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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का असर, दिल्ली के रंगमंच पर महिला केंद्रित नाटकों की धूम

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दिल्ली के रंगमंच पर महिला केंद्रित नाटकों की धूम है. 'मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई. पापी नातेदार हैं तो भी पापी हैं, ठाकरन को मारो है ठकरास नहीं मरी अबे. ये वे संवाद हैं जो स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित नाटक 'अगरबत्ती' में बोले गए. अवसर था राजधानी में चल रहे 14वें मेटा थिएटर फेस्टिवल का, जिसमें इस नाटक का मंचन हुआ.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 08 March 2019
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का असर, दिल्ली के रंगमंच पर महिला केंद्रित नाटकों की धूम नाटक 'अगरबत्ती' का एक दृश्य

नई दिल्लीः अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दिल्ली के रंगमंच पर महिला केंद्रित नाटकों की धूम है. 'मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई. पापी नातेदार हैं तो भी पापी हैं, ठाकरन को मारो है ठकरास नहीं मरी अबे. ये वे संवाद हैं जो स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित नाटक 'अगरबत्ती' में बोले गए. अवसर था राजधानी में चल रहे 14वें मेटा थिएटर फेस्टिवल का, जिसमें इस नाटक का मंचन हुआ.

अगरबत्ती में जाति, लिंग, वर्ग, मतभेद और राजनीति की दिलचस्प कहानी दिखाई गई. इस नाटक का कथानक फूलन देवी के बेहमई नरसंहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है. यह नाटक जातीय प्रेरणा से हुई फूलनदेवी की हत्या पर भी प्रश्न उठाता है. इस तरह की घटनाएं भारत और दुनिया के लिए एक सबक ही नहीं एक सवाल की तरह सामने आईं, क्योंकि इस तरह के सवालों का जवाब आज तक नहीं दिया गया.

हालांकि मेटा थिएटर फेस्टिवल की शुरुआत निर्देशिका माया कृष्ण राव का नाटक लूज वुमन से हुई. इस नाटक में डांस, थियेटर, संगीत और वीडियो के माध्यम से महिला के विभिन्न जगहों के सफर को दिखाया गया है. इस दौरान थिएटर प्रेमियों के अलावा मेटा फेस्टिवल के जूरी सदस्य आकाश खुराना, अनमोल वेल्लानी, ईला अरुण, कुलभूषण खरबंदा, लिन फर्नांडिस, मुकुंद पद्मनाभन, सुनील कोठारी, सुनीत टंडन आदि भी मौजूद थे.

मेटा के उद्घाटन नाटक से पहले एक सत्र 'द ब्लैक, द वाइट एंड द ग्रे: व्हाट इज द डिवाइडिंग इन्स्पिर्सन एंड अप्रोप्रीऐशन इन द आर्ट्स?' विषय पर हुआ. इस सत्र में अनमोल वेल्लानी, मुकुंद पदमनाभन, आकाश खुराना एवं नीलम मानसिंह से संजोय के रॉय ने बातचीत की. 

फेस्टिवल के दौरान चयनित नाटकों को जूरी द्वारा 14 श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएंगे. इन नाटकों का मंचन मंडी हाउस के श्री राम सेंटर एवं कमानी सभागार में हो रहा है. इस बार चयन समिति को 400 से ज्यादा नाटकों में से चुनाव करना पड़ा. इस साल के नामांकित नाटकों में गुजराती, मलयालम, तमिल, कन्नड़ के साथ हिंदी और अंग्रेजी शामिल हैं.

इस बार दिखाए जा रहे नाटकों में अंधा युग के दो विविध अनुकरण (वड़ोदरा से गुजराती में और इम्फाल से हिंदी में) महाभारत के संग्राम की पृष्ठभूमि में मानवता पर उसके प्रतिप्रभाव का नाट्य मंचन करेंगे. इसी तरह चंडाला, इम्प्योर (तमिल) शेक्सपियर के रोमियो एंड जूलियट का अनुकरण है, जिसके माध्यम से भारतीय जाति प्रथा की बेरहमी को प्रस्तुत किया जाएगा.

नाटक चिल्लरा समरम (मलयालम) में लोगों का अपने शहर के नगर निगम के प्रति विरोध को दर्शाया गया है, जो हर छोटी दुकान की जगह आलीशान मॉल खड़ा कर, व्यापार में सिक्कों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर देना चाहते हैं. कोला (कन्नड़) एक पारिवारिक ड्रामा है, जो विदर्भ की ग्रामीण पृष्टभूमि में स्थापित है. इसमें रिश्ते, महत्वाकांक्षा, ख़ुशी, गम और क्रोध की कहानी है.

नाटक पुलिजन्मम (मलयालम) एक शास्त्रीय पाठ की पुनर्व्याख्या है, जो हाशिये पर आए दलितों के प्रति समाज की नैतिकता पर सवाल उठाता है. भागी हुई लड़कियां (हिन्दुस्तानी) नाटक बयानगी भरी प्रस्तुति है, जो कलाकार की दुविधा को दिलचस्प दृश्य पहलुओं से उभारती है, और इसमें दर्शकों से भी भागीदारी के लिए कहा जाता है.

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