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समलैंगिकता के मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच करेगी फैसला

मंगलवार को इस क्यूरिटिव पिटीशन की ओपन सुनवाई हुई. आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि किसी क्यूरिटिव पिटिशन की सुनवाई ओपन हो. सुनवाई के दौरान कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और चर्च ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे.

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aajtak.in
रोहित गुप्ता नई दिल्ली, 02 February 2016
समलैंगिकता के मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच करेगी फैसला सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन पर सुनवाई

समलैंगिक संबंधों को सही ठहराने वालों के लिए अच्छी खबर है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को समलैंगिक रिश्तों को अपराध के दायरे में रखने वाली आईपीसी की धारा 377 सुनवाई करते हुए इस मामले को पांच जजों की बेंच को सौंप दिया है. अब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी.

ओपन कोर्ट में हुई सुनवाई
मंगलवार को इस क्यूरिटिव पिटीशन की ओपन सुनवाई हुई. आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि किसी क्यूरिटिव पिटिशन की सुनवाई ओपन हो. सुनवाई के दौरान कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और चर्च ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे. केन्द्र सरकार का क्या रुख रहेगा इस पर कोर्ट में कुछ नहीं बोला गया जबकि कोर्ट में केन्द्र सरकार के वकील मौजूद थे. इससे पहले केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख‍िलाफ जो रिव्यू दायर की थी, वो खारिज हो चुकी है.

सिब्बल बोले- ये इस पीढ़ी के लिए धब्बा है
एक याचिकाकर्ता की तरफ से कोर्ट में पेश कपि‍ल सिब्बल ने कहा कि ये बिल्कुल निजता का मामला है और संवैधानिक मुद्दा है. सिब्बल ने कहा, 'ये मौजूदा और भविष्य की पीढ़ी पर बाध्यकारी है 377 के दायरे में सहमति से शारीरिक संबंध बनाने को आपराधिक दायरे में लाना इस पीढ़ी के लिए एक धब्बा है.

मुस्लिम लॉ बोर्ड विरोध में
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये एक गंभीर मामला है जिसमें संवैधानिक मुद्दा जुड़ा हुआ है. हम नोटिस नहीं जारी कर रहे है लेकिन मामले को 5 जजों की संवैधानिक पीठ के पास भेज रहे हैं. मुख्य न्यायधीश संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और चर्चेज ऑफ इंडिया ने याचिकाओं का खुल कर विरोध किया है. लेकिन फि‍लहाल केंद्र सरकार ने कोई क्यूरेटिव दाख‍िल नहीं की है.

क्यूरेटिव पिटीशन पर सुनवाई
चीफ जस्टिस टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ सुप्रीम कोर्ट के 11 दिसंबर, 2013 के फैसले के खिलाफ समलैंगिक अधिकारों के लिए प्रयत्नशील कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की क्यूरेटिव पिटीशन पर सुनवाई के लिए सहमत हुई थी. कोर्ट ने इस फैसले में अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की वैधता बरकरार रखी थी. न्यायालय ने इसके बाद जनवरी, 2014 में इस निर्णय पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाए भी खारिज कर दी थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा था HC का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक वयस्कों की सहमति से निजी तौर पर संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में नहीं रखने का फैसला किया था. लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बाद में पलट दिया था. दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकों के बीच संबंध स्थापित करने को यह कहते हुए गैर आपराधिक घोषित किया था कि यह असंवैधानिक है.

मामले में क्या हुआ था
इस मामले में 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने का फैसला दिया था. लेकिन फैसले को केंद्र सरकार ने चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2013 में हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए समलैंगिकता को IPC की धारा 377 के तहत अपराध बरकरार रखा. दो जजों की बेंच ने इस फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी.

चार जजों ने दी थी इजाजत
23 अप्रैल 2014 को चार जजों तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सथाशिवम, जस्टिस आरएम लोढा, जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने क्यूरेटिव पिटीशन पर खुली अदालत में सुनवाई करने का फैसला दिया था. लेकिन यह चारों जज भी रिटायर हो चुके हैं.

आठ याचिकाओं पर सुनवाई
मामले में नाज फाउंडेशन, श्याम बेनेगल और समलैंगिकों के संगठन की आठ याचिकाएं दाखिल हैं. वैसे 2013 में ही सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रांसजेंडर को तीसरी केटेगरी में शामिल कर उन्हें ओबीसी केटेगरी में आरक्षण और दूसरी सुविधाएं देने के आदेश दिए थे. हालांकि बेंच ने समलैंगिकता के आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं की थी.

'हजारों लोगों ने जाहिर कर दी है पहचान'
समलैंगिक अधिकारों के समर्थक कार्यकर्ताओं ने कहा था कि हाई कोर्ट के निर्णय के बाद पिछले चार चाल के दौरान इस समुदाय के हजारों लोगों ने अपनी यौन पहचान सार्वजनिक कर दी थी. इस वर्ग का तर्क है कि समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने से इस समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन होता है.

याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में दलील दी है कि शीर्ष अदालत का 11 दिसंबर, 2013 का फैसला त्रुटिपूर्ण है क्योंकि यह पुराने कानून पर आधारित है. याचिका में कहा गया कि मामले पर सुनवाई 27 मार्च, 2012 को पूरी हुई थी और निर्णय करीब 21 महीने बाद सुनाया गया और इस दौरान कानून में संशोधन सहित अनेक बदलाव हो चुके थे, जिन पर फैसला सुनाने वाली पीठ ने विचार नहीं किया.

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