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पांच हजार साल से हमने सीखा है कि लोकतंत्र क्या है: जावेद अख्तर

राष्ट्रवाद की बहस पर जावेद अख्तर ने कहा कि कभी-कभी कुछ विषयों पर अतिवादी स्टैंड लिया जाता है जो सही नहीं है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद एक स्वभाविक भाव है और जिस देश में आप पैदा हुए हैं उससे प्यार न हो, ये हो कैसे सकता है.

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aajtak.in [Edited by: अनुग्रह मिश्र]नई दिल्ली, 19 November 2018
पांच हजार साल से हमने सीखा है कि लोकतंत्र क्या है: जावेद अख्तर गीतकार जावेद अख्तर (फोटो-आजतक)

साहित्य आजतक के तीसरे दिन 'दस्तक दरबार' मंच पर गीतकार, लेखक जावेद अख्तर ने शिरकत की. जावेद अख्तर ने चर्चा के शुरू में अपनी कविता 'साजिश' सुनाई. उन्होंने कहा कि आम तौर पर बातचीत के बाद कविताओं के दौर चलता है लेकिन अगर मंच की मांग है तो मिठाई को खाने से पहले ही पेश करना पड़ता है.

राष्ट्रवाद की बहस पर जावेद अख्तर ने कहा कि कभी-कभी कुछ विषयों पर अतिवादी स्टैंड लिया जाता है जो सही नहीं है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद एक स्वभाविक भाव है और जिस देश में आप पैदा हुए हैं उससे प्यार न हो, ये हो कैसे सकता है. उन्होंने कहा कि आपको जितना प्यार अपने परिवार से, मोहल्ले से, शहर से होता है उतना ही प्यार अपने देश से होना स्वभाविक है. उन्होंने कहा कि मेरी कॉम जिस शहर से है, मैं वहां कभी नहीं गया लेकिन जब वो मेडल जीतती है तो मुझे भी खुशी होती है, मेरा उससे एक देश का रिश्ता है.

जावेद अख्तर ने कहा कि मैं अपने परिवार, दोस्तों, देश से प्यार करता हूं इसका ये मतलब नहीं कि दूसरों से नफरत करता हूं. आज जिस बात पर मुझे दिक्कत है वो ये कि वो आदमी जो आपसे असहमति रखता है, आप उससे कितनी नफरत रख सकते हैं, इसे ही आपके देश प्रेम का बैरोमीटर बनाया जा रहा है.

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राज्यसभा के पूर्व सांसद जावेद अख्तर ने कहा कि हमारी खासियत है कि हमारे जैसा लोकतंत्र कहीं मिलता नहीं है. हमारे पास लोकतंत्र इसलिए हैं क्योंकि हम इसके लिए पांच हजार साल से ट्रेंड हो रहे थे, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति इसके लिए हमें पहले से सिखा रही थी. उन्होंने कहा कि असहमत होना पाप नहीं है और ये हमेशा से रहा है. जहां असहमति को स्वीकार नहीं किया जाता, वहां लोकतंत्र नहीं है.

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शहरों के नाम बदलने के सवाल पर जावेद अख्तर ने कहा- अब किसी तरह तो शहरों को स्मार्ट बनाया जाए, नाम ही बदलो. महत्वपूर्ण बात यह है, जिस पर कोई गौर नहीं कर रहा है कि इस देश में कम से कम 100-150 नए शहर बनने चाहिए. आज गांवों से शहरों की ओर पलायन बड़े स्तर पर है. दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई सब जगह ये हैं. आजादी के बाद से मुट्ठीभर शहर बने हैं. एक चंडीगढ़ बना है, नोएडा और गुड़गांव बने हैं. इसी तरह साउथ में एक-दो शहर हैं.

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