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सभी राज्यों में पहले ही बन चुका है NRC? जानें क्या है असलियत

असम का नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (NRC) देश ही नहीं, बल्क‍ि आसपास के कई देशाें में भी काफी चर्चा में है. अब देश के कई राज्यों में ऐसा रजिस्टर बनाने की मांग उठ रही है. लेकिन क्या ऐसा रजिस्टर सभी राज्यों में पहले से ही है? जानें असलियत...

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aajtak.in
दिनेश अग्रहरि नई दिल्ली, 02 August 2018
सभी राज्यों में पहले ही बन चुका है NRC? जानें क्या है असलियत असम के एनआरसी को लेकर देश भर में है चर्चा

असम का नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (NRC) काफी चर्चा में है. इस पर काफी राजनीति और वाद-विवाद हो रहा है. ऐसा कहा जा रहा है कि असम एनआरसी के मामले में पहल करने वाला पहला राज्य है और अब बाकी राज्यों में भी एनआरसी लाने की मांग की जा रही है. लेकिन आपको यह जानकर अचरज होगा कि देश के सभी राज्यों में पहले ही एनआरसी तैयार हो चुका है. आइए जानते हैं क्या है सच्चाई...

असल में देश के बंटवारे के बाद यह जानना जरूरी था कि देश में कितने लोग वैध या अवैध तरीके से रहे हैं. इसलिए आजादी के बाद साल 1951 में ही देश भर में एक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स तैयार किया गया था. यह सभी राज्यों में तैयार किया गया. इस तरह अभी असम में जो एनआरसी तैयार किया जा रहा है वह नया नहीं है, बल्कि 1951 के एनआरसी को ही अपडेट किया जा रहा है.

साल 1951 में देश भर में जनगणना हुई थी, जिसमें हर गांव में सभी मकानों की क्रमवार ऑर्डर के मुताबिक जानकारी और उसमें कितने लोग रहते हैं, यह जानकारी हासिल हुई थी. इसके बाद इस जनगणना की सहायता से ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस तैयार किया गया. इस रजिस्टर को तैयार करने के बाद इसे केंद्र सरकार के निर्देश पर सभी इलाकों के डिप्टी कमिश्नर और एसडीएम के दफ्तरों में रखा गया. बाद में 1960 के दशक में ये रजिस्टर पुलिस विभाग को सौंप दिए गए.

क्या है असम का एनआरसी

असम का एनआरसी असल में साल 1951 में बने एनआरसी को अपडेट करने की ही कवायद है. इसमें उन सभी लोगों को शामिल किया जा रहा है जिनका नाम 1971 से पहले की मतदाता सूची या 1951 के एनआरसी में शामिल है.

असम में कैसे आगे बढ़ा एनआरसी अपडेट करने का काम

असल में सभी राज्यों में 1951 में जो एनआरसी तैयार की गई थी, वह जनगणना पर आधारित थी, इसमें लोगों का समुचित वेरिफिकेशन नहीं किया गया था. इस तरह असम में एनआरसी का अपडेशन, वह भी सिटीजनशिप के वेरिफिकेशन के साथ करने की इतनी बड़ी कवायद किसी राज्य में पहली बार हुई है.

1980 के दशक में असम में अवैध लोगों को बाहर करने का एक बड़ा आंदोलन हुआ. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन देकर 1951 के एनआरसी को अपडेट करने की मांग की. लेकिन इसके बाद 1985 में हुए असम समझौते में एनआरसी के अपडेट करने की बात शामिल नहीं की गई. 1990 में आसू ने मांग की कि असम समझौते को लागू किया जाए. इसके बाद 17 नवंबर, 1999 को हुए त्रिपक्षीय समझौते में एनआरसी को अपडेट करने का निर्णय लिया.

मनमोहन सिंह के दौर में मिली मंजूरी

तत्कालीन सरकार ने शुरुआती काम के लिए 20 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की. लेकिन कई वजहों से यह काम शुरू नहीं हो पाया. इसके बाद फिर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 5 मई, 2005 में हुए त्रिपक्षीय समझौते में एनआरसी को अपडेट करने करने को मंजूरी मिली. लेकिन काम कुछ खास आगे नहीं बढ़ा. फिर 22 अप्रैल, 2010 को हुई एक त्रिपक्षीय बैठक के बाद राज्य के चायगांव और बारपेटा सर्किल में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ.

यूपीए सरकार ने दी प्रतीक हजेला को जिम्मेदारी

आखिरकार मौजूदा प्रक्रिया यूपीए सरकार के समय ही साल 2013 में शुरू हुई, जब प्रतीक हजेला को एनआरसी अपडेट करके लिए स्टेट कोऑर्डिनेटर बनाया गया. लेकिन वास्तविक कार्य ने तेजी पकड़ी फरवरी 2015 में जब एनआरसी सेवा केंद्रों को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और 6.6 करोड़ दस्तावेजों के साथ एनआरसी में नाम डालने के लिए 3.29 करोड़ लोगों ने अप्लाई किया.

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

अगस्त 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को एनआरसी अपडेशन की पूरी प्रक्रिया को तीन साल के भीतर पूरा करने का आदेश दिया था. केंद्र सरकार ने इस रजिस्टर को अपडेट करने के लिए 288 करोड़ रुपये मंजूर किए. 

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