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व्यंग्य: जब जमी बाबूलाल गौर के संस्मरणों की महफिल

'कुछ हो जाए गुरुजी', योगा कैंप में चीफ गेस्ट बन कर पहुंचे बाबूलाल गौर से हर कोई कुछ सुनना चाहता था. माना जाता है कि बाबूलाल के पास ढेरों संस्मरण हैं. विदेशों के उनके संस्मरण ज्यादा रोचक होते हैं. जनता की बेहद मांग पर बाबूलाल तैयार हो गए.

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मृगांक शेखरनई दिल्ली, 20 May 2015
व्यंग्य: जब जमी बाबूलाल गौर के संस्मरणों की महफिल बाबूलाल गौर

'कुछ हो जाए गुरुजी', योगा कैंप में चीफ गेस्ट बन कर पहुंचे बाबूलाल गौर से हर कोई कुछ सुनना चाहता था. माना जाता है कि बाबूलाल के पास ढेरों संस्मरण हैं. विदेशों के उनके संस्मरण ज्यादा रोचक होते हैं. जनता की बेहद मांग पर बाबूलाल तैयार हो गए.

फिर उन्होंने शर्त रखी. मीडिया के लोग बाहर चले जाएं तभी ऐसा मुमकिन है. फिर तय हुआ कि कैमरे बंद कर दिए जाएंगे - और सारी बातें ऑफ द रिकॉर्ड होंगी. संस्मरण सुनने को लेकर दो लोग सबसे ज्यादा उत्सुक थे. दोनों ही बाबूलाल को गुरुजी कह कर संबोधित कर रहे थे.

'अच्छा सुनो. मैं पहली बार थाइलैंड गया था. गजबे कंट्री है . बिलकुल आजाद. अरे, अपने देश में क्या आजादी है. कभी बैंकॉक जाकर देखो. तबीयत हरी हो जाती है. लेकिन हर कोई वहां टिक नहीं सकता. उसके लिए कलेजा चाहिए.'

'जी गुरुजी.' दोनों ने एक साथ हामी भरी.

'तुम क्या समझते हो राहुल गांधी थाइलैंड गए होंगे? मैं नहीं मानता. वो थाइलैंड जा ही नहीं सकते. अगर चले भी गए तो वो भाग खड़े होंगे.'

'क्यों गुरुजी?' दोनों में से एक ने सवाल जड़ दिया.

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