एडवांस्ड सर्च

चांद तक पहुंचने में चंद्रयान-2 भिड़ेगा अंतरिक्ष के इन सात दुश्मनों से

इसरो ने चंद्रयान-2 मिशन के कठिनाइयों के बारे में बताया है. इसमें बताया गया है कि भारतीय वैज्ञानिक चंद्रयान-2 को लॉन्च करने के बाद उसे चांद पर लैंड कराने तक किस तरह की समस्याओं से रूबरू होने वाले हैं. हालांकि, वैज्ञानिकों ने भरोसा जताया है कि वे इन सारी चुनौतियों के पूरा कर लेंगे.

Advertisement
ऋचीक मिश्रानई दिल्ली, 04 June 2019
चांद तक पहुंचने में चंद्रयान-2 भिड़ेगा अंतरिक्ष के इन सात दुश्मनों से जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट से छोड़ा जाएगा चंद्रयान-2.

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने चंद्रयान-2 मिशन के कठिनाइयों के बारे में बताया है. इसमें बताया गया है कि भारतीय वैज्ञानिक चंद्रयान-2 को लॉन्च करने के बाद उसे चांद पर लैंड कराने तक किस तरह की समस्याओं से रूबरू होने वाले हैं. हालांकि, वैज्ञानिकों ने भरोसा जताया है कि वे इन सारी चुनौतियों को पूरा कर लेंगे. चंद्रयान-2 को 9 से 16 जुलाई के बीच छोड़ा जाएगा.

सात तरह की चुनौतियां आएंगी सामने चंद्रयान-2 के सफर में

पहली चुनौतीः सटीक रास्ते पर ले जाना

लॉन्च के समय धरती से चांद की दूरी करीब 3 लाख 84 हजार 400 किमी होगी. इतने लंबे सफर के लिए सबसे जरूरी सही मार्ग (ट्रैजेक्टरी) का चुनाव करना. क्योंकि सही ट्रैजेक्टरी से चंद्रयान-2 को धरती, चांद और रास्ते में आने वाली अन्य वस्तुओं की ग्रैविटी, सौर विकिरण और चांद के घूमने की गति का कम असर पड़ेगा.

दूसरी चुनौतीः गहरे अंतरिक्ष में संचार

धरती से ज्यादा दूरी होने की वजह से रेडियो सिग्नल देरी से पहुंचेंगे. देरी से जवाब मिलेगा. साथ ही अंतरिक्ष में होने वाली आवाज भी संचार में बाधा पहुचांएंगे.

तीसरी चुनौतीः चांद की कक्षा में पहुंचना

चंद्रयान-2 को चांद की कक्षा में पहुंचाना आसान नहीं होगा. लगातार बदलते ऑर्बिटल मूवमेंट की वजह से चंद्रयान-2 को चांद की कक्षा में पहुंचाने के लिए अत्यधिक सटीकता की जरूरत होगी. इसमें काफी ईंधन खर्च होगा. सही कक्षा में पहुंचने पर ही तय जगह पर लैंडिंग हो पाएगी.

चौथी चुनौतीः चांद की कक्षा में घूमना

चंद्रयान-2 के लिए चांद के चारों तरफ चक्कर लगाना भी आसान नहीं होगा. इसका बड़ा कारण है चांद के चारों तरफ ग्रैविटी बराबर नहीं है. इससे चंद्रयान-2 के इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर पड़ता है. इसलिए, चांद की ग्रैविटी और वातावरण की भी बारीकी से गणना करनी होगी.

पांचवीं चुनौतीः चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग

इसरो वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रमा पर चंद्रयान-2 को रोवर और लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग सबसे बड़ी चुनौती है. चांद की कक्षा से दक्षिणी ध्रुव पर रोवर और लैंडर को आराम से उतारने के लिए प्रोपल्शन सिस्टम और ऑनबोर्ड कंप्यूटर का काम मुख्य होगा. ये सभी काम ऑटोमैटिकली होंगी.

छठीं चुनौतीः चंद्रमा की धूल

चांद की सतह पर ढेरों गड्ढे, पत्थर और धूल है. जैसे ही लैंडर चांद की सतह पर अपना प्रोपल्शन सिस्टम ऑन करेगा, वहां तेजी से धूल उड़ेगी. धूल उड़कर लैंडर के सोलर पैनल पर जमा हो सकती है, इससे पावर सप्लाई बाधित हो सकती है. ऑनबोर्ड कंप्यूटर के सेंसर्स पर असर पड़ सकता है.

सातवीं चुनौतीः बदलता तापमान

चांद का एक दिन या रात धरती के 14 दिन के बराबर होती है. इसकी वजह से चांद की सतह पर तापमान तेजी से बदलता है. इससे लैंडर और रोवर के काम में बाधा आएगी.

चंद्रयान-2 में सभी पेलोड्स स्वदेशी हैं

चंद्रयान-2 में एक भी पेलोड विदेशी नहीं है. इसके सभी हिस्से पूरी तरह से स्वदेशी हैं, जबकि, चंद्रयान-1 के ऑर्बिटर में 3 यूरोप और 2 अमेरिका के पेलोड्स थे. भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो 11 साल बाद एक बार फिर चंद्रमा की सतह को खंगालने के लिए तैयार है.

दक्षिणी ध्रुव के पास उतरेगा चंद्रयान-2

इसरो ने उम्मीद जताई है कि चंद्रयान-2 चंद्रमा पर 6 सितंबर को दक्षिणी ध्रुव के पास उतरेगा. चंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं, जिनके नाम ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) हैं. इस प्रोजेक्ट की लागत 800 करोड़ रुपए है. 9 से 16 जुलाई के बीच चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी 384400 किलोमीटर रहेगी. अगर मिशन सफल हुआ तो अमेरिका, रूस, चीन के बाद भारत चांद पर रोवर उतारने वाला चौथा देश होगा.

gslv-mk-3-750_060419085121.jpg

सबसे ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 से होगी लॉन्चिंग

चंद्रयान-2 इसरो के सबसे ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 से पृथ्वी की कक्षा के बाहर छोड़ा जाएगा. फिर उसे चांद की कक्षा में पहुंचाया जाएगा. करीब 55 दिन बाद चंद्रयान-2 चांद की कक्षा में पहुंचेगा. फिर लैंडर चांद की सतह पर उतरेगा. इसके बाद रोवर उसमें से निकलकर विभिन्न प्रयोग करेगा. चांद की सतह, वातावरण और मिट्टी की जांच करेगा. वहीं, ऑर्बिटर चंद्रमा के चारों तरफ चक्कर लगाते हुए लैंडर और रोवर पर नजर रखेगा. साथ ही, रोवर से मिली जानकारी को इसरो सेंटर भेजेगा.

मिशन कितने दिनों का

ऑर्बिटर- 1 साल, लैंडर (विक्रम)- 15 दिन, रोवर (प्रज्ञान)- 15 दिन

मिशन का कुल वजनः 3877 किलो

ऑर्बिटर- 2379 किलो, लैंडर (विक्रम)- 1471 किलो, रोवर (प्रज्ञान)- 27 किलो

ऑर्बिटरः चांद से 100 किमी ऊपर इसरो का मोबाइल कमांड सेंटर

चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चांद से 100 किमी ऊपर चक्कर लगाते हुए लैंडर और रोवर से प्राप्त जानकारी को इसरो सेंटर पर भेजेगा. इसमें 8 पेलोड हैं. साथ ही इसरो से भेजे गए कमांड को लैंडर और रोवर तक पहुंचाएगा. इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाकर 2015 में ही इसरो को सौंप दिया था.

विक्रम लैंडरः रूस के मना करने पर इसरो ने बनाया स्वदेशी लैंडर

लैंडर का नाम इसरो के संस्थापक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है. इसमें 4 पेलोड हैं. यह 15 दिनों तक वैज्ञानिक प्रयोग करेगा. इसकी शुरुआती डिजाइन इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद ने बनाया था. बाद में इसे बेंगलुरु के यूआरएससी ने विकसित किया.

प्रज्ञान रोवरः इस रोबोट के कंधे पर पूरा मिशन, 15 मिनट में मिलेगा डाटा

27 किलो के इस रोबोट पर ही पूरे मिशन की जिम्मदारी है. इसमें 2 पेलोड हैं. चांद की सतह पर यह करीब 400 मीटर की दूरी तय करेगा. इस दौरान यह विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग करेगा. फिर चांद से प्राप्त जानकारी को विक्रम लैंडर पर भेजेगा. लैंडर वहां से ऑर्बिटर को डाटा भेजेगा. फिर ऑर्बिटर उसे इसरो सेंटर पर भेजेगा. इस पूरी प्रक्रिया में करीब 15 मिनट लगेंगे. यानी प्रज्ञान से भेजी गई जानकारी धरती तक आने में 15 मिनट लगेंगे.

chandrayaan-2-750_060419085303.png

11 साल क्यों लगे चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग में

नवंबर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह इस प्रोजेक्ट में साथ काम करेगा. वह इसरो को लैंडर देगा. 2008 में इस मिशन को सरकार से अनुमति मिली. 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया. जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई. फिर इसकी लॉन्चिंग 2016 में तय की गई. हालांकि, 2015 में ही रॉसकॉसमॉस ने प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए.

फिर...इसरो ने खुद बनाया स्वदेशी लैंडर, रोवर

इसरो ने चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग मार्च 2018 तय की. लेकिन कुछ टेस्ट के लिए लॉन्चिंग को अप्रैल 2018 और फिर अक्टूबर 2018 तक टाला गया. इस बीच, जून 2018 में इसरो ने फैसला लिया कि कुछ जरूरी बदलाव करके चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग जनवरी 2019 तय हुई. फिर इसे फरवरी 2019 किया गया. अप्रैल 2019 में भी लॉन्चिंग की खबर आई थी, पर हुई नहीं.

चंद्रयान-1...जब, पहली बार इसरो ने चांद को छुआ

भारत ने 2008 में चांद पर अपना पहला मिशन चंद्रयान-1 लॉन्च किया था. 392 दिन काम करने के बाद ईंधन की कमी से मिशन 29 अगस्त 2009 को खत्म हो गया. इस दौरान चंद्रयान-1 ने चांद के 3400 चक्कर लगाए थे. अभी तक चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने वाले देश अमेरिका, रूस और चीन ही हैं. चंद्रयान-1 ने चांद पर पानी के सबूत भी जुटाए थे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay