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न्यूनतम मजदूरी बिल संसद में पेश, ट्रेड यूनियनों ने विरोध में कसी कमर

केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट के सांसदों के विरोध के बीच लोकसभा में बिल पेश किया. इस बिल में श्रमिकों के मेहनताने से जुड़े चार मौजूदा कानूनों- पेमेंट्स ऑफ वेजेस एक्ट-1936, मिनिमम वेजेस एक्ट-1949, पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट-1965 और इक्वल रेमुनरेशन एक्ट-1976 को एक कोड में शामिल करने की तैयारी है.

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aajtak.in
आनंद पटेल नई दिल्ली, 23 July 2019
न्यूनतम मजदूरी बिल संसद में पेश, ट्रेड यूनियनों ने विरोध में कसी कमर कोड ऑन वेजेज बिल मंगलवार को लोकसभा में पेश (संसद-फाइल फोटो)

नरेंद्र मोदी सरकार ने 'कोड ऑन वेजेज' बिल मंगलवार को लोकसभा में पेश किया. सरकार की ओर से इस बिल लाने का मकसद सभी राज्यों में तय की गई न्यूनतम मजदूरी दिए जाना सुनिश्चित करना है. यानी साफ है कि तय न्यूनतम मजदूरी और उससे अधिक पर ही किसी राज्य में काम कराया जा सकेगा.

ये बिल एनडीए की ओर से श्रम सुधारों (लेबर रिफॉर्म्स) के एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में उठाया कदम है. केंद्र को अभी ट्रेड यूनियनों के साथ, न्यूनतम मजदूरी क्या होनी चाहिए, इस मुद्दे पर सहमति बनाना बाकी है. सीपीएम समर्थित ट्रेड यूनियन सीटू (CITU) ने श्रमिकों से देश भर में बिल के खिलाफ प्रदर्शन करने का आह्वान किया है.

कोड ऑन वेजेज में न्यूनतम मजदूरी

केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट के सांसदों के विरोध के बीच लोकसभा में बिल पेश किया. इस बिल में श्रमिकों के मेहनताने से जुड़े चार मौजूदा कानूनों- पेमेंट्स ऑफ वेजेस एक्ट-1936, मिनिमम वेजेस एक्ट-1949, पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट-1965 और इक्वल रेमुनरेशन एक्ट-1976 को एक कोड में शामिल करने की तैयारी है. कोड ऑन वेजेज में न्यूनतम मजदूरी को सर्वत्र एकसमान लागू करने का प्रावधान है. इससे हर श्रमिक के लिए 'जीविका का अधिकार' सुनिश्चित किया जा सकेगा.

साथ ही इसका मकसद न्यूनतम मजदूरी के विधायी संरक्षण को मौजूदा 40% से बढ़ाकर 100%  वर्कफोर्स तक ले जाना है. श्रम मंत्री गंगवार ने कहा कि वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के जरिए सरकार करीब 50 करोड़ श्रमिकों के जीने के स्तर को बेहतर बनाना चाहती है. श्रम मंत्रालय का दावा है कि नए बिल से न्यूनतम मजदूरी की दरों की संख्या में कमी आएगी. फिलहाल देश भर में 2000 से अधिक न्यूनतम मजदूरी की दरें लागू हैं.

बिल पर सांसदों का विरोध

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और लेफ्ट के सांसदों ने बिल का विरोध किया. टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा, 'मेरी समझ से परे है कि इस बिल को कोल्ड स्टोरेज से निकालने की क्या जरूरत थी. ट्रेड यूनियनों की ओर से किसने इसकी मांग की थी. ये सिर्फ नियोक्ताओं के लिए लाया जा रहा है.'  

रॉय ने कहा, 'FICCI, CII' केला विधेयक इसलिए चाहते हैं कि उनके लिए आसान हो जाएगा. जिससे श्रमिकों को दिक्कत में रखा जा सकेगा, उनके प्रतिनिधियों की आवाज नहीं सुनी जाएगी, सारे वेजेस को कवर करते हुए अकेले 'कोड ऑन वेजेज' को आगे बढ़ाया जाएगा.'  

सीटू महासचिव तपन सेन ने कहा, 'कोड ऑन वेजेज बिल' में न्यूनतम मजदूरी का ठोस फॉर्मूला (2700 कैलोरीज प्रतिदिन इनटेक पर आधारित) शामिल नहीं है. इस फॉर्मूले को 15वीं भारतीय श्रम कॉन्फ्रेंस में सर्वसम्मति से अपनाया गया था. सेन ने आरोप लगाया कि नए बिल ने व्यावहारिक तौर पर न्यूनतम मजदूरी तय करने का फैसला पूरी तर सरकार और नौकरशाही पर छोड़ दिया है. यद्यपि त्रिपक्षीय न्यूनतम मजदूरी सलाहकार बोर्ड का प्रावधान बिल में रखा गया है लेकिन इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि बोर्ड की सिफारिशें सरकार पर बाध्य नहीं होंगी.'  

'कोड ऑन वेजेज' बिल को लोकसभा में पहली बार 10 अगस्त 2017 को पेश किया गया था. फिर इसे संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया. समिति ने अपनी रिपोर्ट 18 अगस्त 2018 को सौंपी. लेकिन 16वीं लोकसभा भंग होने की वजह से बिल कालातीत हो गया. इसलिए 'कोड ऑन वेजेज, 2019' के नाम से नए  बिल का ड्राफ्ट तैयार किया गया. इसमें संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों और अन्य स्टेकहोल्डर्स के सुझावों को शामिल किया गया.  

 

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