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राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा, मिशन पूरा हुआ

चीनी नेतृत्व के साथ हुई ‘सार्थक’ बातचीत से उत्साहित राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सोमवार को कहा कि उन्होंने दोनों देशों के बीच ‘विश्वास, दोस्ती और समझ’ को विस्तार देने के अपने मिशन को पूरा किया है.

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राष्ट्रपति के विशेष विमान सेभाषा, 31 May 2010
राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा, मिशन पूरा हुआ

चीनी नेतृत्व के साथ हुई ‘सार्थक’ बातचीत से उत्साहित राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सोमवार को कहा कि उन्होंने दोनों देशों के बीच ‘विश्वास, दोस्ती और समझ’ को विस्तार देने के अपने मिशन को पूरा किया है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करने की भारत की कोशिशें और द्विपक्षीय कारोबार में मौजूद असंतुलन को सुधारने सहित विभिन्न अहम मुद्दों पर चीनी नेताओं की ओर से मिले समर्थन का हवाला देते हुए प्रतिभा ने कहा कि भारत-चीन संबंध विशुद्ध द्विपक्षीय पहलुओं से कहीं आगे जाकर एक नये वैश्विक आयाम पर पहुंच गये हैं.

चीन की अपनी छह दिवसीय राजकीय यात्रा के बाद शंघाई से स्वदेश लौटते हुए प्रतिभा ने चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ तथा प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ ‘सकारात्मक, सार्थक’ और व्यापक मुद्दों’ पर हुई बातचीत का जिक्र किया. यह बीते एक दशक में देश के किसी राष्ट्रपति का पहला चीन दौरा था. प्रतिभा ने कहा, ‘हम दोनों देशों के बीच सामरिक और सहयोगात्मक भागीदारी को विस्तार देने, उसे मजबूत करने तथा उसमें विविधता लाने पर सहमत हुए हैं.’

चीन के साथ सीमा विवाद के बारे में पूछे जाने पर राष्ट्रपति ने कहा कि भारत इस मुद्दे का ‘निष्पक्ष, तर्कसंगत और साझा तौर पर स्वीकार्य’ हल चाहता है. इस उद्देश्य के लिये एक तंत्र गठित किया गया है और इस दिशा में कुछ प्रगति भी हासिल हुई है. उन्होंने कहा कि विवाद का निपटारा लंबित रहते दोनों देशों ने फैसला किया है कि वे सीमा पर शांति तथा सौहार्द बनाये रखेंगे.

प्रतिभा ने कहा कि चीन में उनके कार्यक्रम से दोनों पड़ोसी देशों के बीच विश्वास, मैत्री और समझ को विस्तार देने में मदद मिली. उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि मैं इन उद्देश्यों में सफल रही.’ राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी सभी बैठकों में भारत के साथ संबंध मजबूत करने की चीनी नेतृत्व की प्रतिबद्धता नजर आयी. उन्होंने कहा, ‘मैंने पुनर्गठित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की भारत की महत्वाकांक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया.’

प्रतिभा ने कहा कि हू और वेन ने भारत की इच्छा को समझा और उसका समर्थन किया. चीन के राष्ट्रपति ने 2011-2012 के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सीट पर दावेदारी को समर्थन देने की बात कही. व्यापारिक असंतुलन के एक और महत्वपूर्ण मुद्दे के संदर्भ में राष्ट्रपति ने कहा, ‘बीजिंग में हुई चर्चा के बाद मुझे भरोसा है कि हम चीन के साथ संतुलित तरीके से हमारे आर्थिक संवाद को विस्तार दे सकेंगे और उसमें विविधता ला सकेंगे.’

प्रतिभा ने अपनी यात्रा की सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि उनके दिल्ली रवाना होने से पहले शंघाई में निजी क्षेत्र के लिये तीन व्यापारिक समझौता प्रपत्रों पर हस्ताक्षर हुए. साथ ही, जब वह बीजिंग में थीं तब दोनों सरकारों के बीच भी उड्डयन और खेल के क्षेत्र में तीन करार हुए. उनकी चर्चा में इस वर्ष के अंत से पहले छह अरब अमेरिकी डॉलर के द्विपक्षीय कारोबार के लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों पर ध्यान केंद्रित किया गया.

पहली तिमाही के रूझान संकेत देते हैं कि उद्देश्य पूरा किया जा सकता है. यह पूछे जाने पर कि क्या रक्षा सहयोग की संभावना है, राष्ट्रपति ने कहा कि सैन्य आदान-प्रदान के लिये पहले से एक कार्यक्रम है. ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की ओर बांध निर्माण के बारे में पूछे जाने पर प्रतिभा ने कहा कि चीन ने भारत को पानी से संबंधित जानकारी दी है जो बाढ़ संबंधी पूर्वानुमानों और जल प्रबंधन के लिहाज से उपयोगी होगी.

शंघाई में भारत-चीन व्यापारिक मंच को संबोधित करते हुए प्रतिभा ने दोनों देशों के उद्योगपतियों से अपील की कि वह ‘सहयोग का ऐसे मॉडल’ विकसित करें जो द्विपक्षीय संबंधों की चिंताओं पर ध्यान दे और जो व्यापार की वास्तविक क्षमताओं को साकार करे. राष्ट्रपति ने कहा कि भारत और चीन के बीच संबंधों में शताब्दी के सबसे बड़े आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों में तब्दील होने की क्षमता है.

उन्होंने कहा, ‘दीर्घकालिक भागीदारी के लिये यह महत्वपूर्ण है कि हम सहयोग के मॉडल विकसित करें जिनमें दोनों पक्षों की चिंताओं पर ध्यान दिया जाये मुझे भरोसा है कि हमारे आर्थिक संबंधों के विकसित होने के साथ ऐसा हो सकेगा.’ द्विपक्षीय व्यापार के वर्ष 2000 में तीन अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2008 में 52 अरब डॉलर हो जाने के प्रभावशाली आंकड़ों की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि इसे और विस्तार देने की अब भी पर्याप्त गुंजाइश है. लेकिन प्रतिभा ने जोर दिया कि जरूरत यह है कि भारत के निर्यात को उसकी क्षमताओं का निष्पक्ष रूप से प्रतिनिधित्व करने लायक बनाया जाये.

प्रतिभा ने कहा कि भारत के चीन को निर्यात के आंकड़ों से देश की कई क्षेत्रों में मौजूद क्षमताएं पूरी तरह नहीं झलकतीं. मसलन, फार्मा और इंजीनियरिंग क्षेत्र के उत्पादों की हिस्सेदारी महज थोड़ी है. इसी तरह, भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की भी चीन के घरेलू बाजार में सीमित मौजूदगी है. वर्ष 2009 में दोनों देशों के बीच जो व्यापारिक असंतुलन था उसमें भारत की तुलना में चीन का पलड़ा भारी था. 44 अरब डॉलर के कुल द्विपक्षीय कारोबार में चीन का व्यापारिक सरप्लस 16 अरब डॉलर था और उसका भारत को हुआ निर्यात करीब 30 अरब डॉलर था. राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि भारत चीनी कंपनियों के साथ व्यापार करने और निवेश का स्वागत करने को तैयार है.

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