एडवांस्ड सर्च

क्या श्रम कानूनों को लेकर तालमेल ​बिठा पाएगी सरकार?

अपनी विचारधाराओं से अलग ट्रेड यूनियन श्रम कानूनों में कई ऐसे सुधारों का विरोध कर रहे हैं जिन्हें उद्योग जगत प्रगतिशील मान रहा है, लेकिन सवाल है कि क्या सरकार इस बार किसी नतीजे पर पहुंच पाएगी?

Advertisement
प्रसन्ना मोहंतीनई दिल्ली, 12 July 2019
क्या श्रम कानूनों को लेकर तालमेल ​बिठा पाएगी सरकार? नीति आयोग (फाइल फोटो)

नीति आयोग के पूर्व चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने भारत के श्रम कानूनों की जटिलता को इन शब्दों में दर्ज किया था: 'श्रम कानूनों की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से बहुत जटिल है: अगर एक फर्म में छह कामगार हैं और आप बढ़ाकर सात करते हैं तो ट्रेड यूनियन एक्ट लागू हो जाएगा. अगर आप नौ से 10 करते हैं तो फैक्ट्रीज एक्ट लागू हो जाएगा. अगर आप कामगारों की संख्या 19 से 20 करते हैं तो कोई और कानून लागू हो जाएगा. यह दोबारा होगा जब आप 49 से 50 करेंगे और 99 से 100 करेंगे. सबसे घातक है इडस्ट्रियल डिसप्यूट एक्ट, जो कहता है कि अगर आप 100 या उससे अधिक कामगारों वाली फर्म हैं तो आप उनमें से किसी को किसी भी परिस्थिति में सरकार की पूर्व अनुमति के बिना निकाल नहीं सकते. यह तब भी लागू होता है जब आप दिवालिया होने वाले हों, ऐसी परिस्थिति में भी आपको इन कामगारों को पेमेंट देना होगा. इसका परिणाम यह हो रहा है कि निवेशक ऐसे उद्योग में नहीं उतरते जहां से वे बाहर न निकल सकें. इसलिए मेरे ख्याल से, भारत में बहुत घातक श्रम कानून हैं जिसकी वहज से भारत की फर्में बहुत छोटी और सामान्य हैं.'

श्रम संविधान की समवर्ती सूची में है. इसमें 40 से ज्यादा केंद्रीय कानून हैं और 100 से ज्यादा राज्यों के कानून हैं जो श्रम मामलों को नियंत्रित करते हैं. केंद्र सरकार इन सभी कानूनों को मिलाकर इन्हें चार संहिताओं में समेटना चाहती है- मेहनताना संबंधी, उद्योग मामले, सामाजिक सुरक्षा और पेशेवर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की परिस्थितियां. इस सुधार के साथ सरकार बिजनेस को आसान करना चाहती है.

विवादास्पद सुधार प्रस्ताव

पिछली लोकसभा के दौरान सरकार मुश्किल में फंस गई जब ट्रेड यूनियनों की ओर से तमाम श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेटने का तीखा विरोध हुआ. प्रमुख विवादित सुधार निम्नलिखित थे:

ट्रेड यूनियनों की सदस्यता और संरचना: इं​डस्ट्रियल रिलेशन कोड आफ 2017 कहता है कि किसी प्रतिष्ठान या उद्योग में ट्रेड यूनियन पंजीकृत कराने के लिए इसमें काम करने वाले कम से कम 10% वर्कर्स या काम कर रहे 100 वर्कर्स की आवश्यकता होगी. यह मौजूदा वक्त में 7% है. यह संबंधित प्रतिष्ठान या उद्योग से बाहर के कामगार के सदस्य होने का निषेध करता है. दो यूनियनों का सदस्य होने से रोकता है. साथ ही यह भी प्रावधान करता है​ कि संबंधित प्रतिष्ठान से बाहर का कोई भी व्यक्ति जो किसी लाभ के पद पर है (प्रतिष्ठान से बाहर), वह न तो यूनियन का सदस्य बन सकता है ​न ही यूनियन में आधिकारिक पद ले सकता है.

ट्रेड यूनियनों ने इसका विरोध किया. आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (BMS) और वामदलों के श्रम संगठन सेंटर आफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU) का कहना है कि ऐसा परिवर्तन नहीं होना चाहिए. BMS के अध्यक्ष सीके साजीनारायण कहते हैं कि यह ट्रेड यूनियनों का निर्णय होना चाहिए कि वे किसे सदस्य और किसे नेता चुनते हैं. “यह तय करना सरकार का काम नहीं है”. CITU के महासचिव तपन सेन के विचार भी इससे मिलते जुलते हैं कि प्राइवेट सेक्टर में यूनियन बनाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में सदस्य मिलने मुश्किल होते हैं. अगर कंपनी प्रतिशोध की कार्रवाई करती है तो यूनियन की गैर मौजूदगी में उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होता. वे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की एक आटोमोबाइल कंपनी का उदाहरण देते हैं जहां पर यूनियन का गठन करने के लिए संसद के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी.

हालांकि, इस पर उद्योग जगत का नजरिया अलग है. सीआईआई की नेशनल कमेटी ऑन इंडस्ट्रियल रिलेशन के चेयरमैन एमएस उन्नीकृष्णन का कहते हैं, इंडस्ट्री तो चाहेगी कि आगे इस सीमा को बढ़ा दिया जाए, एक प्रतिष्ठान में सिर्फ एक यूनियन हो और इन इकाइयों का छुपा हुआ राजनीतिक जुड़ाव खत्म कर दिया जाए.

भर्ती और छंटनी: इं​डस्ट्रियल रिलेशन कोड आफ 2017 में प्रावधान किया गया कि 300 तक कर्मचारियों की छंटनी के लिए सरकार की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है. फिलहाल यह संख्या 100 है. यह इस कोड का सबसे विवादित प्रावधान था.

ट्रेड यूनियन ऐसे सुधारों और परिवर्तनों का कड़ा विरोध कर रहे हैं. BMS का कहना है कि जिस कंपनी को पहले 100 कामगारों की जरूरत थी, मैकेनिज्म के ​चलते अब वह 20 से 30 लोगों में काम चलाएगी. इसलिए इस सीमा को नीचे लाना चाहिए. CITU का नजरिया है कि भर्ती और छंटनी के नियमों को और उदार बना दिया जाएगा तो कामगारों के लिए खतरा बढ़ जाएगा. जायज मांग रखने पर भी उन्हें निकाल फेंका जाएगा.

लेकिन उद्योग जगत इससे अलग सोच रहा है. उन्नीकृष्णन का कहना है ​​कि इंडस्ट्री को अव्यवहारिक इकाइयों को चलाने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए और यह भर्ती और छंटनी का नियम नहीं है बल्कि यह तो बिजनेस पॉलिसी है. उनके मुताबिक, हम तो चाहते हैं कि छंटनी की सीमा जिसे 100 से 300 किया जा रहा है इसे और बढ़ा दिया जाए.

हड़ताल पर प्रतिबंध: इं​डस्ट्रियल रिलेशन कोड आफ 2017 हड़ताल पर भी प्रतिबंध लगाता है. इसके मुताबिक, हड़ताल से 14 दिन पहले नोटिस के जरिये पूर्वसूचना देनी होगी और नोटिस के दो महीने के अंदर हड़ताल करनी होगी. अभी सिर्फ जरूरी सुविधाओं के मामले नोटिस की जरूरत होती है. इसमें यह भी प्रावधान है कि नोटिस के बाद अगर समझौते की प्रक्रिया चल रही है तो इस दौरान नोटिस के दिन से हड़ताल प्रतिबंधित होगी. यह कानून यह भी प्रावधान करता है कि उक्त नियम का उल्लंघन करने पर 50,000 जुर्माना और एक महीने जेल की सजा होगी.

ट्रेड यूनियनों का मानना है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से हड़ताल और विरोध पर प्रतिबंध लगाने जैसा है. साजीनारायण कहते हैं​ कि 'यह पूरी तरह से कामगारों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है.' इंडस्ट्री इसके उलट सोच रखती है. प्रमुख मानव संसाधन कंपनी टीमलीज सर्विसेज के रितुपर्ण चक्रबर्ती कहते हैं कि हड़ताल से किसी की मदद नहीं हो सकती. इसकी जगह ऐसा वातावरण बनाना चाहिए कि जहां पर मसले हल हो सकें और आपसी अविश्वास को खत्म किया जा सके. उन्नीकृष्णन भी इसी विचार का समर्थन करते हुए मैनेजमेंट से भिड़ने की जगह नजरिये में परिवर्तन की जरूरत बताते हैं.

सामाजिक सुरक्षा की अनदेखी: इस कानून का दूसरा विवादित प्रावधान है कि यह सामाजिक सुरक्षा के मसले को दरकिनार करते हुए सामाजिक सुरक्षा और कल्याण के तमाम मसलों को सुलझाने के लिए एकल व्यवस्था करता है. सभी तरह के कामगारों जैसे पार्ट टाइम, कैजुअल, निश्चित अवधि के वर्कर, घरेलू कामगारों आदि सबके लिए पेंशन, प्रॉविडेंट फंड, मेडिकल सुविधाएं आदि के लिए एक ही प्राधिकरण होगा. इसमें 15 केंद्रीय कानूनो को मिला दिया गया है.

ट्रेन यूनियन सभी तरह के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देने का तो स्वागत करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए अलग प्राधिकरण होना चाहिए. संगठित और असंगठित क्षेत्रों के कामगारों के संस्थान और फंड्स को एकसाथ मिला देने पर कुछ का नुकसान होगा. हालांकि, उद्योग जगत का मानना है कि सभी तरह के कामगारों को एक ही श्रेणी में रख देने से कानूनी जटिलताएं खत्म हो जाएंगी.

फैक्ट्री की पुन: परिभाषा: सरकार ने फैक्ट्रीज एक्ट 1948 में कई संशोधनों का प्रस्ताव पेश किया है. ऐसा कामगारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए किया जा रहा है. फैक्ट्री की परिभाषा में शर्त रखी गई है कि अगर बिजली का उपयोग होता है तो न्यूनतम 10 से 20 वर्कर और यदि बिजली का उपयोग नहीं होता है तो न्यूनतम 20 से 40 वर्कर होंगे, तभी उसे फैक्ट्री माना जाएगा. यूनियनों का कहना है कि इस तरह से बड़ी संख्या में कामगार संगठित क्षेत्र से बाहर हो जाएंगे. श्रम कानून सभी तरह के कामगारों पर लागू होना चाहिए, भले ही किसी फैक्ट्री में मात्र एक कामगार हो.

अब यह देखना है कि सरकार इंडस्ट्री और ट्रेड यूनियनों की आकांक्षाओं के ​बीच तालमेल कैसे बैठा पाती है?

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay