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साहित्य आजतक 2019: नीरज मुसाफिर ने बताया यात्राओं के लिए क्या करना पड़ता है

एवरेस्ट से भी ऊंचा सेशन में ट्रैवल ब्लॉगर नीरज मुसाफिर और लेखक उमेश पंत ने अपने अनुभव साझा किए. दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन में इंजीनियर नीरज मुसाफिर ने बेबाकी से कहा कि यात्राओं के लिए अपना रिकॉर्ड खराब करवाना पड़ता है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 05 November 2019
साहित्य आजतक 2019: नीरज मुसाफिर ने बताया यात्राओं के लिए क्या करना पड़ता है साहित्य आजतक के मंच पर नीरज मुसाफिर और उमेश पंत

  • खुशी ज्यादा महत्वपूर्णः मुसाफिर
  • जाने से पहले जान लें भूगोलः पंत

साहित्यकारों के महाकुंभ साहित्य आजतक के तीसरे और अंतिम दिन असगर वजाहत जैसी शख्सियत ने मंच की शोभा बढ़ाई, तो वहीं ट्रैवल राइटिंग के जरिए पर्यटन को नया आयाम दे रहे घुमक्कड़पंथी युवा रचनाकारों ने भी. एवरेस्ट से भी ऊंचा सेशन में ट्रैवल ब्लॉगर नीरज मुसाफिर और लेखक उमेश पंत ने अपने अनुभव साझा किए.
दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन में इंजीनियर नीरज मुसाफिर ने बेबाकी से कहा कि यात्राओं के लिए अपना रिकॉर्ड खराब करवाना पड़ता है. बॉस उतनी छुट्टी नहीं देते. उन्होंने कहा कि दफ्तर में फाइलें भरने से इतर भी जिंदगी है. खुशी ज्यादा महत्वपूर्ण है. मुसाफिर ने कहा कि ऑनलाइन लिखने का शौक था. मुसाफिर हूं यारों- नाम से ब्लॉग लिखना शुरू किया फिर यात्राएं होतीं चली गईं. लद्दाख पहुंच गया तो एवरेस्ट के बेस कैंप तक भी जा पहुंचा. उन्होंने एक यात्रा से जुड़ा किस्सा बताते हुए कहा कि 15 दिन की छुट्टी में बाइक से गोवा निकल पड़ा और पहुंचते ही वहीं खड़ी कर दिल्ली लौट ऑफिस ज्वाइन कर लिया. चार महीने बाद फिर छुट्टी ली और गोवा से बाइक लेकर दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल पड़ा.
हर जगह अपने आप में अनूठी
मुसाफिर ने अपनी यात्रा के संस्मरण साझा करते हुए कहा कि पहली यात्रा आज से 14 वर्ष पूर्व सन 2005 में की थी. तब कांवड़ लेने मेरठ से हरिद्वार गया था. उन्होंने कहा कि तब पहाड़ देखने की इतनी ललक थी कि बस की बोनट पर बैठकर सफर किया. तब लिखता नहीं था. मुसाफिर ने कहा कि नवंबर 2008 से लिखना शुरू किया. फैन्स की अच्छी खासी जमात तैयार हो गई. फेसबुक पर इसी जमात में मेरी पत्नी भी शामिल थीं. मुझे जीवनसंगिनी भी फेसबुक ने दिया.

उन्होंने कहा कि हर जगह अपने आप में अनूठी होती है. पहाड़ में प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है, तो वहीं राजस्थान में इतिहास और दक्षिण भारत में मंदिर. मुसाफिर ने गर्मियों में हिमाचल यात्रा का जिक्र किया और बताया कि रजाई में बैठकर दिल्ली में टेम्परेचर 45 और शिमला में 40 पहुंचने की खबरें देखता था. उन्होंने मणिपुर से बैंकॉक तक, 1600 किलोमीटर लंबे निर्माणाधीन ट्राइलेट्रल हाईवे पर सफर की चाहत व्यक्त की और कहा कि नॉर्थ ईस्ट के साथ ही दक्षिण भारत के भी बहुत से मंदिर बचे हैं, वहां जाना अगला लक्ष्य है.

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यात्रा के लिए इनरलाइन परमिट जरूरी
ट्रैवल राइटर उमेश पंत ने 18 दिन लंबी आदि कैलाश यात्रा को अपने जीवन की सबसे यादगार यात्रा बताते हुए कहा कि लौटते समय जंगल में फंस गए, बारिश हो रही थी, टेम्परेचर माइनस में जा रहा था और हमारे पास न खाने को कुछ था न अलाव. मन में यह सवाल भी उठने लगे थे कि क्या हम जिंदा रह पाएंगे. पंत ने कहा कि एक पगडंडी थी, जिसे नदी काट रही थी, एक पहाड़ बहने लगा था.

उन्होंने यात्रा की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए कहा कि उत्तराखंड से होने के कारण पहाड़ की वैल्यू नहीं समझते थे. मुंबई से दिल्ली आना पड़ा. मन खराब था, दोस्त ने फोन कर पूछा कि आदि कैलाश चलें. फितूरी मन का फैसला था, अचानक प्लान बना और दोस्त के साथ चल दिए. उन्होंने कहा कि इसके बाद नागालैंड के जुकोवली में भी काफी ठंड थी, लेकिन यह भरोसा था कि सर्वाइव कर लेंगे. उन्होंने अपनी पुस्तक इनरलाइन परमिट का उल्लेख करते हुए कहा कि एक इनरलाइन परमिट वह होता है, जो कुछ क्षेत्रों में जाने के लिए सरकार जारी करती है, लेकिन यात्रा के लिए एक इनरलाइन परमिट हमें अपने अंदर से भी लेने की जरूरत होती है.
मजबूत बनाता है दुर्गम भूगोल
उमेश पंत ने कहा कि यात्राएं संवेदनशील बनाती हैं. नया भूगोल अजनबी शख्स की तरह होता है. दुर्गम भूगोल व्यक्ति को मजबूत बनाता है. उन्होंने यात्रा पर ऐसे ही निकल जाने को बेवकूफी बताते हुए सलाह दी कि कहीं भी जाने से पहले उस स्थान के भूगोल को जान लें. टेंट और खाने का सामान ले लें. कुछ लोगों को जरूर बता दें कि कहां जा रहे हैं, जिससे किसी अप्रिय स्थिति में आपकी तलाश की जा सके.

पंत ने 2013 के उत्तराखंड हादसे के लिए भी इन लापरवाहियों को जिम्मेदार बताते हुए सरकार को भी सलाह दी कि ऐसे स्थानों पर जाने वालों के रजिस्ट्रेशन कराए जाने चाहिए, जिससे उन्हें ढूंढ़ने में आसानी हो. उन्होंने कहा कि किसी भी नई जगह जाएं तो ओपन माइंडेड होकर जाएं. पूर्वोत्तर को लेकर पंत ने कहा कि यहां का भूगोल रोचक है. नागालैंड में ही 17 से अधिक ट्राइब हैं, जिनकी अपनी भाषा है. यहां 9 बजे रात में भी महिलाएं बस में अकेले सुरक्षित सफर करती हैं. अनुशासन भी बहुत है.

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