कलम आजाद है तेरीः लेखिका बोल्ड होकर लिखती है, तो क्यों होने लगती है बेचैनी?

लेखिका और उपन्यासकार शर्मिला बोहरा जालान ने कहा कि अगर एक लेखिका बोल्ड होकर लिखती है, तो समाज बेचैन क्यों हो जाता है? ऐसी लेखिकाओं के चरित्र पर ही उंगली उठाने लगता है. आरोप लगाया जाने लगता है कि ऐसा लिखने वाली वो महिलाएं हैं, जो शराब पीती हैं. आखिर समाज ऐसी महिलाओं के लेखन को स्वीकार क्यों नहीं कर पाता है? कुछ भी हो, लेकिन समाज को इसे स्वीकार करना होगा.

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aajtak.in [Edited By: राम कृष्ण]नई दिल्ली, 19 November 2018
कलम आजाद है तेरीः लेखिका बोल्ड होकर लिखती है, तो क्यों होने लगती है बेचैनी? नीलिमा चौहान, शर्मिला बोहरा जालान और इंदिरा दाँगी (बाएं से दाएं) फोटो- आजतक

‘साहित्य आज तक’ के ‘कलम आजाद है तेरी’ सत्र में चर्चित लेखिकाओं ने हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने कलम की आजादी से लेकर महिलाओं तक के मुद्दे पर अपनी बात रखी. लेखन से लोकप्रियता की नई बुलंदियों को छूने और कई बंधनों को तोड़ने वाली जिन महिला लेखिकाओं ने इस सत्र में शिरकत की, उनमें इंदिरा दाँगी, नीलिमा चौहान और शर्मिला बोहरा जालान शामिल रहीं.

इंदिरा दाँगी ने कहा- जो महसूस करते हैं, वो लिखते हैं

अपने पहले ही उपन्यास 'रपटीले राजपथ' से साहित्य जगत में छा जाने वाली इंदिरा दाँगी हिंदी युवा लेखन का जाना पहचाना नाम हैं.  इन्होंने अपनी रचनाओं में औरत के मनमिजाज को ऐसे उभारा कि वह शरीर से जुड़ी बहस से ऊपर उठकर खुद में ऐसा सवाल बन गई, जिनके जवाब अब भी तलाशे जा रहे हैं.

कार्यक्रम के दौरान जब इंदिरा दाँगी से पूछा गया कि कलम की आजादी का मतलब कहीं बोल्ड और बेलगाम लेखन तो नहीं? इस पर उन्होंने कहा कि सहानुभूति और स्वानभूति में जो फर्क होता है,  वही यहां पर भी है. पहले के लेखन और आज के लेखन का ढंग अलग है. आज हम जो महसूस करते हैं, वो लिखते हैं और इसको कोई रोक नहीं सकता है, क्योंकि कलम हमारे हाथ में है.

प्रेमचंद्र की नायिका में पीड़ित महिलाओं की बात लिखी गई और आज भी महिलाओं की पीड़ा को ही लिखा जाता है. हम सिर्फ स्त्री विमर्श नहीं लिखते हैं. हम मानवीयता की बात लिखते हैं. उन महिलाओं की कहानी लिखते हैं, जिनको जलाया जाता है, काटा जाता है, मारा जाता है, भेड़-बकरी की तरह किसी के साथ भी भेज दिया जाता है, रेप किया जाता है और प्रताड़ित किया जाता है.

मैं एक लेखक हूं, न स्त्री हूं और न ही पुरुष हूः नीलिमा चौहान

नीलिमा ने बागी प्रेम-विवाहों की कहानियां जुटाईं और अशोक कुमार पांडेय के साथ उसका संकलन निकाला. पर उन्हें शोहरत 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' से मिली.  नीलिमा चौहान वैसे तो अपने लेखन से मर्दों की बखिया भी उधेड़ती हैं, पर कट्टर फेमिनिस्टों की तरह पुरुष विरोधी नहीं हैं. वह 'जियो ओर जीने दो' की खूबसूरती में यकीन करती हैं और जीवन और लेखन दोनों में संतुलन की हिमायती हैं.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘हम संघर्ष की कहानियां लिखते हैं. मैं एक लेखक हूं, न मैं स्त्री हूं और न ही पुरुष हूं. स्वतंत्र होना ही कलम का मूलरूप है. इसको बंधक में नहीं होना चाहिए. वैसे एक लेखक होना ही आदर्श स्थिति है.

एक हिंदुस्तान में कई हिंदुस्तान में हैः शर्मिला बोहरा जालान

'शादी से पेशतर', 'बूढ़ा चाँद', 'राग-विराग और अन्य कहानियाँ' शर्मिला बोहरा जालान की चर्चित किताबें हैं. यह नए दौर की ऐसी लेखिका हैं, जो किस्सागोई की शक्ल में अपनी बात कहती हैं. मसलन बात भले ही नई हो, पर कहने और बताने का ढंग उनका अपना है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या एक लेखिका किताब बेचने और शोहरत हासिल करने के लिए ही स्त्री की बात लिखती है, तो उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं है. स्त्री मन की स्थिति है. एक आदमी भी स्त्री की भावना को बेहतर ढंग से लिख सकता है. मैं एक लेखक हूं और एक लेखक, लेखक होता है. एक लेखक को स्त्री या पुरुष की सीमाओं में बांधने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. कलम किसी के विरोध और प्रतिरोध में ही उठाई जाती है. लेखन के दौरान लेखक को तमाम द्वंद से गुजरना पड़ता है.

उन्होंने कहा कि अगर एक लेखिका बोल्ड होकर लिखती है, तो समाज बेचैन क्यों हो जाता है? ऐसी लेखिकाओं के चरित्र पर ही उंगली उठने लगती है. यह कहा जाने लगता है कि इसमें वो महिलाएं नहीं हैं, जो ग्रामीण क्षेत्र से आती हैं. वो महिलाएं नहीं हैं, जो वास्तव में पीड़ित हैं. इसमें शराब पीने वाली महिलाओं की बात लिखी गई है. आखिर समाज ऐसी महिलाओं के लेखन को स्वीकार क्यों नहीं कर पाता है? कुछ भी हो, लेकिन समाज को इसे स्वीकार करना होगा.

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