एडवांस्ड सर्च

पार्टी के हर फैसले को किया स्वीकार, शीला दीक्षित ने कभी नहीं मानी हार

शीला दीक्षित को पता था कि पार्टी की क्या हालत है बावजूद इसके उन्होंने उम्र के इस पड़ाव में भी प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला. बात सिर्फ कमान संभालने की ही नहीं, लोकसभा चुनाव भी पार्टी ने लड़ने को कहा और वह लड़ीं.

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 21 July 2019
पार्टी के हर फैसले को किया स्वीकार, शीला दीक्षित ने कभी नहीं मानी हार पार्टी के हर फैसले को माना

4 जनवरी 2019 को अजय माकन ने ऐसे में समय दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में वापसी के ख्वाब संजो रही थी. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस्तीफा दिल्ली में कमजोर हो चली कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं था. मुश्किल वक्त में कांग्रेस को शीला दीक्षित के अलावा कोई दूसरा विकल्प बेहतर नहीं लगा.

शीला दीक्षित को पता था कि पार्टी की क्या हालत है बावजूद इसके उन्होंने उम्र के इस पड़ाव में भी दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष पद स्वीकार किया. बात सिर्फ कमान संभालने की ही नहीं लोकसभा चुनाव भी पार्टी ने लड़ने को कहा और लड़ीं. शीला दीक्षित ने पार्टी के किसी भी फैसले को ना नहीं कहा.

शीला दीक्षित ने जब दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष पद की आखिरी बार जिम्मेदारी संभाली तब उनकी उम्र 80 साल  थी. उनके इस कदम ने पार्टी के प्रति उनके समर्पण के भाव को दिखाया. शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने हालिया लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन दिखाया. हालांकि कांग्रेस इस प्रदर्शन को सीटों में नहीं बदल पाई.

UP के CM पद की उम्मीदवार घोषित हुईं

2014 में केंद्र की सत्ता से बाहर होने के बाद से कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही थी. साल 2017 में कांग्रेस को एक फिर शीला दीक्षित की याद आई लेकिन दिल्ली नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े सियासी सूबे यूपी के लिए. यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. हालांकि समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद पार्टी ने उनकी उम्मीदवारी वापस ले ली थी.

केरल की राज्यपाल भी रहीं शीला दीक्षित

2013 के विधानसभा चुनाव की हार ने शीला दीक्षित को कांग्रेस में हाशिए पर धकेल दिया था. इसके बाद वह केरल की राज्यपाल (मार्च 2014-अगस्त 2014) बनीं . राज्यपाल बनने के कारण वह दिल्ली की सियासत से दूर हो गईं. इस बीच कांग्रेस ने अजय माकन और अरविंदर सिंह लवली को प्रदेश में पार्टी को मजबूत बनाने का जिम्मा सौंपा लेकिन वो नाकामयाब रहे.

sheila-dixit3_072119121518.jpg

15 साल के शासन के दौरान सामने आईं कई चुनौतियां

- 1998 से 2013 तक के अपने 15 साल के शासन के दौरान उन्होंने दिल्ली का चेहरा पूरी तरह से बदलकर रख दिया.

- 1998 में विधानसभा चुनावों से पहले उन्हें चौधरी प्रेम सिंह की जगह दिल्ली कांग्रेस प्रमुख बनाया गया. इसके बाद शीला दीक्षित के नेतृत्व में पार्टी ने 70 में से 52 सीटें जीती. शीला दीक्षित ने यहां से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने 2003 और 2008 में फिर से जीत हासिल की.

-  2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख के तौर पर उन्होंने दोबारा वापसी की. वह उत्तर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ीं लेकिन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी से हार गईं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay