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नासा और इसरो ने मिलाया हाथ, बना रहे दुनिया का सबसे महंगा 'अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट'

निसार सैटेलाइट प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिक पॉल ए रोजेन ने बताया, 'यह टू-फ्रीक्वेंसी रडार है. इसका एल-बैंड 24 सेंटीमीटर का होगा, जबकि एस-बैंड 13 सेंटीमीटर का. एस-बैंड को इसरो बना रहा है, जबकि एल-बैंड को नासा विकसित करेगी. दोनों एजेंसियों के बीच तकनीकी तौर पर यह एक बड़ा साझा कार्यक्रम है.'

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aajtak.in
नंदलाल शर्मा लॉस एंजिल्स , 20 May 2017
नासा और इसरो ने मिलाया हाथ, बना रहे दुनिया का सबसे महंगा 'अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट' निसार या नासा-इसरो सिंथेटिक अपरचर रडार सैटेलाइट

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के बीच एक समय तक प्रतिबंधों के चलते बातचीत मुमकिन नहीं थी, लेकिन परिस्थितियां अब बदल गईं हैं. दोनों अंतरिक्ष एजेंसी संयुक्त रूप से एक सैटेलाइट पर काम कर रही हैं, जो पृथ्वी की निगरानी करेगा. इसे निसार (NISAR) नाम दिया गया है.

निसार या नासा-इसरो सिंथेटिक अपरचर रडार सैटेलाइट दुनिया का सबसे महंगा अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट हो सकता है. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक निसार को बनाने में दोनों देशों को संयुक्त रूप से 1.5 बिलियन डॉलर खर्च करना होगा. भारत और अमेरिका के वैज्ञानिक इस सैटेलाइट को वास्तविक रूप देने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं.

निसार सैटेलाइट प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिक पॉल ए रोजेन ने बताया, 'नासा और इसरो के बीच निसार पहली बड़ी साझेदारी है. यह टू-फ्रीक्वेंसी रडार है. इसका एल-बैंड 24 सेंटीमीटर का होगा, जबकि एस-बैंड 13 सेंटीमीटर का. एस-बैंड को इसरो बना रहा है, जबकि एल-बैंड को नासा विकसित करेगी. दोनों एजेंसियों के बीच तकनीकी तौर पर यह एक बड़ा साझा कार्यक्रम है.'

2021 में निसार सैटेलाइट को भारत से जिओ सिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) के जरिए लांच किया जाएगा. जाहिर है निसार से भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक नया क्षितिज खुलेगा.

रोसेन ने कहा, 'इन दोनों रडारों की मदद से हम हर हफ्ते पृथ्वी की तस्वीरें लेंगे. इन तस्वीरों के जरिए टेक्टोनिक प्लेट्स, बर्फ की परतें, समुद्री स्तर में उतार चढ़ाव, जंगल और कृषि की भूमि पर उगने वाली वनस्पतियों की निगरानी में मदद मिलेगी.'

उन्होंने कहा, 'हम एक तरह से पृथ्वी पर बदलाव के समय को दर्ज कर रहे हैं. इससे हमें पता चलेगा कि आपदा कैसे आकार लेती है. भूकंप कैसे आता है और ज्वालामुखी का फटना कैसे घटित होता है. साथ ही बर्फ की परतों के पिघलने से कैसे समुद्र का लेवल बदल रहा है. और कैसे जंगलों की आग और जंगल पर्यावरण पर असर डालते हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि समाज जिन चीजों की केयर करता है उनमें बदलाव से क्लाइमेट में क्या बदलाव आता है. पर्यावरण में क्या बदलाव आता है और इससे समाज पर क्या असर पड़ता है.'

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