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जन्मदिन विशेष: अशोक वाजपेयी, जिनकी कविता में मानवता और प्रेम सर्वोपरि

अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी, 1941 को दुर्ग में हुआ था. वह आईएएस अफसर थे और राज्य तथा भारत सरकार में काफी बड़े पदों पर रहे, पर उन्होंने अपनी पहचान एक कवि और लेखक के रूप में ही बनाई.

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
जन्मदिन विशेष: अशोक वाजपेयी, जिनकी कविता में मानवता और प्रेम सर्वोपरि अशोक वाजपेयी (फोटो- साहित्य आजतक)

उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनाई
बुहार कर अलग कर दिया तारों को
सूर्य-चंद्रमा को रख दिया एक तरफ
वनलताओं को हटाया
उसने पृथ्वी को झाड़ा-पोंछा
और आकाश की तहें ठीक कीं
उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनाई

यह अशोक वाजपेयी की 'प्रेम के लिए जगह' शीर्षक वाली कविता है. ऐसा अशोक वाजपेयी ही लिख सकते हैं. वह विंब और प्रतीकों के कवि हैं. मानवता और प्रेम उनके लिए सर्वोपरि है. विदेशी भाषाओं से उन्होंने इतना पढ़ा-लिखा कि विचारों में भी विश्व-बंधुता झलकती है. पर उनकी इस उदार सोच में भी कट्टरपंथ के लिए कहीं कोई जगह नहीं है. अभी बीते साल जब वह 'साहित्य आजतक' के कार्यक्रम में आए थे तो उन्होंने कई बातें स्वीकारी थीं. उनमें से एक कविता को लेकर ही थी. उन्होंने कहा था, "कविता कहीं से पैदा नहीं होती है. कविता बनानी होती है. इसे लिखने का एक कौशल होता है और यह सीखना होता है. इसे आप दूसरों की कविताओं से सीखते हैं."

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उन्होंने जो सीखा उसकी बानगी 'सिर्फ़ शब्दों से नहीं' कविता में देखें-

सिर्फ शब्दों से नहीं,
बिना छुए उसे छूकर,
बिना चूमे उसे चूमकर
बिना घेरे उसे बाँहों में घेरकर,
दूर से उसे पँखुरी-पँखुरी खोलते हुए
बिना देखे उसे दृश्य करते हुए
मैंने उससे कहा.

अभिव्यक्ति की यह श्रेष्ठता बिना भाव की उच्च स्थिति के संभव है क्या? अचरज होता है, अशोक वाजपेयी जैसा एक कवि, जो सृजन, सम्मान और शोहरत के शिखर पर है, वह उम्र के इस पड़ाव पर भी सीखने की बात करता है. सीखने की उनकी यह लालसा इतनी उद्दाम है कि 'मुझे चाहिए' शीर्षक वाली कविता में झलक सी जाती है-

मुझे चाहिए पूरी पृथ्वी
अपनी वनस्पतियों, समुद्रों
और लोगों से घिरी हुई,
एक छोटा-सा घर काफ़ी नहीं है.

इसी कविता की आखिरी पंक्तियां हैं-

थोड़े से शब्दों से नहीं बना सकता
मैं कविता,
मुझे चाहिए समूची भाषा-
सारी हरीतिमा पृथ्वी की
सारी नीलिमा आकाश की
सारी लालिमा सूर्योदय की.

तो अशोक वाजपेयी को कविता के लिए इतना बड़ा कैनवास चाहिए. उन्होंने अपने लेखन को लेकर एक बार लिखा था, "जब कविता लिखना शुरू किया था तो सिवाय इसके कि उसके बहाने शब्दों से कुछ खिलवाड़ हो रही थी, कोई उम्मीद नहीं की थी. जब कविता को समझने-समझाने की कोशिश शुरू हुई जो कि काफी बाद में हुई, तो यह लगने लगा था कि कविता खिलवाड़ से ज्यादा है. उसमें ऐसा कुछ होता है जो भाषा के किसी और संयोजन में नहीं होता. उसमें कुछ ऐसा मानवीय संपुंजन भी हो पाता है जो भाषा में अन्यथा नहीं हो पाता." उनकी 'रचना' नामक कविता के शब्द संयोजन को देखिए -

कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
- हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले.

इसी तरह उनकी 'वह नहीं कहती' कविता के बिंब देखिए -

उसने कहा
उसके पास एक छोटा सा हृदय है
जैसे धूप कहे
उसके पास थोड़ी सी रौशनी है
आग कहे
उसके पास थोड़ी सी गरमाहट-
धूप नहीं कहती उसके पास अंतरिक्ष है
आग नहीं कहती उसके पास लपटें
वह नहीं कहती उसके पास देह.

वाजपेयी ने कविता को लेकर आगे लिखा था, "कविता गाती है पर इसलिए नहीं कि कभी-कभार वह छंद में होती है. कविता याद करती है पर इसलिए नहीं कि उसमें बिंबमाला होती है. कविता सुख देती है पर इसलिए नहीं कि रस उसका धर्म है. कविता प्रश्न पूछती है पर इसलिए नहीं कि कवि को किसी रामझरोखे पर बैठकर ऐसा करने का नैतिक अधिकार मिला हुआ है. कविता जीवन के प्रति हमारे रहस्यभाव को गहरा करती है पर इसलिए नहीं कि उसे कहीं से ब्रह्मज्ञान मिल जाता है. कविता समाज में हमारी हिस्सेदारी को बढ़ाती है पर इसलिए नहीं कि वह हर हालत में समाज से प्रतिबद्ध होती है."

अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी, 1941 को दुर्ग में हुआ था. वह आईएएस अफसर थे और राज्य तथा भारत सरकार में काफी बड़े पदों पर रहे, पर उन्होंने अपनी पहचान एक कवि और लेखक के रूप में ही बनाई. एक कला प्रेमी अधिकारी के रूप में भोपाल में भारत भवन की स्थापना में उनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका थी. वह ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रहे और अभी रजा फाउंडेशन से जुड़े हैं.

उन्होंने खूब लिखा और कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मान उन्हें नवाजे गए. उनकी प्रमुख कृतियों में कविता संग्रह 'शहर अब भी संभावना है', 'एक पतंग अनंत में', 'अगर इतने से', 'जो नहीं हैं', 'तत्पुरुष', 'कहीं नहीं वहीं', 'घास में दुबका आकाश', 'तिनका तिनका', 'दु:ख चिट्ठीरसा है', 'विवक्षा', 'कुछ रफू कुछ थिगड़े', 'इबारत से गिरी मात्राएँ', 'उम्मीद का दूसरा नाम', 'समय के पास समय', 'अभी कुछ और', 'पुरखों की परछी में धूप', 'उजाला एक मंदिर बनाता है' शामिल है.

उनकी आलोचना की किताबों में 'फिलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'समय से बाहर', 'कविता का गल्प', 'सीढ़ियां शुरू हो गई हैं', 'पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज', 'कभी कभार' और 'बहुरि अकेला' शामिल है. उन्होंने 'बहुबचन', 'समास', 'पूर्वग्रह' और 'कविता एशिया' जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया.

इसके अलावा 'तीसरा साक्ष्य', 'कुमार गंधर्व', 'प्रतिनिधि कविताएं- मुक्तिबोध’, 'पुनर्वसु, निर्मल वर्मा, टूटी हुई बिखरी हुई- शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं का एक चयन, कविता का जनपद, जैनेंद्र की आवाज, परंपरा की आधुनिकता, शब्द और सत्य, सन्नाटे का छंद- अज्ञेय की कविताएं, पंत सहचर, मेरे युवजन मेरे परिजन, संशय के साए- कृष्ण बलदेव वैद संचयन का संपादन शामिल है.

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अशोक वाजपेयी के उल्लेखनीय अनुवाद कार्यों में पोलिश कवि तादेऊष रूजेविच की कविताओं का अनुवाद 'जीवन के बीचोंबीच', ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त की कविताओं का अनुवाद 'अंत:करण का आयतन' तथा चेस्वाव मिवोश की कविताओं का अनुवाद 'खुला घर' के नाम से प्रकाशित हुआ.

अपने लेखन कर्म के लिए वह दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, कबीर सम्मान, फ्रांस सरकार के आफ़िसर ऑव द आर्डर आव आर्ट्स एंड लेटर्स, पोलिश सरकार के आफ़िसर ऑफ द ऑर्डर ऑव क्रॉस तथा भारत भारती सम्मान से नवाजे जा चुके हैं.

इसके बाद इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी. वे कई साल तक एक प्रोफेसर के तौर पर सेवाएं देते रहे. उनकी छायावाद, नामवर सिंह और समीक्षा, आलोचना और विचारधारा जैसी किताबें चर्चित हैं.

'साहित्य आजतक' की ओर से समकालीन कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर अशोक वाजपेयी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं और उनके प्रशंसक पाठकों के लिए उनकी यह कविताः

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी-

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता-
वही थोड़ा-सा आदमी-

जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,
जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,
जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,
वही थोड़ा-सा आदमी-

जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बचाता है,
जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता
वही थोड़ा-सा आदमी-

जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण

वही थोड़ा-सा आदमी-
अगर बच सका तो
वही बचेगा.

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