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दौलत नहीं थी, सो गरीबी बांट ली: बिबेक देबरॉय

मुफ्त का माल एक बार बंटना शुरू हो गया तो इसे बंद करना मुश्किल होगा. आने वाली किसी भी सरकार के लिए समावेशन के जाल को तोडऩा मुश्किल होगा.

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बिबेक देबरॉयनई दिल्ली, 31 July 2013
दौलत नहीं थी, सो गरीबी बांट ली: बिबेक देबरॉय

जरूरी नहीं कि नीयत में करुणा और जज्बा हमेशा अच्छी नीति बनाने में मदद करें. एक पुरानी कहावत है: 25 से कम की उम्र में इंसान दिल से सोचता है और उम्र 25 से ऊपर हो जाए तो दिमाग से सोचने लगता है. आजाद भारत में नीति निर्माण को 65 साल से ऊपर हो चुके हैं. उसे वही गलतियां नहीं दोहरानी चाहिए जो उसने 1972 में की थीं, जब देश ने 25 की दहलीज पर कदम रखा था.

दो प्रभावशाली अर्थशास्त्रियों अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज की एक नई किताब आई है-ऐन अनसरटेन ग्लोरी. इसके तथ्यों पर कोई विवाद नहीं है. शिक्षा और सेहत जैसे मानव विकास के मानकों पर दूसरे देशों की तुलना में भारत का प्रदर्शन अच्छा नहीं है. समस्याएं उस वक्त आती हैं जब हम नीति निर्धारण में कदम रखते हैं और इस असंतुलन को सुधारने की कोशिश करते हैं.

आज इनक्लूसिव ग्रोथ का बोलबाला है और इसके खिलाफ कम ही आवाजें उठती हैं. सरकार मनरेगा में रोजगार देगी. सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक के जरिए चावल, गेहूं और मोटा अनाज देगी. कुछ राज्य सरकारें इडली, मछली और चिकन देंगी. अब नजरिया यह बन गया है कि सस्ते में बांट देना है. इसकी भी परवाह नहीं की जाती कि बीपीएल की पहचान हुई भी है या नहीं. सरकारी व्यवस्था और सरकारी हस्तक्षेप की यह सोच नई नहीं है.

साठ के दशक के मध्य से सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों का दौर याद करें. क्या हम भारत के तीन खोए हुए विकास दशकों की तरफ  लौट रहे हैं? मानव विकास को ही लें. आमतौर पर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्र से जुड़े संकेतकों को मानव विकास का पैमाना माना जा रहा है. खासकर यूएनडीपी क्रय शक्ति समानता, प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा (साक्षरता दर, सकल भर्ती अनुपात) और स्वास्थ्य (औसत आयु) के आधार पर मानव विकास सूचकांक की गणना करता है. यह गणना 1990 में शुरू हुई थी. छठे दशक में मानव विकास सूचकांक नहीं था.

मानव विकास के बारे में देशभर के आंकड़े अपर्याप्त थे. क्रय शक्ति समानता जैसी कोई चीज नहीं थी. तो आइए, हम सरकारी विनिमय दरों के आधार पर मानक प्रति व्यक्ति आय देखें. 1960 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 73 डॉलर और थाइलैंड की 92 डॉलर थी. 2012 में थाइलैंड में यह आय 5,678 डॉलर और भारत में 1,492 डॉलर थी. थाइलैंड कोई अपवाद नहीं है. 1960 में भारत की स्थिति दक्षिण कोरिया और सिंगापुर को मिलाकर पूर्व एशिया के सभी देशों के आस-पास थी. आज हम मध्यम आय वाले उन देशों में नहीं गिने जाते.

साठ-सत्तर के दशकों में शायद समावेश शब्द का इस तरह उपयोग नहीं होता था. विशिष्ट प्रावधान थोड़े भिन्न थे लेकिन सैद्धांतिक और वैचारिक रुझान खासतौर पर 2004 से ऐसा ही है. 1991 में वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो के कथन में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ कहा था कि अब उदारीकरण का समय आ गया है.

उदारीकरण को जैसे भी परिभाषित करें, उसका अर्थ है प्रतिस्पर्धा, विकल्प और कार्यकुशलता तथा उपयुक्त निगरानी के साथ बाजार पर निर्भरता. गरीबों के लिए सरकार की वित्तीय सब्सिडी से इसका कोई टकराव नहीं, लेकिन एकाधिकारवादी सरकारी सप्लाई से पूरा टकराव है. अब हम उदारीकरण को भुलाकर सरकारी दखल के दौर में लौट आए हैं. वैसे बेहतर तो यह होता कि इस सोच का समय कभी आता ही नहीं, साठ के दशक में भी नहीं.

अच्छी शराब उम्र के साथ निखरती है, लेकिन बुरी शराब का सिरका बन जाता है. इसका कोई मतलब नहीं कि सरकारी हस्तक्षेप के लिए लगभग सभी पार्टियों का समर्थन है. तो क्या साठ और सत्तर के दशक में हमने भूल की थी? आम वकील की भाषा में इसका जवाब हां या ना हो सकता है. अगर उम्मीद के मुताबिक जवाब हां है तो हमें लौटकर देखना होगा कि उस समय अर्थशास्त्रियों और असरदार गैर-अर्थशास्त्रियों ने क्या लिखा और कहा था. सत्तर के बाद से आर्थिक सर्वेक्षण का चलन है, उन्हें पढ़कर देखिए.

बेवकूफी भरी नीतियों को सबका समर्थन सामूहिक मूर्खता के प्रमाण से ज्यादा कुछ नहीं. सवाल है कि सरकारी दखल में गलत क्या है? एक तो इससे अकुशलता आती है और अकुशलता वृद्धि में बाधक है. दूसरे सरकार निजी क्षेत्र में इस्तेमाल हो सकने वाले संसाधनों पर पहले से नियंत्रण कर लेती है. तीसरे सरकार, बाजार और कीमतों को गड़बड़ कर देती है. चौथे इस बात की कोई गारंटी नहीं कि सरकारी खर्च का सही उपयोग होगा. 65 सालों में सरकारी खर्च सही ढंग से हुआ होता तो भारत गरीब न होता, सेन और द्रेज को किताब लिखने के लिए कोई और विषय सोचना पड़ता.

इसी क्रम में कुछ और बातें कहीं जा सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर तथाकथित नेहरूवादी मॉडल ने हमें कम वृद्धि और कम आय का उपहार ही दिया है. साधन कम थे, बांटने के लिए संसाधन कम थे और हमने दौलत की बजाए गरीबी को दोबारा बांट दिया. मानव विकास रिपोर्ट प्रति व्यक्ति आय और शिक्षा अथवा स्वास्थ्य जैसे संकेतकों के बीच संबंध दिखाती है. 1991 से भारत मानव विकास सूचकांक में आगे बढ़ा है और कम से उठकर मध्यम मानव विकास तक पहुंचा है.

इसका अर्थ यह नहीं कि खासकर पिछड़े क्षेत्रों में कमियां नहीं हैं लेकिन विकास प्रक्रिया का दम घोटने से भी कुछ नहीं मिलेगा. समस्या यह है कि अधिकारों और सब्सिडी के लिए लाभार्थियों का ही नहीं, बल्कि राजनैतिक दलों सहित लगभग सबका समर्थन है. मुफ्त का माल किसे नहीं सुहाता? एक बार शुरू होने पर मुफ्त की सहायता को वापस लेना मुश्किल है.

इसमें वर्षों लग जाते हैं. 2014 में चाहे जो भी राजनैतिक गुट सरकार बनाए, उसके लिए चाहने पर भी समावेशन के इस जाल को तोडऩा मुश्किल होगा. दूसरी जगह इस्तेमाल किए जा सकने वाले संसाधनों के अवसर की लागत और गंवाई हुई वृद्धि के अवसर की लागत अभी दिखाई नहीं दे रही. 1960/1970 के दशक की नीति एक त्रासदी थी. 2004 से लागू नीति छल, धोखा और नाटक है.

(लेखक दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं)

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