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मक्का मस्जिद ब्लास्ट: फैसला आते ही बैकफुट पर आ गई कांग्रेस

मक्का मस्जिद ब्लास्ट: फैसला आते ही बैकफुट पर आ गई कांग्रेस
कुमार विक्रांत सिंह [Edited by: खुशदीप सहगल]नई दिल्ली, 16 April 2018

मक्का-मस्जिद ब्लास्ट में फैसला आते ही रणनीति के तहत कांग्रेस बैकफुट पर नजर आई. जैसे ही इस मामले का फैसला आया, तब संगठन महासचिव अशोक गहलोत पार्टी के महासचिवों और प्रभारियों के साथ 29 अप्रैल की रैली की तैयारियों के लिए बैठक कर रहे थे. बैठक के बाद पार्टी की रैली की डिटेल देने मीडिया के सामने आए गहलोत से मक्का-मस्जिद ब्लास्ट का सवाल पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सरकार को फैसला करना है कि वह इस मामले पर आगे अपील करेगी या नहीं. यह अदालत का मामला है इसलिए हमको इस पर कमेंट नहीं करना.

आजाद ने छुड़ाया पीछा

इसके बाद कठुआ मसले पर गुलाम नबी आजाद बयान देना चाहते थे, सो मीडिया से मुखातिब हुए. लेकिन मीडिया ने सीधे मक्का मस्जिद का सवाल दाग दिया. आजादद जवाब में सिर्फ इतना ही बोले कि ऊपरी अदालत में जाने का विकल्प खुला है. डिटेल में बार-बार सवाल पूछने पर आज़ाद यही बोलकर पीछा छुड़ाते रहे कि ये सवाल हो चुका.

सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात रही कि ऐसे मुद्दों पर बयानबाजी करने वाले पार्टी महासचिव भी कांग्रेस मुख्यालय में थे. लेकिन उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया. इसके अलावा यूपीए राज में गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे और पी चिदंबरम ने भी खामोश रहना ही वाजिब समझा.

बचाव करने को मजबूर हुए पाटिल

बमुश्किल उस वक़्त गृह मंत्री रहे शिवराज पाटिल ही मीडिया से मुखातिब हुए, जो अर्से से सक्रिय राजनीति से दूर हैं. माना गया कि, वो खुद के वक़्त के फैसले का बचाव करने को मजबूर हो गए.

फैसले के बाद आधिकारिक तौर पर पार्टी ने शाम सवा चार बजे तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए पीएल पूनिया ने इस सवाल के जवाब से बचते हुए कहा कि अभी हम कोर्ट का पूरा ऑर्डर पढ़ेंगे, फिर विस्तार से बात करेंगे.

शायद यही बता रहा था कि कांग्रेस अब प्रो मुस्लिम होने के आरोप से पल्ला झाड़ने की कोशिश में है. राहुल के हालिया कदम और अब कांग्रेस का ताजा रुख तो इसी दिशा में इशारा कर रहा है. वर्ना पार्टी के सूत्र कहते हैं कि सरकार के दबाव में जांच एजेंसियों ने गवाहों पर दबाव बनाया, जिससे गवाह मुकर गए और आरोपी बरी हो गए. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस नेता इस बात को खुलकर बोलने से परहेज ही करते रहे.

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