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राखीगढ़ी से मिले 4,500 वर्ष पुराने कंकाल के DNA में नहीं मिला ‘आर्य जीन’?

राखीगढ़ी भारतीय पुरातात्विक इतिहास के लिहाज से बेहद अहम स्थल है जो यह दिखाता है कि सिन्धु सभ्यता के दौर में इस शहर को सुनियोजित ढंग से बसाया गया था.

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आनंद कुमार पटेल [Edited by: खुशदीप सहगल/सुरेंद्र]राखीगढ़ी (हिसार), 06 September 2018
राखीगढ़ी से मिले 4,500 वर्ष पुराने कंकाल के DNA में नहीं मिला ‘आर्य जीन’? राखीगढ़ी में खुदाई की एक तस्वीर (फाइल)

भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ा पुरातात्विक महत्व का सबसे बड़ा स्थान है- राखीगढ़ी. यहां से निकाले गए कंकालों के डीएनए अध्ययन का निष्कर्ष शोधकर्ताओं को अभी प्रकाशित करना है, लेकिन सैम्पल में ‘आर्य जीन’ के नहीं मिलने को लेकर बहुत उत्सुकता है.

शोधकर्ताओं में निष्कर्षों को लेकर बहस जारी है. इसी वजह से अध्ययन के प्रकाशन में देरी हो रही है.

इंडिया टुडे वस्तुस्थिति से अवगत होने के लिए बुधवार को ग्राउंड जीरो पर पहुंचा. राखीगढ़ी में प्राचीन सभ्यता के शहर की छाप पूरे गांव में दिखाई दी. ठीक वैसे ही जैसे सिन्धु सभ्यता के अन्य स्थानों- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में दिखाई देती रही होगी.

विकसित सभ्यता के अवशेष

राखीगढ़ी में जमीन खोदे जाने से स्थापित होता है कि 4,500 साल पहले भी विकसित सभ्यता मौजूद थी. वहां से जो पुरावशेष मिले हैं वे वैदिक कृषि सभ्यता से बहुत अलग हैं.

पुणे के डेक्कन कॉलेज ऑफ आर्कियोलॉजी के प्रोफेसर वसंत शिंदे की अगुआई वाली टीम ने 2015 में राखीगढ़ी के मिट्टी के टीलों को खुदवाना शुरू किया. राखीगढ़ी गांव और आसपास 900 एकड़ के क्षेत्र में फैले ऐसे सात टीले हैं. बस्ती से करीब एक किलोमीटर दूर 4,500 वर्ष पुराने कंकाल मिले.

इनके डीएनए सेम्पल का लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलिओबॉटनी के आनुवांशिकी विज्ञानी नीरज राय ने अध्ययन किया. आनुवांशिकी विज्ञानी ने पुष्टि की कि राखीगढ़ी में मिले कंकाल से R1a  जीन (जिसे आर्य जीन भी कहा जाता है) नहीं मिला, लेकिन प्रोफेसर शिंदे ने इस खोज को अधिक महत्व नहीं दिया.

राखीगढ़ी के डीएनए और दक्षिण भारतीय आदिवासी आबादी से करीबी से मैच किया गया तो संकेत मिला कि सिंधु घाटी की सभ्यता के दौरान शुरुआती द्रविड़ भाषा बोली जाती थी.

बीजेपी को झटका

राखीगढ़ी के निष्कर्षों से बीजेपी की उन कोशिशों को झटका लगा है जिनके तहत वो भारत के प्राचीन इतिहास को कथित तौर पर नए सिरे से लिखना चाहती है.

वहीं नफे सिंह जैसे ग्रामीण इन निष्कर्षों को जीवन के अनुभव से कम नहीं मानते. नफे सिंह उन श्रमिकों में शामिल थे जिनके जमीन खोदते वक्त कंकाल मिले. नफे सिंह ने कहा, 'मैंने उन कंकालों को देखा, वो हमारे जैसे नहीं थे. वो बहुत लंबे थे. पुरुष कंकाल का घुटना ही इतना ऊंचा था कि मेरी कमर तक पहुंच जाए. उनकी खोपड़ी हमारे से दुगने आकार की थी. मैंने जीवन में इतने लंबे लोग कभी नहीं देखे.'

स्थानीय ग्रामीण वजीर चंद विवाद को लेकर हैरान नहीं हैं. राखीगढ़ी में पहले जितनी बार भी जमीन खोदने का काम हुआ, वजीर चंद उसके गवाह रहे. वजीर चंद के मुताबिक उन्होंने खोदने से निकले मनकों के साथ ही भट्टियों के अवशेष, ईटों की बाउंड्री वाले पानी की निकासी के सिस्टम और सुनियोजित मार्गों को देखा.

वजीर चंद बचपन से ही पुरावशेष इकट्ठा कर रहे हैं. राखीगढ़ी में बनने जा रहे पुरातत्व संग्रहालय के लिए वजीर चंद पुरावशेषों का अपना बहुमूल्य संग्रह दान कर चुके हैं. वजीर चंद कहते हैं, 'साक्ष्य या सबूत हर किसी के देखने के लिए हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इन टीलों के नीचे विकसित शहर के अवशेष हैं. निष्कर्ष निकालना जानकार लोगों का काम है. मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि ये जगह किसी समय बहुत अहम रही होगी.'

राखीगढ़ी और आसपास 900 एकड़ में फैले 7 टीलों में हर जगह प्राचीन शहरी सभ्यता की छाप देखी जा सकती है. हालांकि जहां-जहां खोदने का काम हुआ था उन जगहों को अब भरा जा चुका है, लेकिन इंडिया टुडे टीम को ऐसे टीले तक पहुंचने में कामयाबी मिली जहां हाल में हुई भारी बारिश ने फिर गड्ढे बना दिए. यहां टीले के आसपास कच्ची और पक्की ईंटें देखी जा सकती हैं.

सुनियोजित ढंग से बसाया गया शहर

पूर्व सरपंच दिनेश सिंह ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, 'हमें बताया गया कि ये विकसित सिन्धु घाटी की सभ्यता के प्रतीक हैं जब मिट्टी से बनी कच्ची ईंटों का इस्तेमाल घरों को बनाने के लिए किया जाता था वहीं पानी की निकासी के रास्ते पर पक्की ईंटें लगाई जाती थी. हमने टीलों को खोदे जाते वक्त देखा, वहां सुनियोजित मार्ग, पानी की निकासी का सिस्टम, सार्वजनिक स्नानगृह... ये सब बताता है कि यहां बहुत सुनियोजित ढंग से बसाया गया शहर था.'

राखीगढ़ी में 1963 से ही समय-समय पर जमीन खोदने का काम होता रहा है. वहां से जो जो भी पुरावशेष निकले उन्हें हिसार में हरियाणा सरकार के क्षेत्रीय संग्रहालय में संजो कर रखा गया है. अतीत की ये सब निशानियां यही संकेत देती हैं कि राखीगढ़ी ना सिर्फ सत्ता का अहम केंद्र था बल्कि अति विकसित सभ्यता की भी पहचान था जहां कारोबार और निर्माण से जुड़ी गतिविधियां खूब होती थीं.

राखीगढ़ी किसी वक्त राजधानी या सत्ता का बड़ा केंद्र रहा हो सकता है. यहां मिली बाघ की छाप दुर्लभ है. क्षेत्रीय संग्रहालय, हिसार के असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट शीश पाल ने इंडिया टुडे को बताया, 'बाघ ताकत से जुड़ा होता है. यहां मिली बाघ की छाप से साफ है कि राखीगढ़ी कभी बड़े महत्व का स्थान रहा होगा. राखीगढ़ी में हड़प्पा सभ्यता के तीन चरण मिले. हड़प्पा पूर्व सभ्यता के लोग मिट्टी की दीवार बनाया करते थे.'

उन्होंने कहा कि सभ्यता थोड़ी विकसित हुई तो मिट्टी की ईंटों का इस्तेमाल होने लगा. अति विकसित दौर में पानी की निकासी के सिस्टम में पक्की ईंटों (आग में ताप कर बनाई गईं) का उपयोग किया जाने लगा. ये आज जैसी ही बहुत प्रगतिशील सभ्यता थी. राखीगढ़ी के लोग सेनिटेशन और स्वच्छता के बारे में जानते थे. उस वक्त इस्तेमाल किए जा चुके पानी की निकासी के लिए अलग से आउटलेट थे.

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