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चलती ट्रेन के बाहर लटककर इंजन तक पहुंच जाते थे आशुतोष राणा

साहित्य आजतक 2018 के एक अहम सत्र में एक्टर आशुतोष राणा ने शिरकत की. इस सेशन को एंकर श्वेता सिंह ने मॉडरेट किया.

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aajtak.in [Edited By:महेन्द्र गुप्ता]नई दिल्ली, 19 November 2018
चलती ट्रेन के बाहर लटककर इंजन तक पहुंच जाते थे आशुतोष राणा आशुतोष राणा

साहित्य आजतक 2018 के एक अहम सत्र में एक्टर आशुतोष राणा ने शिरकत की. इस सेशन को एंकर श्वेता सिंह ने मॉडरेट किया. राणा ने बताया कि किस तरह वे बचपन में मनमौजी थे. उन्हें दोस्तों के साथ शर्त लगाने का बहुत शौक था. 

आशुतोष राणा ने बाताया, "कॉलेज के दिनों में दोस्तों संग शर्त लगाना मेरी आदत बन गया था. उन दिनों एसी के डिब्बे नहीं होते थे ट्रेनों में. हम खिड़कियों के सहारे बाहर से लटक कर इंजन तक पहुंचते थे. ट्रेनों में गार्ड के डिब्बे से इंजन तक पहुंचते थे." शर्त वह जीतता था जो सबसे पहले इंजन तक पहुंचता. हालांकि राणा ने सलाह दी, "अब कोई ऐसा न करे. यह गलत है. मुझे भी अब फिल्मों में अगर इसे करने को कहा जाएगा तो मैं मना कर दूंगा."

मोबाइल पर हाथ से टाइप कर इस एक्टर ने लिख दी किताब

'रेणुका और मैं विपरीत ध्रुव हैं'

आशुतोष राणा ने कहा कि मैं और रेणुका जी दोनों विपरीत ध्रुव के हैं. वे अर्बन हैं और मैं ठेठ ग्रामीण, वे पंक्चुअल और मैं बेतरकीब, वे रात को 10 बजे किसी को फोन आने पर उसका नंबर ब्लॉक कर देती हैं और मेरी दिनचर्या ही रात 10 बजे शुरू होती है. मैं कविता प्रेमी हूं और उन्हें कविता बिल्कुल पसंद नहीं.

आशुतोष राणा ने बताया कि वे शादी से पहले रेणुका को रात 10  बजे के बाद ही फोन करते थे और वे सहर्ष उसे लेती थीं. राणा कहते हैं, "हम दो-दो तीन-तीन घंटे तक बात करते रहते थे. एक बार जब वे गोवा में शूटिंग कर रही थीं तो मैंने उन्हें एक कविता सुनाई. यह कविता सुनने के बाद उन्होंने कहा-राणजी मैं आपके प्रेम में हूं. मेरे मन में लड्डू फूट पड़े. लेकिन मैंने अपने जज्बात दबा ल‍िए. मैंने कहा मिलकर बात करते हैं. इसके बाद मैंने कहा मेरे प्यार को स्वीकार करने के लिए शुक्रया. आज हमारी शादी को 17 साल हो चुके हैं."

लव स्टोरी: पत्नी रेणुका शहाणे से कितना अलग हैं आशुतोष राणा?

कॉलेज के दिनों में लगाते थे शर्त

आशुतोष राणा ने बाताया, "कॉलेज के दिनों में दोस्तों संग शर्त लगाने की आदत थी. उन दिनों एसी के डिब्बे नहीं होते थे ट्रेनों में. हम खिड़कियों के सहारे बाहर से लटक कर इंजन तक पहुंचते थे. ट्रेनों में गार्ड के डिब्बे से इंजन तक पहुंचते थे." शर्त वह जीतता था जो सबसे पहले इंजन तक पहुंचता. हालांकि राणा ने सलाह दी, "अब कोई ऐसा न करे. यह गलत है. मुझे भी अब फिल्मों में अगर इसे करने को कहा जाएगा तो मैं मना कर दूंगा."

'नवंबर वित्त के लिहाज से कोई नहीं भूल सकता'

राणा ने व्यंग्य पाठन के दौरान कहा- चित्त में जगह बनानी हो तो उसका वित्त फंसा लो. चित्त के संबंध चलें न चलें, लेकिन वित्त के जरूर चलते हैं. वित्त में चित्त का वास होता है. उन्होंने कहा कि नवंबर का महीना वित्त के लिहाज से कोई नहीं भूल सकता. राणा ने बताया कि यह पूरी किताब उन्होंने मोबाइल पर लिखी है. ये उनके लिए काफी कठिन रहा. 

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