आगे बढ़ाएगा
विजयश्री ने भाषा की शुद्धता पर बात करते हुए आगे कहा कि मेरा मानना है कि भाषा को हमें विकृत नहीं करना चाहिए. आप लिखिए, जहां जरूरत पड़ेगी लिखना पड़ेगा, माहौल तो बनाना पड़ेगा, लेकिन जबरदस्ती ठूंसना नहीं चाहिए. जबरन गाली भर कर किताब को मशहूर नहीं करना चाहिए. मसाला देने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. सत्य प्रकाश ने चर्चा में आगे हिस्सा लेते हुए कहा कि हमारे गुरुओं ने कभी भी कंट्रोवर्सी के जरिए लोकप्रिय होने की सलाह नहीं दी. उन्होंने हमेशा यही कहा कि तुम्हारे कंटेंट में दम होना चाहिए. कंट्रोवर्सी और मार्केटिंग स्ट्रेटजी से एक-दो दिन ही बात होगी. कंटेंट ही किताब को आगे बढ़ाएगा.

जो भाषा सब बोलते हैं वही हमने लिखा
दिव्य प्रकाश दुबे ने इस बारे में अपनी राय रखते हुए कहा कि मनोहर श्याम जोशी की वन लाइन थॉट है कि हिंदी में पीठ ठुकवाने के लिए बहुत पैर दबाने पड़ते हैं. हम सारे नए लोगों ने कभी यह लोड नहीं लिया इसीलिए हमारे ऊपर कोई बैगज नहीं लिया. हम किसी हिंदी की स्टेब्लिस्ड मैग्जीन में नहीं छपे थे. लेखक बनने का जो स्टैंडर्ड प्रॉसेस है किसी ने भी वो अप्रोच नहीं ली. हमारे जो तरीके थे हमने उसी को इस्तेमाल करके लिखा. जिस तरह की भाषा सब बोलते थे उसी पर ईमानदारी बरतते हुए हमने वैसे ही लिखा. कपोल कौन बोलता है अभी.

अभी जनता जागरुक है
विजयश्री ने कहा कि अभी जागरुक जनता है, हम सभी जानते हैं कि समाज में क्या हो रहा है क्या नहीं हो रहा है. लेखक के तौर पर हमारी सामाजिक जिम्मेदारी जरूर बनती है कि मैं क्या मैसेज दे रही हूं, मैं अश्लीलता नहीं फैला रही हूं. मैं नहीं कह रही हूं कि आप 8 अफेयर्स बनाओ, मैंने सिर्फ यह दिखाया कि यह हो रहा है, मैंने इसका समर्थन बिल्कुल नहीं किया. मैंने यह नहीं कहा कि यही होना चाहिए, सवाल छोड़े हैं.

हमें लोगों ने बहुत प्रोत्साहित किया

सत्य प्रकाश ने कहा कि मुझे कभी नहीं लगा कि मैं किसी धमक के साथ आया हूं या मैंने कुछ अलग किया है या मैं अलग करने वाला हूं. दिव्य प्रकाश ने कहा कि हम सारे लोग जो नई ब्रीड वाले आगे आए तो हमारा अनुभव अच्छा रहा. मुझे हमेशा लगा कि हमें लोगों ने बहुत प्रोत्साहित किया. पुराने लोगों ने बहुत प्रोत्साहित किया. कुछ टसल लोग हर जगह होते हैं. हमारे रास्ते में पॉलिटिक्स आई ही नहीं. हमें पता ही नहीं थी किताब कैसे छपती है. हमारी किताबें बिकीं ऐसे कि एक घर में लोगों ने 10-10 लोगों को किताबें पढ़वाईं. कोई मठाधीश आपको ऐसा ऑडियंस नहीं दे सकता.

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गुटवादिता सभी जगह है
विजयश्री ने कहा कि गुटवादिता सभी जगह है. नए लोग जब आते हैं तो लोगों को लगता है कि ये क्या लिख पाएगा, प्रकाशक भी नहीं जानता क्योंकि हम कहीं छपे नहीं होते हैं. छपने की लेखकों की जो प्राकृतिक प्रक्रिया है उसके तहत हम नहीं आते. इसलिए प्रकाशक पैसे मांगते हैं. मुझे रत्ती भर संघर्ष नहीं किया, मैंने पब्लिशर को कॉल किया तो उन्होंने कहा कि मेरे एडिटर को कुछ कंटेंट भेज दिए. उसके तीन दिन बाद उनका कॉल आया कि हम सबसे पैसे लेकर उनको नहीं छापते हैं. जिस कंटेंट में हमें लगता है कि इसको हम बेंच पाएंगे हम उससे पैसे नहीं लेंगे. घोड़ा अगर घास से यारी करेगा तो क्या खाएगा. पब्लिकेशन चलाने के लिए भी पैसा चाहिए.

प्रकाशक की अपनी मजबूरी होती है
सत्य प्रकाश ने भी कहा कि उनसे कभी पब्लिशर की तरफ से पैसे की मांग नहीं हुई. लेकिन प्रकाशक की भी अपनी मजबूरी होती है. उसके पास एक महीने में 150 पांडलुपियां आती हैं. बहुत समय ऐसा होता है कि उसे 5-10 पांडलुपियां पसंद आती हैं. उसमें वह अपना पैसा लगाता है बाकी लोगों को वह बोल देता है कि इनको हम नहीं छाप सकते या इस किताब को हम साझा पूंजी से छापेंगे. कहने का मतलब अगर आपको किताब छपवानी है तो आधा पैसा आप देंगे आधा हम लगाएंगे. इसके बाद उस 140 पांडलुपियों में से 70 तैयार हो जाते हैं और 70 कहते हैं कि हमसे पैसे मांगे गए. 70 लोग जो पैसे लगाकर किताब छपवाते हैं उनके लिए ही छपास रोग कहा जाता है. साल में 100-200 किताबें आती हैं. यह लेखक पर है कि जब प्रकाशक ने कंटेंट छापने से मना कर दिया तो आप उसकी बात मानें और अपने काम में मेहनत करें.

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दिव्य प्रकाश ने कहा कि अब स्थिति बदल गई है अब तो हम पहले पैसे मांगते हैं फिर किताब छपने के लिए देते हैं. लोगों को लगता है कि अगर मेरी किताब छप जाएगी तो मैं अलग वर्ग में शामिल हो जाउंगा. समाज में दबदबा हो जाएगा. लोग मेहनत नहीं करना चाहते वहीं हम जब किताब भेजते हैं तो कई बार रिजेक्ट होती है और हम उसे रि-राइट करते हैं.

'बागी बलिया' का लोकार्पण
अपनी नई किताब बागी बलिया के बारे में बताते हुए सत्य व्यास ने कहा कि यह मेरी चौथी किताब है और यह हिंदू-मुस्लिम सौहार्द पर आधारित है. यह सौहार्द ही अभी गायब हो रहा है. छात्र संघ के चुनाव के भीतर की बातें हैं. आप पढ़ेंगे तो आपको किताब जरूर पसंद आएगी. कार्यक्रम के पश्चात हिंद युग्म से छपी सत्य व्यास की पुस्तक 'बागी बलिया' का लोकार्पण भी किया गया.

शुक्रवार को यूं हुई कार्यक्रम की शुरुआत
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की सरस्वती वंदना और इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने कार्यक्रम के उद्घाटन संबोधन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई . इस बार 'साहित्य आजतक' में सात मंच हैं जहां से लगातार तीन दिन 200 हस्तियां आपसे रू-ब-रू होंगी. साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति का यह जलसा 3 नवंबर तक चलेगा.

इस साल शुरू हुआ था 'साहित्य आजतक' का सफर
साहित्य आजतक कार्यक्रम का आयोजन इस बार भी दिल्ली के  इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में किया गया है. तीन दिन तक चलने वाले साहित्य के महाकुंभ साहित्य आजतक में कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति और सिनेमा जगत की मशहूर हस्तियां शामिल होंगी. बता दें कि साल 2016 में पहली बार 'साहित्य आजतक' की शुरुआत हुई थी. साहित्य आजतक कार्यक्रम के आयोजन का यह चौथा साल है.

इस बार कई भारतीय भाषाओं को किया गया है शामिल
इस बार साहित्य आजतक में कई और भारतीय भाषाओं के दिग्गज लेखक भी आ रहे हैं. जिनमें हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, अंग्रेजी के अलावा, राजस्थानी, पंजाबी, ओड़िया, गुजराती, मराठी, छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाएं और कई बोलियां शामिल हैं.

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