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साहित्य आजतक 2019: लौंडे शब्द पर हुआ विवाद, लेखक ने कहा- इसे विदेश से लेकर नहीं आया

साहित्य आजतक 2019 में एक चर्चा के दौरान लौंडे नाम पर हुए विवाद पर लेखक कुशल सिंह ने कहा कि वो अलीगढ़ से आते हैं और वहां पर यह शब्द बेहद आम है और इसे लोगों ने स्वीकार किया है. वहां के लोगों में यह शब्द रचा बसा है. किताब में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपत्तिजनक लगे.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 01 November 2019
साहित्य आजतक 2019: लौंडे शब्द पर हुआ विवाद, लेखक ने कहा- इसे विदेश से लेकर नहीं आया 'लौंडे शेर होते हैं' किताब के लेखक कुशल सिंह (साहित्य आजतक)

  • गोष्ठी में लौंडे शब्द को लेकर हुआ विवाद, लोगों ने जताई आपत्ति
  • लेखक ने कहा, मेरे क्षेत्र में यह शब्द बेहद आम, लोगों ने स्वीकारा
  • मैं वीजा लेकर विदेश से लेकर नहीं आया लौंडा शब्दः कुशल सिंह

साहित्य के सबसे बड़े महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' में 'अच्छी हिंदी बुरी हिंदी' पर आयोजित गोष्ठी पर 3 युवा लेखकों ने हिस्सा लिया जिसमें 'लौंडे शेर होते हैं' किताब के लेखक कुशल सिंह भी शामिल थे, लेकिन गोष्ठी में चर्चा के दौरान उनके किताब की शीर्षक पर विवाद भी हुआ. जब तीनों लेखकों के बीच चर्चा हो रही थी, उस समय दर्शकदीर्घा में बैठे बुजुर्ग इस नाम से नाराज हो गए और भड़क गए. उन्होंने बार-बार 'लौंडे' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई. यही आपत्ति कई और अन्य लोगों ने भी जताई.

'लौंडे शेर होते हैं' किताब के लेखक कुशल सिंह से जब इस विवादित शब्द के नाम पर शीर्षक रखे जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बेबाकी से कहा, 'लौंडे नाम सुनने में कतई अच्छा नहीं लगता है लेकिन भाषा का स्वरूप लगातार बदलता है. मैं यह शब्द कहीं बाहर से लेकर नहीं आया. मैं वीजा लेकर इसे लाने बाहर नहीं गया था. यह शब्द यहीं का है.

हमारे यहां यह शब्द बेहद आमः कुशल सिंह
लौंडे नाम पर कुशल सिंह ने कहा कि वो अलीगढ़ से आते हैं और वहां पर यह शब्द बेहद आम है और इसे लोगों ने स्वीकार किया है. वहां के लोगों में यह शब्द रचा बसा है. किताब में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपत्तिजनक लगे.

किताब के विवादित शीर्षक पर उभरती लेखिका और दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नीलिमा सिंह ने प्रख्यात हिंदी समालोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी का जिक्र करते हुए कहा कि 'बोलचाल की भाषा एक स्तर से नीचे उतर कर लेखक उसे बनाता भी है और बिगाड़ता भी है', लेखक भाषा बनाता ही नहीं है बिगाड़ता भी है. समय के अनुसर भाषा बदलनी चाहिए. अगर वह बदलेगी तो नयापन कहां से आएगी.'

trio-wriuter_110119070251.jpgपरिचर्चा में हिस्सा लेते युवा लेखक (फोटो- साहित्य आजतक)

नीलिमा सिंह ने खुद अपनी 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' का जिक्र करते हुए कहा कि उनके भी इस किताब के शीर्षक पर आपत्ति हो सकती है,

भाषा गरिमामयी होनी चाहिएः डॉक्टर रमा 

इस बीच साहित्य के सबसे बड़े महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' में 'मनोरंजन और साहित्य' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में प्रख्यात लेखिका और प्रिंसिपल डॉक्टर रमा ने कहा कि साहित्य की भाषा हो या मनोरंजन की, दोनों ही जगह भाषा गरिमामयी होनी चाहिए और किसी की भावना को ठेस पहुंचाने वाली नहीं होनी चाहिए. भाषा में होने वाली त्रुटियों के प्रति लापरवाही खतरनाक है.

'मनोरंजन और साहित्य' विषय पर बोलते हुए लेखक संदीप भूतोरिया ने कहा कि भाषा में त्रुटियां हो सकती है, लेकिन भाषा का मकसद संवाद करना है. कई देश ऐसे हैं जहां अंग्रेजी नहीं समझी जाती, ऐसी जगहों पर हम आपस में संवाद स्थापित करते ही हैं. संवाद स्थापित करना जरुरी है. भारत में ही कई जगह हिंदी नहीं समझी जाती तो भी हम संवाद स्थापित करते ही हैं. त्रुटियों पर ध्यान देने की जगह संवाद बेहद अहम होता है.

साहित्य का तोहफा आपके लिएः कली पुरी
इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने 'साहित्य आजतक 2019' के उद्घाटन संबोधन में सभी साहित्यकारों, संगीतज्ञों, कलाकारों का स्वागत करते हुए कहा कि आप सबका साहित्य आजतक का चौथा संस्करण आ गया है. लेकिन ऐसा लगता है अभी इस कार्यक्रम को शुरू हुए एक साल ही हुआ है. इस साल चुनाव हो रहे थे और पता नहीं चला कि साल कब बीत गया. अच्छी बात है कि हमारी और आपकी ये साहित्य की विशेष तारीख जल्दी आ गई.

उन्होंने आगे कहा कि चुनावी साल एक चैनल के लिए बहुत जरूरी होता है. जिसे कहते हैं मेक या ब्रेक ईयर. हमारा ओलंपिक्स. आपके सहयोग और हौसले के साथ हमारी पूरी टीम गोल्ड मेडल ही गोल्ड मेडल लेकर आई है. एग्जिट पोल हो या प्रधानमंत्री का इंटरव्यू या ग्राउंड रिपोर्ट, कुछ भी कसर नहीं छोड़ी. पूरी टीम ने जान लगाकर काम किया. और आपने हमारे काम को जम कर पसंद किया.

इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने कहा कि साहित्य का ये तोहफा हमारी तरफ से आपके लिए इस साल और भी शानदार है. इस साल हमने पूरा ग्राउंड ही ले लिया. अब तीन दिन, सात मंचों से 200 हस्तियों के साथ ये सुहाना सफर चलेगा. लगातार कविताएं, शेर, शायरी, कहानी, संगीत, नाटक, मुशायरा, भारत के हर कोने से आपको देखने को मिलेगा. ये एक जश्न है हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा और हमारी कला का.


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तीन दिन का साहित्य आजतक
साहित्य का सबसे बड़ा महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' का आज शुक्रवार को आगाज हो गया. 3 दिवसीय आयोजन 1 नवंबर से 3 नवंबर तक राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में चलेगा.


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'साहित्य आजतक 2019' के बड़े स्वरूप और भव्यता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल आमंत्रित अतिथियों की संख्या 300 के पार है जिनमें कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति और किताबों से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय ख्याति की ऐसी शख्सियतें यहां जुट रही हैं कि आपके लिए नाम गिनना मुश्किल होगा.

इस बार साहित्य आजतक में कई और भारतीय भाषाओं के दिग्गज लेखक भी शरीक होंगे जिनमें हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, अंग्रेजी के अलावा, राजस्थानी, पंजाबी, ओड़िया, गुजराती, मराठी, छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाएं और कई बोलियां शामिल हैं.


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'साहित्य आजतक 2019' की शुरुआत सूफी संगीत के दिग्गज कैलाश खेर के गायन से हुई. इसके बाद कवि अशोक वाजपेयी, निर्मला जैन और गगन गिल हमारे दौर के प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखिका कृष्णा सोबती को याद किया.

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