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साहित्य आजतक: सावरकर को लेकर बुद्धिजीवियों में हुई गर्मागर्म बहस

विनायक दामोदर सावरकर का इतिहास में वाजिब स्थान क्या होनी चाहिए? सावरकर का हिंदुत्व से क्या रिश्ता है, इसको लेकर साहित्य आजतक 2019 के मंच पर कई बुद्धजीवियों में गर्मागर्म बहस हुई.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 06 November 2019
साहित्य आजतक: सावरकर को लेकर बुद्धिजीवियों में हुई गर्मागर्म बहस साहित्य आजतक 2019 में सावरकर और हिंदुत्व पर हुई चर्चा

  • साहित्य आजतक के मंच पर सावरकर पर हुई गर्मागर्म बहस
  • बहस में इरफान हबीब, आशुतोष सहित कई बुद्धि‍जीवी शामिल
  • सावरकर का इतिहास में क्या हो वाजिब स्थान, इस पर हुई बहस
  • सावरकर और भारत रत्न, सावरकर और हिंदुत्व पर हुई चर्चा

हिंदुत्व की विचारधारा के जनक विनायक दामोदर सावरकर को लेकर फिलहाल राजनीतिक-वैचारिक विभाजन बहुत ज्यादा है. कुछ लोगों के लिए वह राष्ट्रवादी सेनानी हैं तो कुछ उन्हें अंग्रेजों से माफी मांगने वाला अवसरवादी कहते हैं. आखिर सावरकर को किस तरह से देखा जाए, सावरकर का हिंदुत्व से क्या रिश्ता है, उनका इतिहास में वाजिब स्थान क्या होनी चाहिए? इसको लेकर साहित्य आजतक 2019 के मंच भी कई बुद्धजीवियों में गर्मागर्म बहस हुई.
साहित्य आजतक के दूसरे दिन इस बहस में इतिहासकार इरफान हबीब, राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जानकार एवं चिंतक देशरत्न निगम, लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय और पत्रकार वैभव पुरंदरे शामिल हुए. संचालन इंडिया टीवी टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने किया.
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सावरकर ने माफी क्यों मांगी

अंडमान जेल में बंद रहने के दौरान अंग्रेजों से सावरकर के माफी मांगने के सवाल पर देशरत्न निगम ने कहा कि मर्सी पेटिशन उनकी एक रणनीति थी. अपनी तीसरी याचिका में उन्होंने कहा कि मेरे साथ अन्य लोगों को भी रिहा किया जाए. वे जेल से बाहर आकर देश की आजादी के लिए काम करना चाहते थे.

लेकिन भगत सिंह ने तो माफी नहीं मांगी थी, इस सवाल पर निगम ने कहा कि किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा, 'क्या गांधी की शहीद क्रांतिकारियों से तुलना कर सकते यह कह सकते हैं कि वे कायर थे, जब वे अहिंसा की बात करते थे? सबकी रणनीति अलग थी, लेकिन गोल एक था- भारत की आजादी.'
आशुतोष ने कहा कि अंडमान जेल में सावरकर अकेले नहीं थे, 500 अन्य कैदी भी थे, तो उन्होंने क्यों माफी नहीं मांगी. इसके जवाब में वैभव पुरंदरे ने कहा कि अरबिंदो घोष ने भी मर्सी पेटिशन लिखी थी. 

माफी मांगकर करना क्या चाहते थे

आशुतोष ने कहा कि असल सवाल तो यह है कि आखि‍र सावरकर माफी मांगकर करना क्या चाहते थे. इरफान हबीब ने कहा कि तुलना उनके बीच करनी चाहिए जो सेलुलर जेल में थे. अगर यह कोई रणनीति थी तो आख‍िर उन्होंने जेल से बाहर आकर क्या किया.
निगम ने कहा कि जेल से बाहर आकर सावरकर इसलिए स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम नहीं कर पाए क्योंकि उन पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए.
नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा कि जेल से आने के बाद उन्होंने हिंदुत्व के लिए काम किया देश की आजादी के लिए नहीं.
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माफी से भी बड़े ये हैं सावरकर के अपराध!
आशुतोष ने कहा कि सावरकर को इसलिए ज्यादा कठघरे में खड़ा करना होगा कि उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश लोगों का साथ दिया. हिंदू महासभा ने एक प्रस्ताव के द्वारा इसका समर्थन किया. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हिंदू महासभा के प्रतिनिध‍ि के रूप में मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ किया.  सावरकर ने अंग्रेजों के लिए सेना की भर्ती की, सावरकर को गांधी हत्या में गिरफ्तार किया गया. 

निगम ने इसके जवाब में कहा कि 95 फीसदी कांग्रेसियों ने भी क्विट इंडिया का विरोध किया था. गांधी जी की राय हावी थी. यह रिकॉर्ड में है कि कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा था कि यह उपयुक्त समय नहीं है.  निगम ने कहा कि सावरकर ने इसलिए लोगों को सेना में शामिल होने को कहा ताकि लोग ट्रेंड होकर आएं और फिर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लें. 

वैभव पुरंदरे ने कहा कि वे शायद मुस्लिमों से मुकाबले के लिए हिंदुओं की सेना में भर्ती कराना चाहते थे, उस समय ब्रिटिश आर्मी में मुस्लिम ज्यादा थे.

सावरकर ने हिटलर का समर्थन किया तो क्या, सुभाष चंद्र बोस ने भी मदद ली थी

आख‍िर सावरकर ने नाजीवाद, फासीवाद और हिटलर का समर्थन क्यों किया? इस पर नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा कि हेडगेवार और मुंजे भी हिटलर के समर्थक थे.
लेकिन इसके जवाब में संघ के समर्थ‍क निगम ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस ने भी हिटलर और जापान का सहयोग लिया था. इसी तरह की सोच के तहत सावरकर मदद लेना चाहते थे. उनके सामने एक रणनीति थी. बड़ा लक्ष्य था भारत की आजादी का. नीलांजन ने इस पर कहा कि सुभाष चंद्र बोस भी सवालों से परे नहीं हैं.

पुरंदरे ने कहा कि सावरकर की तुलना किसी और से करना ठीक नहीं है. सावरकर के काम को दो फेज में देखना होगा. उनको मिल रही सजा बहुत ही सख्त थी, इसलिए सावरकर सहित कई सेनानियों ने इसमें राहत देने की मांग की. सावरकर की रिहाई पर सुभाष चंद्र बोस ने भी खुशी जाहिर की थी.

क्या गांधी हत्या में सावरकर का योगदान था

आशुतोष ने कहा कि कोर्ट ने प्रमाण न होने पर गांधी हत्या में सावरकर को बरी किया था. कपूर कमीशन ने उन्हें दोषी माना था. इसके जवाब में देशरत्न निगम ने कहा कि जब कोर्ट यह कहता है कि कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिससे इस हत्या में सावरकर को कनेक्ट किया जा सके तो आप उसे किस तरह से मानेंगे. कपूर कमीशन कोई कोर्ट नहीं था, यह कांग्रेस द्वारा राजनीतिक उद्देश्य से गठित किया गया था.
नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा कि इसे लाल बहादुर शास्त्री ने गठित किया था तो आप किस तरह से देखेंगे जिन्हें कि आप लोग बेहतर प्रधानमंत्री बाते हैं.
नीलंजन ने कहा कि नाथूराम उस अखबार का एडिटर था जिसकी सावरकर ने स्थापना की थी. इस अखबार के मास्टहेड पर सावरकर का नाम था.  जवाब में निगम ने कहा कि सावरकर की नाथूराम के साथ अंतिम बैठक में क्या चर्चा हुई, कोई नहीं जानता. इसके बारे में केवल कयास ही हैं. इसे कोई साबित नहीं कर सकता कि उसमें महात्मा गांधी की हत्या के बारे में बात हुई.

पुरंदरे ने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या में सावरकर का हाथ होने का कोई लीगल प्रमाण नहीं है, लेकिन उन्होंने गोड्से ऐंड कंपनी का समर्थन किया जो कि गलत है.

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सावरकर और संघ में क्या था रिश्ता

लेखक इरफान हबीब ने कहा कि आरएसस के करीब थे सावरकर और आरएसएस ने उनके हिंदुत्व की सोच को अपनाया. उन्होंने कि आरएसएस के लोग अपने जिन आदर्श नायकों की बात करते हैं, जिनके बारे में कहते हैं कि उन्हाेंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, उनका नाम नेशनल आर्काइव में क्यों नहीं है.

वैभव पुरंदरे ने कहा कि इसकी दो वजह हो सकती है. हेडगेवार असल में सावरकर के हिंदुत्व से प्रेरित थे. यह आरएसएस के लिए होली टेक्स्ट था.  आरएसएस के लिए सावरकर फ्रीडम फाइटर थे. हिंदुत्व का उनका कॉन्सेप्ट भी आरएसएस के विचार से मिलता था. दोनों हिंदू आक्रामकता में विश्वास करते थे.

उन्होंने कहा कि बहुत साल तक कांग्रेस ने गलत किया होगा, लेकिन दक्ष‍िणपंथी लोग उनकी गलतियों के पीछे नहीं छिप सकते. अगर हम किताब लिखते हैं, तो किसी सरकार के दम पर तो नहीं, हमने व्यक्तिगत क्षमता से किताबें लिखी हैं, तो दक्षिणपंथी लेखकों को अपना इतिहास लिखने से किसने रोका था.

आशुतोष ने कहा कि आरएसएस की विचारधारा के लोग हमेशा यह कहते रहे हैं कि इतिहास वामपंथियों द्वारा लिखा गया. यह सोच असल में उनकी  इन्फि‍रियॉरिटी कॉम्प्लेक्स और बदले की राजनीति की वजह से है.
सावरकर के खुद के जीवन के दो हिस्सों की तुलना करें तो काफी विरोधाभास है. अंडमान जाने के बाद अलग तरह के सावरकर हैं. वह आरएसएस के वैचारिक फाउंडेशन हेड है. सावरकर ज्यादा पॉलिटिकल थे. प्रजेंट की बात करते थे, आरएसएस फ्यूचर की बात करता था.
आशुतोष ने कहा, 'अटल बिहारी का करिश्मा कम होने के बाद जब मोदी जी आए, पहले उन्होंने सबको मिलाकर चलने की बात की, लेकिन नहीं चल पाए तो फिर करिश्मा पर आ गए.  अटल बिहारी के 6 साल में क्या सावरकर को उचित सम्मान नहीं मिला? सुभाष चंद्र बोस के ऊपर भी तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए गए और वे जापान चले गए. आजाद हिंद फौज की स्थापना की. सावरकर को ऐसा करने से किसने रोका था? गोलवलकर ने कहा था कि आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लेगा, इसका ऐतिहासिक प्रमाण है. गोलवलकर ने कहा कि हमारा युवा दिग्भ्रमित हो गया है.'

इस पर नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा कि वाजपेयी ने भी भारत रत्न देने का प्रयास किया था, लेकिन राष्ट्रपति ने खारिज किया, लोकसभा में उनका पोर्टेट लगाने की कोश‍िश की गई. गांधी हत्या के बाद सावरकर जेल गए, आरएसएस के नेता जेल गए.  आजादी के बाद तो सावरकर का कोई नाम लेने वाला नहीं था, लेकिन इंदिरा गांधी ने उनकी तारीफ की, उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाई गई.  सच तो यह है कि सावरकर और आरएसएस में अच्छे रिलेशन नहीं थे.
सावरकर के जीवन के तीन चरण दिखते हैं. 1911 के पहले वे स्वतंत्रता सेनानी थे जब 1857 को पहला स्वतंत्रता संग्राम बताने वाली किताब लिखी, इसके बाद उनका गुरु ऑफ हिंदुत्व वाला फेज आया, जो 1921 तक रहा. इसके बाद जब अंडमान जेल से वह रिहा हुए तो उसके बाद एक अलग तरह का फेज आया.

देशरत्न निगम ने कहा, 'आरएसएस की सदस्यता काफी अनौपचारिक होती है, जो भी शाखा गया हो वह आरएसएस का सदस्य हो सकता है. हम बहुत से लोगों को संघ में शामिल होने का ऑफर देते है, कुछ शामिल होते हैं और कुछ बाहर से ही सपोर्ट करते हैं.' 
उन्होंने कहा कि आरएसएस का मानना है कि इस देश में जो भी रहता है वह हिंदू है, जबकि सावरकर मुस्लिम, ईसाई को इस दायरे से बाहर रखते हैं. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का आधार तैयार किया. 
भारतीयों के लिए कोई एक-दो आदर्श नहीं हो सकते. करीब 70 साल तक सावरकर को नजरअंदाज किया गया. हेडगेवार, गोलवलकर को भी नजरअंदाज किया गया.

क्या फ्रीडम स्ट्रगल में शून्य है संघ का योगदान
 क्या फ्रीडम स्ट्रगल में आरएसएस का योगदान शून्य है, इस सवाल पर निगम ने कहा, 'आजादी से पहले सभी लोग कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ते थे. खुद संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार कांग्रेस में थे, उनका वैचारिक मतभेद हुआ तो वे दो बार जेल गए. असहयोग आंदोलन, कश्मीर पर कबायलियों के आक्रमण के समय संघ के स्वयंसेवकों ने काम किया.

इतने विवाद के बाद आखि‍र सावरकर को भारत रत्न क्यों मिले

निगम ने कहा कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी को भारत रत्न दिया तो सावरकर तो उनसे 100 गुना ज्यादा बेहतर हैं.  भारत रत्न ऐसे व्य‍क्ति को देना चाहिए जिसने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया हो, जिसकी रिहाई का सुभाष चंद्र बोस ने भी समर्थन किया था. लोकतंत्र में यह जनता का च्वाइस है कि किसे भारत रत्न दिया जाए या नहीं. 

हेडगेवार, गोलवलकर को भारत रत्न मिलने के सवाल पर निगम ने कहा कि खुद डॉॅ. हेडगेवार, गोलवलकर किसी भी तरह का पुरस्कार लेने के खिलाफ थे, यह उनके दर्शन का हिस्सा है. आरएसएस किसी तरह के पुरस्कार मिलने की सोच के तहत काम नहीं करता. उसके द्वारा 1 लाख से ऊपर सर्विस प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं.

गौरतलब है कि साहित्य का सबसे बड़ा महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2019' शुक्रवार से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में शुरू हो चुका है. साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति का यह जलसा 3 नवंबर तक चलेगा. तीन दिन तक चलने वाले साहित्य के महाकुंभ साहित्य आजतक में कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति और सिनेमा जगत की मशहूर हस्तियां शामिल हो रही हैं.

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