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मोदी सरकार के इस बजट से बढ़ेगी महंगाई, ये है वजह

ये बजट महंगाई बढ़ा सकता है. इसकी दो वजहें हैं, एक ये कि जीएसटी काउंसिल जो फैसला कर चुकी है और जीएसटी की नीतियों में जो बदलाव हुए हैं उनका असर कंजम्पशन पर दिखाई दे रहा है.

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अंशुमान तिवारी [Edited by: अजीत तिवारी]नई दिल्ली, 02 February 2018
मोदी सरकार के इस बजट से बढ़ेगी महंगाई, ये है वजह इंडिया टुडे हिन्दी के संपादक अंशुमान तिवारी और आजतक डिजिटल के संपादक पाणिनि आनंद

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा एक फरवरी को पेश बजट को लेकर कई प्रकार की उलझने हैं. इसमें एक मुद्दा महंगाई का भी है. सवाल ये है कि क्या इस बजट से महंगाई कम होगी या बढ़ जाएगी. इसी मुद्दे की जटिलता को इंडिया टुडे हिन्दी के संपादक अंशुमान तिवारी ने बताया.

महंगाई बढ़ा सकता है ये बजट

उन्होंने कहा कि ये बजट महंगाई बढ़ा सकता है. इसकी दो वजहें हैं, एक ये कि जीएसटी काउंसिल जो फैसला कर चुकी है और जीएसटी की नीतियों में जो बदलाव हुए हैं उनका असर कंजम्पशन पर दिखाई दे रहा है. साथ ही महंगाई पर भी इसका असर दिख रहा है.

इंपोर्ट ड्यूटी से बढ़ेगी महंगाई

दूसरी बात ये कि इंपोर्ट ड्यूटी पर जो 10 फीसदी का स्पेशल सर चार्ज आया है, उससे चीजों के दाम बढ़ेंगे. जैसे स्मार्टफोन्स भारत में नहीं बनते, तो उनकी दरें भारत में बढ़ेंगी. एक तो इसका असर होगा और दूसरा एक तकनीकी गणित है. वो ये कि जब-जब सरकारों के घाटे बढ़ते हैं, जब राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो सरकारें ज्यादा कर्ज लेती हैं और यही ज्यादा कर्ज महंगाई की वजह बनता है. यही कारण है कि इस बजट से महंगाई प्रत्यक्ष रूप से नहीं बल्कि परोक्ष रूप से बढ़ेगी.

सरकार के सामने दो बड़ी दुविधा

इससे पहले भी सरकार के सामने दो बड़ी दुविधा थी, वो किसान को साधे या उपभोक्ता को. अगर किसान के लिए एमएसपी बढ़ेगा, तो बाजार में और खाने की कीमतों में उसका असर दिखाई देगा. अगर एमएसपी का वादा पूरी तरह से लागू होता है तो खरीफ की फसलों के समर्थन मूल्य पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा होंगे और उनका असर नवंबर-दिसंबर तक महंगाई के रूप में दिखाई देगा. साथ ही ये वहीं समय होगा जब सरकार चुनाव की तरफ जा रही होगी.

अंशुमान निदा फ़ाज़ली का एक शेर सुनाते हुए कहते हैं कि...

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिसको भी देखना हो कई बार देखना

वो आगे कहते हैं कि हमेशा एक बजट में 10-20 बजट होते हैं. लेकिन इस बार के बजट में करीब 40 छोटे-छोटे बजट हैं. यही कारण है कि आपको बजट के हर पहलू या छोटे-छोटे हिस्से को बारीकी से देखना और समझना होगा.

जब आप एक-एक चीज को देखेंगे, तो आपको निराशा हाथ लग सकती है. आप कह सकते हैं कि मोदी केयर के रूप में एक बड़ी हेल्थ केयर स्कीम आई लेकिन इसके तह तक जाने पर आपको दिखेगा कि हेल्थ का एलोकेशन बढ़ा ही नहीं है, तो स्कीम कहां से लागू होगी और पैसा कहां से मिलेगा.

सरकार ने पहली बार इस बात की नीतिगत रूप से घोषणा की कि वो लागत का डेढ गुणा समर्थन मूल्य देगी. साथ ही कंप्रीहेंसिव हेल्थ स्कीम की घोषणा की गई. जिसमें 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख के इलाज के बीमा को इनश्योर किया जाएगा.

तीसरा महत्वपूर्ण बात ये है कि पहली बार पिछले पांच साल के इतिहास में डायरेक्ट टेक्स के हिसाब से इतना बड़ा बजट है. जनता अक्सर ये सोचती थी कि जीएसटी के आने से टैक्स का झंझट खत्म हो जाएगा. लेकिन जनता ये नहीं जानती कि सरकारों के पास टैक्स लगाने के दर्जनों तरीके हैं. इस हिसाब से टैक्सेशन के नजरिए से देखा जाए तो डायरेक्ट टेक्सेशन के हिसाब से ये पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा टेक्सेशन वाला बजट है.

फसल समर्थन मूल्य

सबसे बड़ा सवाल समर्थन मूल्य को लेकर है कि समर्थन मूल्य की नीति कैसे आएगी, ये लागू कैसे होगा, लागत की गणना कैसे होगी, किन फसलों पर लगाया जाएगा? 2014 में जब सरकार सत्ता में आई थी तो ये थ्योरी थी कि समर्थन मूल्य से महंगाई बढ़ती है.

हुआ ये कि पिछले तीन-चार साल में इतना समर्थन मूल्य बढ़ाया कि फसल महंगी हो गई और बाजार में महंगाई बढ़ी. इसलिए सरकार ने ये तय किया कि हम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाएंगे. राज्यों से ये भी कह दिया गया कि वो बोनस भी डिक्लेयर न करें. लेकिन इसके बाद सूखा पड़ गया. एक नहीं दो बार सूखा पड़ा, रबी की फसल खराब हो गई. सरकार डर गई कि कहीं वोटर नाराज न हो जाए, इसलिए समर्थन मूल्य की नीति वापस ले ली.

सरकार ने घोषणा पत्र में वादा किया था कि किसानों की लागत का दो या ढाई गुणा समर्थन मूल्य देंगे. अब जो पॉलिसी आई है इसमें सरकार ने कहा कि लागत का डेढ गुणा समर्थन मूल्य दिया जाएगा. अब सवाल ये है कि लागत की गणना कैसे होगी. क्योंकि उत्तराखंड में जिस लागत पर गेंहू पैदा होता है, उत्तर प्रदेश में वो लागत मूल्य अलग है. पंजाब में जिस लागत से आलू पैदा होता है ईटावा और फरुखाबाद में वो लागत अलग है.

हालांकि, समर्थन मूल्य की नीति को लागू करने में कोई समस्या नहीं है. आज रबी की फसल को देखें तो लागत का 50 फीसदी समर्थन मूल्य दिया गया है. सरकार के लिए समर्थन मूल्य की गणना करना भी उतना मुश्किल नहीं है क्योंकि सरकार के पास सीएसीपी जैसी संस्थाएं हैं जो गणना करके बता देंगी. दुविधा ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समर्थन मूल्य होंगे और सरकार कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही समर्थन मूल्य घोषित करती है.

नीचे दिए गए लंक्स पर क्लिक कर पूरी चर्चा को देखा सकता है और मोदी सरकार के कार्यकाल के अंतिम बजट की जटिलताओं को समझा जा सकता है...

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