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साहित्य आजतक: 'लेखन से रोजी-रोटी नहीं चलती, कमाई दिवाली बोनस जितनी'

साहित्य आजतक के मंच पर चर्चा इस बात पर भी हुई कि हिंदी का नया पाठक क्या पढ़ना चाहता है. इस चर्चा में अदिति माहेश्वरी और भगवंत अनमोल शामिल हुए.

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मोहित ग्रोवर नई दिल्ली, 19 November 2018
साहित्य आजतक: 'लेखन से रोजी-रोटी नहीं चलती, कमाई दिवाली बोनस जितनी' साहित्य आजतक, 2018

साहित्य आजतक 2018 के तीसरे दिन कई मुद्दों पर चर्चा हुई. यहां हल्ला बोल मंच पर 'हिंदी में क्या बिकता है' सत्र के दौरान ये जानने की कोशिश की आखिर हिंदी के पाठक को क्या चाहिए. इस सत्र में अदिति माहेश्वरी, और भगवंत अनमोलशामिल हुए. वाणी प्रकाशन की प्रमुख अदिति माहेश्वरी ने कहा कि हिंदी देश का सबसे बड़ा बाजार है, इसमें सबकुछ बिकता है. हिंदी में जो लिखेगा-बिकेगा-टिकेगा, जो अच्छा लिखेगा वही बिकेगा.

उन्होंने कहा कि प्रकाशक एक दशानन होता है, उसके भी कई चेहरे और विचार होते हैं, जिसे बहुत कुछ देखना होता है. प्रकाशक के एडिटोरियल बोर्ड का भी महत्व है, उन्हें किताब और कंटेट का एक्सपीरियंस होता है. किताब को मांझने के लिए ये बोर्ड जरूरी होता है.

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अदिति ने कहा कि सोशल मीडिया के जमाने लोगों में बेचैनी आई है. अब लोग तुरंत रिजल्ट चाहते हैं, जो लेखकों के लिए नुकसानदेह होता है. लिखने से पहले बहुत रिसर्च की जरूरत है, उसके लिए फेसबुक-ट्विटर से बाहर निकल किताबों में आना पड़ेगा.

युवा लेखक भगवंत अनमोल ने कहा कि कुछ समय पहले तक ये माना जाता है कि लेखक वही होता है जिसके सफेद दाढ़ी होती है, पिछले पांच साल में चीजें बदली हैं कि अब काली दाढ़ी वाला भी लेखक माना जाना जाता है.

उन्होंने कहा कि जब मैं 21 साल का था तो पहली किताब छपवाने पहुंचा, तो किसी प्रकाशक ने मुझे लेखक नहीं माना था. उन्होंने कहा कि लेखन से रोजी-रोटी नहीं चल सकती है, लेखन से उतना पैसा मिलता है जितना दिवाली पर बोनस मिलता है.

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