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साहित्य आजतक 2018: नूरां सिस्टर्स की धूम, सूफियाना हुआ माहौल

'साहित्य आजतक' का आयोजन दिल्ली के इंडिया गेट स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में 16, 17 और 18 नवंबर को हो रहा है. दूसरे दिन की शुरुआत प्रसून जोशी के साथ होगी. यह महाकुंभ इस बार सौ के करीब सत्रों में बंटा है, जिसमें 200 से भी अधिक विद्वान, कवि, लेखक, संगीतकार, अभिनेता, प्रकाशक, कलाकार, व्यंग्यकार और समीक्षक हिस्सा ले रहे हैं.

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राहुल मिश्र/ मोहित ग्रोवर नई दिल्ली, 17 November 2018
साहित्य आजतक 2018: नूरां सिस्टर्स की धूम, सूफियाना हुआ माहौल साहित्य आजतक 2018, नई दिल्ली

हिन्दी के सबसे बड़े मंच साहित्य आजतक 2018 के दूसरे दिन भी कवि, लेखक और गायकों ने दर्शकों के दिल को जीत लिया. दूसरे दिन की शुरुआत मशहूर लेखक प्रसून जोशी से हुई तो अंत नूरां सिस्टर्स के सूफी अंदाज से हुआ. पूरे दिन में साहित्य, कविता, कहानी, किस्से, समाज के अलग-अलग पहलू पर चर्चा हुई. शारदा सिन्हा का क्लासिकल संगीत भी हुआ तो मालती जोशी की घरेलू कहानियां भी लोगों ने खूब सुनी. रविवार, 18 नवंबर 2018 को साहित्य आजतक 2018 के तीसरे दिन भी कई बड़ी हस्तियां लोगों से रूबरू होंगी.

दूसरे दिन की पूरी कवरेज यहां पढ़ें...

नूरां सिस्टर्स का सूफी संगीत

अपने सुर और दमदार आवाज से नूरां सिस्टर्स ने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है. साहित्य आजतक-2018 के दूसरे दिन भी दोनों बहनों ने अपने सूफी गानों से समां बांधा. ज्योति नूरां और सुल्तान नूरां की इस जोड़ी ने एक से बढ़ कर एक गाने गाए, जिनमें ’अल्लाह हू -अल्लाह हू’ , ‘नाम उसका अली अली से’ काफी मशहूर हैं. ‘कमली’ नामक अलबम काफी पॉपुलर रहा.

हल्ला बोल चौपाल का सत्र 'भारत का इमरान'

'साहित्य आजतक' के दूसरे दिन की शाम को शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने मंच की रौनक बढ़ाई. अपनी शायरी से नौजवानों के दिलों में अपनी एक खास बनाने वाले इमरान ने हल्ला बोल चौपाल के सत्र 'भारत का इमरान' में शिरकत की. उनके चाहने वाले उनकी नजमों और गजलों के कायल हैं. आज के कार्यक्रम ने इमरान ने अपनी कुछ ऐसी ही नज्में सुनाईं.

सीधी बात मंच पर 'राष्ट्र और धर्म’ सत्र

राष्ट्र एक कल्पना है और जब यह राष्ट्रवाद में तब्दील होता है तो वह बीमारी हो जाता है.‘साहित्य आज तक’ के दूसरे दिन 'राष्ट्र और धर्म’ के सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर अपूर्वानंद ने यह बात कही. उनके इस विचार पर मजबूत तरीके से प्रतिकार किया दिल्ली विश्व‍विद्याल के एक और प्रोफेसर संगीत रागी तथा लेखक, शिक्षक, रंगकर्मी डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने.

सीधी बात स्टेज पर ‘साहित्य में मुस्लिम समाज’

साहित्य आजतक के दूसरे दिन सीधी बात स्टेज पर ‘साहित्य में मुस्लिम समाज’ विषय पर चर्चा की गई . क्या हमारा साहित्य समाज मजहब, बिरादरी में बंटा है? क्या साहित्य का भी अपना कोई समाज है?  इस पर चर्चा के लिए मौजूद रहे तीन बड़े लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह, भगवानदास मोरवाल और अंजुम उस्मानी. कार्यक्रम का संचालन शम्स ताहिर खान ने किया.

शम्स ने सवाल किया कि क्या साहित्य में भी हिंदू-मुस्लिम होता है. इस पर अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि ये कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हिंदी उपन्यास में प्रेमचंद के बाद किसी भी लेखक की कहानी में मुस्लिम दमदारी से नहीं दिखता.

सीधी बात मंच पर सत्र 'कौन लिखता है, कौन बिकता है'

'साहित्य आजतक' के दूसरे दिन सीधी बात मंच पर सत्र 'कौन लिखता है, कौन बिकता है' का आयोजन किया गया. इस सत्र में नए प्रकाशक से लेकर पीढ़ियों से इस पेशे में जुटे सफल पब्लिशर मौजूद रहे. यहां हिंद युग्म के प्रकाशक शैलेष भारतवासी, वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी और यात्रा बुक्स की प्रकाशक नीता गुप्ता के साथ छपे हुए शब्दों की गणित पर विस्तार से चर्चा की गई.

अरुण माहेश्वरी ने कार्यक्रम में बताया कि आज के दौर के लिए आज की बातों को ही लिख रहे हैं. उन्होंने कहा कि पुस्तक छापने से पहले हम उसके पाठक वर्ग को जरूर ध्यान में रखते हैं. महेश्वरी ने कहा कि बदलते दौर के साथ प्रकाशक को भी बदलना पड़ता है और समय की मांग के साथ हम पुस्तकें, कहानियों, शायरी और समसामयिक मुद्दे पर किताबें प्रकाशित कीं. हमें लेखकों की जरूरत हैं क्योंकि आज का पाठक जैसी किताबें मांग रहा हैं वैसा लिखने वाले लेखक अब नहीं हैं.

हल्ला बोल मंच पर 'मेरी मां' सत्र 

साहित्य आज तक 2018 के अहम सत्र 'मेरी मां' में एक्ट्रेस दिव्या दत्ता ने शिरकत की. उन्होंने बताया कि किस तरह उनका मां से लगाव गहरा हुआ. दिव्या ने अपनी मां पर एक किताब लिखी है.

दिव्या ने बताया- मैं इसी दिल्ली में पली-बढ़ी हूं. न्यू राजेंद्र नगर में रहती थी. अभी भी वहां मेरा घर है. मैंने अपने पिता को बहुत कम उम्र में खो दिया था. उस समय मैं सिर्फ 7 साल साल की थी. पिता के जाने के बाद मुझे वापस मां के पास पंजाब जाना पड़ा. इसके बाद मेरा मां के साथ बहुत गहरा बॉन्ड हो गया.

उन्होंने बताया कि मेरी जवानी में वे मेरी बेटी बन गई थीं, उनका नाम नलिनी था तो मैं उन्हें नलिनी या परी बुलाती थी. मां कभी नहीं बुलाया. हमारा रिश्ता रिवर्स हो गया था. मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा खौफ था कि कहीं मैं अपनी मां को भी न खो दूं.

हल्ला बोल मंच पर 'संगीत में साहित्य' सत्र

वरिष्ठ लेखक यतिंद्र मिश्र ने कहा कि संगीत और साहित्य के मिलन का स्पष्ट रूप भक्तिकाल में दिखाई देता है. मीरा बाई के जो भजन हैं उसमें आगे उन्होंने राग का जिक्र कर दिया. सूर, मीरा, तुलसी की रचनाएं अमर हो गईं क्योंकि उन्हें गा दिया गया. इसी तरह फिल्मों की गीत भी वर्षों तक रहेंगे लेकिन उन कविताओं के बारे में सोचना होगा जिनका गायन नहीं हुआ.

पूरा सेशन पढ़ें... लेखक यतींद्र मिश्र बोले- जिसे गा दिया गया वो अमर हो गया

हल्ला बोल मंच पर 'कहानी अपनी अपनी’ सत्र

‘साहित्य आज तक’ के दूसरे दिन कलाकार एवं कहानीकार विनीत पंछी ने अपने जीवन की कुछ कहानियां साझा कीं. 'कहानी अपनी अपनी’ सत्र में उन्होंने यह बताया कि वे उत्तराखंड की एक छोटी-सी जगह से निकलकर इतने सफल कैसे बने. वे सफल एक्टर, लेखक, कलाकार हैं.  उन्होंने अपनी कहानी शेरो-शायरी के माध्यम से कही और कई कविताएं भी सुनाई.

सीधी बात मंच पर 'दलित लेखन का दम' पर मंथन

दलित लेखन आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है. ‘साहित्य आज तक’ के ‘दलित लेखन का दम’ सत्र में दलित साहित्य से जुड़े तीन बड़े लेखक शरणकुमार लिंबाले, श्योराज सिंह बेचैन और राजीव रंजन प्रसाद शामिल हुए. इस सत्र का संचालन संजय सिन्हा ने किया.

चर्चा के दौरान वरिष्ठ लेखक शरण कुमार लिंबाले ने कहा कि जो समाज में दिखता है वही साहित्य में भी होता है. अगर समाज में छुआछूत रहेगा तो साहित्य में भी उसका असर जरूर दिखेगा. उन्होंने कहा कि पहले हमारी कविताएं नहीं छापी जाती थी, हमें कहा जाता था कि तुम भाषा लिखो, सही तरह से लिखो. उसके बाद हमें नाम बदलकर लिखना पड़ा, तब जाकर हमें स्वीकार किया गया.

दस्तक दरबार का छठा सत्र-ऐ वतन तेरे लिए

साहित्य आजतक के मंच दस्तक दरबार के छठे सत्र ऐ वतन तेरे लिए में प्रख्यात देशभक्त कवि डॉ हरिओम पंवार मौजूद हैं. डॉ हरिओम पंवार भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान के कवि हैं. उनकी कविताओं में देश की आन, बान, शान ही नहीं उसे लेकर उनका जुनून भी साफ झलकता है. वीर रस और देशभक्ति उनकी पहचान है.

'मैं भारत का संविधान हूं, लालकिले से बोल रहा हूं' जैसी कविता से उन्होंने देश के हर हिंदीभाषी घर और देशभक्त युवाओं के दिल में जगह बनाई है. पंवार ने कहा कि अभी तो हमने सिर्फ सरदार पटेल का स्टैच्यू बनाया है. जिस दिन सरदार पटेल बनकर सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग काम करने लगेंगे सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

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हल्ला बोल छठा सत्रः साहित्य का धर्म

साहित्य आजतक के मंच हल्ला बोल चौपाल के सत्र साहित्य का धर्म में प्रख्यात लेखक नरेंद्र कोहली ने मॉडरेटर श्वेता सिंह के सवालों के जवाब दिए. इस मौके पर उन्होंने कहा कि  धर्म का साहित्य और साहित्य का धर्म अलग है. उन्होंने रामायण की चर्चा करते हुए कहा कि वाल्मी‍कि की कथा क्रौंच और क्रौंची के विरह के साथ शुरू होती है. निषाद व्याध ने इस जोड़े में से नर क्रौंच को अपने बाण से मार गिराया जिसके बाद ऋषि वाल्मी‍कि  ने निषाद को शाप दे दिया.

ये आज भी हैं पक्षी के रूप में हो या मनुष्य के रूप में. पीड़क और पीड़ित आज भी हैं, अत्याचार करने वाले हों या अत्याचार सहने वाले. तो इसी तरह साहित्यकार का धर्म है, यदि उसके सामने अत्याचार हो रहा है, तो उस बीच में उसे पड़ना है या नहीं इस पर विचार करना है. कई लोग सोचते हैं कि मैं बीच में क्यों पड़ूं, मैं क्या कर सकता हूं. साहित्यकार को एक असाधारण काम मिला है कि पीड़ि‍त के पक्ष और पीड़क के खिलाफ खड़े हों.

कोहली ने कहा कि बहुत सारे लोग पूछते हैं कि रामकथा लिखने की क्या जरूरत है. एक सज्जन तो लड़ पड़े कि तुलसीदास ने लिखी है तो आप क्यों लिख रहे हैं. मैंने कहा कि वाल्मीकि ने लिखी थी तो उसके बाद तुलसीदास ने क्यों लिखी. अगर तुलसीदास ने लिखी तो मैं क्यों नहीं लिख सकता. लेखक के  मन में किसी विचार का बीज पड़ गया तो उसे लिखना ही है. लेखक की उत्कठ इच्छा है कि वो अपने मन की बात अभिव्यक्त करना चाहता है. उसके बाद छपना आता है और फिर यश की इच्छा आती है लेकिन पहली बात लिखना ही है. बहुत लोगों ने गालियां दीं. कइयों ने पूछा कि जिसे रामकथा पढ़नी है वो तुलसीदास को पढ़ेगा, तुम्हें क्यों पढ़ेगा. लेकिन लेखक बहुत धृष्ट जीव होता है.

सीधी बात पांचवां सत्रः साहित्य कल आज और कल

साहित्य आज तक के दूसरे दिन तीसरी स्टेज सीधी बात में दोपहर तीन बजे साहित्य कल आज और कल पर चर्चा हुई. साहित्य क्या है? इसका कल कैसा था, आज कैसा है और कल यह कैसा होगा, इस पर चर्चा के लिए हिंदी के तीन चर्चित कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे मौजूद थे.

मनीषा ने कहा कि अब साहित्य को भी अपग्रेड होना पड़ेगा. आज कबीर, रसखान से लेकर महादेवी वर्मा तक यूट्यूब पर हैं. हमारा आज ऐसा हो गया है जिसमें कल भी शामिल है. आज हम टाइम मशीन के युग में जी रहे हैं. ये हमारी ताकत है. दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा कि जवान कौम तभी काम करती है, जब आगे का प्लान हो. हमारा काम ब्रिज का है.  मनीषा ने कहा कि किताब का क्रेज कभी खत्म नहीं होगा.

हल्ला बोल पांचवां सत्रः श्रीराम की अयोध्या

'साहित्य आजतक' के दूसरे दिन हल्ला बोल मंच पर सत्र 'श्री राम की अयोध्या' का आयोजन किया गया. इस सत्र में भगवान राम पर किताब लिखने वाले प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार हेमंत शर्मा के साथ हिन्दी के बड़े लेखक यतीन्द्र मिश्र ने शिरकत की. कार्यक्रम में अयोध्या की भूमि से लेकर मंदिर-मस्जिद विवाद और श्री राम के जीवन मूल्यों पर रोचक बातचीत हुई. अयोध्या के ही रहने वाले लेखक यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि राम की याद सिर्फ 6 दिसंबर को ही आती है. मीडिया अयोध्या के सांस्कृतिक उत्सवों और राम के जीवन से जुड़े अन्य पहलुओं का जिक्र नहीं करता. राजनेता भी इसपर कोई बात नहीं करते क्योंकि इससे चुनावी फायदा नहीं है.

दस्तक दरबार का पांचवां सत्र- आओ फिल्म लिखें

साहित्य आजतक के दूसरे दिन दस्तक दरबार के पांचवें सत्र का विषय था आओ फिल्म लिखें. इस सत्र में स्क्रीन राइटर जूही चतुर्वेदी से मॉडरेटर सईद अंसारी ने बातचीत की. हिंदी साहित्य से जुड़े अधिकांश लेखक फिल्मी दुनिया से कतराते हैं, पर यहां जो शोहरत और पैसा है वह कहीं और नहीं. क्या यही वजह है, या इसके अलावा भी कोई वजह थी, जो जूही चतुर्वेदी जैसी क्रिएटिव राइटर फिल्म लेखन से जुड़ गईं. किन बातों ने उन्हें फिल्मों की कहानी, डॉयलाग लिखने के लिए उकसाया इन सब सवालों पर जूही ने खुलकर बातचीत की.

2013 में अपनी पहली ही फिल्म 'विक्की डोनर' के लिए जूही को फिल्म फेयर सहित कई अवार्ड मिले. उसी साल उन्होंने फिल्म 'मद्रास कैफे' के डायलॉग भी लिखे थे. साल 2016 में आई 'पीकू' उनके लिए और भी बड़ी हिट साबित हुई. इस फिल्म ने उन्हें नेशनल अवार्ड सहित उस साल के सारे बड़े फिल्म अवॉर्ड दिला दिए. अभी इसी साल आई 'अक्तूबर' फिल्म की कहानी में भी उनके लेखन को काफी सराहा गया है.

दस्तक दरबार पर चौथा सत्र सुरों की शारदा

साहित्य आजतक के दूसरे दिन प्रमुख मंच दस्तक दरबार के  चौथे प्रमुख सत्र सुरों की शारदा में सिंगर शारदा सिन्हा ने शिरकत की. इस सत्र का संचालन श्वेता सिंह ने किया. शारदा सिन्हा ने भोजपुरी गाने सुना समां बांधा. शारदा सिन्हा ने सबसे पहले तुलसीदास रचित हिंदी अवधि मिश्रण वाला लोक भजन सुनाया. जिसके बोल थे- "मोहे रघुवर की सुध आई, घर से बन निकले दोनों भाई.''

'बिहार-कोकिला', 'पद्म श्री', 'संगीत नाटक अकादमी' एवं 'पद्म भूषण' से सम्मानित शारदा सिन्हा ने लोकगीतों को वह उंचाई दिलाई, जिसका वह हकदार थी. आपने मैथिली, बज्जिका, भोजपुरी और हिंदी में सैकड़ों गीत गाए. 'अमवा महुअवा के झूमे डलिया' और 'कोयल बिन बगिया न सोहे राजा' जैसे सुपर डुपर हिट गीतों के अलावा आपने कुछ फिल्मों में भी गीत गाए, जिनमें 'मैंने प्यार किया' और 'हम आपके हैं कौन' जैसी फिल्में शामिल हैं.

हल्ला बोल पर तीसरा सत्र किसके लिए साहित्य

साहित्य आजतक के दूसरे दिन प्रमुख मंच हल्ला बोल के तीसरे सत्र किसके लिए साहित्य में लेखक मैत्रेयी पुष्पा, लेखक ऋषिकेश सुलभ और लेखक अरुण कमल ने शिरकत की. इस सत्र का संचालन रोहित सरदाना ने किया.

साहित्य की दिशा अभी क्या है? साहित्य में अभी क्या रचा, बुना और लिखा जा रहा? तुलसी, सूर, कबीर, भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद और महादेवी की पीढ़ी से लेकर आज तक साहित्य में क्या-कुछ बदला है? हम ’साहित्य आज तक’ के ‘किसके लिए साहित्य’ सत्र में हमारे बीच मौजूद लेखकों से उनके विचार जानने की कोशिश करेंगे.

इस सत्र के  दौरान अहम चर्चा का विषय रहा कि आज का साहित्य किसके लिए रचा जा रहा, साहित्यकार पाठक को ध्यान में रख किताबें लिखते हैं या रचनाएं अपने पाठक खुद ढ़ूंढ लेती हैं और क्या साहित्य का कोई अपना एजेंडा होना चाहिए?

सीधी बात तीसरी सत्रः आओ बच्चो तुम्हें सुनाएं

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