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GDP बेस ईयर में बदलाव: मोदी सरकार की मंशा पर क्यों उठ रहे सवाल?

भारतीय सांख्यिकीय व्यवस्था की विश्वसनीयता दांव पर है. जनवरी 2015 में जब 2011-12 सीरीज की घोषणा की गई, उसके बाद से इस पर तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं और जीडीपी आंकड़ों में बदलावों की वजह से जनता का भरोसा इसमें कम हुआ है.

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प्रसन्ना मोहंती नई दिल्ली, 13 November 2019
GDP बेस ईयर में बदलाव: मोदी सरकार की मंशा पर क्यों उठ रहे सवाल? जीडीपी के बेस ईयर में बदलाव की तैयारी

  • सरकार जीडीपी के बेस ईयर में बदलाव की तैयारी कर रही है
  • इसके पीछे सरकार की मंशा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं
  • वैसे बेस ईयर में बदलाव एक सामान्य और जरूरी प्रक्रिया है
  • लेकिन सरकार के जीडीपी आंकड़ों को ही संदेह से देखा जाता रहा है

गत 5 नवंबर को यह घोषणा की गई कि नेशनल एकाउंट्स (जीडीपी) के लिए बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2017-18 की जाएगी, तबसे इसको लेकर जबरदस्त अटकलें शुरू हो गई कि आखि‍र इसके पीछे सरकार की क्या मंशा है और इसके क्या परिणाम होंगे.  

इसकी एक वजह यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था पिछले पांच तिमाहियों से सुस्ती के दौर में है. जीडीपी ग्रोथ वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही में 8.1 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में 5 फीसदी तक आ गई है और आगे इसमें और गिरावट होने की आशंका है. दूसरे, पिछले पांच साल में डेटा की गुणवत्ता को लेकर काफी छानबीन की जा रही है, क्योंकि भारत और विदेश के अर्थशास्त्री और एक्सपर्ट इनमें राजनीतिक दखल को लेकर गंभीर चिंता जताते रहे हैं और यह चाहते हैं कि सांख्यिकीय संस्थाओं की आजादी और ईमानदारी को बहाल किया जाए.

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इसके बावजूद जीडीपी अनुमान के बेस ईयर में बदलाव के कई मजबूत कारण हैं.

बेस ईयर में संशोधन से अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक बदलाव को आंका जाता है

बेहतर नीति निर्माण के लिए बेस ईयर में संशोधन अनिवार्य है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव पर नजर रखी जा सके और उन वृहद आर्थिक संकेतकों में सुधार या अपडेट किया जा सके जो कि देश के आर्थिक प्रदर्शन को दर्शाते हैं. भारत के पूर्व मुख्य सांख्य‍िकीविद टीसीए अनंत ने सबसे पहले जनवरी 2018 में इसकी बात की थी.

इसमें किस तरह का बदलाव हो सकता है इसके बारे में विस्तार से कार्यक्रम क्रियान्वयन एवं सांख्यिकीय मंत्रालय (MoSPI) ने 8 मई, 2019 को एक नोट जारी कर बताया है.

इस नोट में कहा गया है कि 2011-12 सीरीज को अपनाने के मामले में भारत अब संयुक्त राष्ट्र द्वारा वि‍कसित 2008 सिस्टम ऑफ नेशनल एकाउंट्स (2008 SNA) जैसे नवीनतम अंतरराष्ट्रीय मानक को अपनाने की तरफ बढ़ रहा है, जो कि 1993 के एसएनए का अपडेट है. 2011-12 के सीरीज में डेटा स्रोतों के बदलावों को शामिल किया गया, कवरेज का विस्तार किया गया और नए मानक के मुताबिक प्रक्रियाओं में सुधार किया गया, लेकिन इसमें और सुधार की जरूरत है, खासकर एमसीए 21 डेटाबेस की खामियों को दूर करने के लिए, जिसके द्वारा कॉरपोरेट सेक्टर के उत्पादन को आंका जाता है, और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में बदलाव के लिए.

इस नोट में यह भी कहा गया है कि भारत ने अब आईएमएफ के विशेष डेटा प्रसार मानक (SDDS) को भी अपनाया है. इसमें यह कहा गया है कि नए कीमत सूचकांक का विकास कर जीडीपी अनुमानों में ‘दोहरे अपस्फीतिकारक (डबल डीफ्लेटर)’ को अपनाया जाए. भारत फिलहाल सिंगल डिफ्लेटर (जैसे CPI, WPI या अन्य) का इस्तेमाल करता है, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, मेक्सिको और ब्राजील ने अब डबल डिफ्लेटर को अपना लिया है, जिसमें आउटपुट और इनपुट के लिए अलग-अलग डिफ्लेटर का इस्तेमाल किया जाता है.

बेस में बदलाव की अवध‍ि 10 से 5 साल की गई

बेस ईयर में बदलाव के लिए कोई तय मानक नहीं है. साल 2007-10 के दौरान भारत के पहले मुख्य सांख्यिकीविद (CSI) और 2013-16 में नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन (NSC) के चेयरमैन रहे प्रणब सेन का कहना है कि 2008 एसएनए में यह सिफारिश की गई है कि विकासशील देश को हर 5 साल पर अपने बेस ईयर में बदलाव करना चाहिए ता‍कि अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव का सही आकलन किया जा सके. उन्होंने कहा, ‘बदलाव कितनी जल्दी होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि अर्थव्यवस्था में किस तेजी से संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं. यदि कोई अर्थव्यवस्था स्थिर है तो लंबे समय तक बेस ईयर में बदलाव की जरूरत नहीं है. इसके बारे में फिर सोच-समझ कर निर्णय लेना होगा.’

भारत ने जब साल 1948-49 में नेशनल एकाउंट्स सीरीज की शुरुआत की तो संशोधन हर 10 साल में होते थे, जो संयोग से जनगणना के समय ही होता था, क्योंकि जनगणना से कामगारों का सही आंकड़ा मिल जाता था. यह चलन 1980-81 तक जारी रहा.

इसके बाद साल 1993-94 से भारत ने हर पांच साल पर होने वाले रोजगार और बेरोजगारी के सर्वे के नतीजों के आधार पर बेस ईयर में बदलाव शुरू किया.

हालांकि यह परंपरा भी 2009-10 में टूट गई, क्योंकि 2008 की वैश्विक मंदी की वजह से यह कोई ‘सामान्य साल’ नहीं था. इसलिए अगला बेस ईयर 2011-12 तय किया गया. इसके बाद फिर बेस ईयर में 2016-17 में बदलाव किया जाना चाहिए था, लेकिन तब बदलाव नहीं हुआ और ऐसा क्यों नहीं हुआ इसके बारे में जानकारी सामने नहीं आई. 2017-18 पर हम खास जोर इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि पिछले दौर का रोजगार सर्वे (PLFS) और कंज्यूमर व्यय सर्वे 2017-18 में किया गया था.

साल 2017-18 का रोजगार सर्वे (PLFS) आ चुका है और पहले इससे इंकार करने के बाद आखि‍र 2019 के चुनाव के बाद जारी कर दिया गया. इसमें यह दिखाया गया है कि बेरोजगारी की दर पिछले 45 साल में सबसे ज्यादा (6.1%) है. उपभोक्ता व्यय सर्वे अभी तक जारी नहीं किया गया है.

सांख्यिकीय आंकड़ों की विश्वसनीयता दांव पर

बेस ईयर में प्रस्तावित बदलाव को लेकर आशंकाए इस वजह से हैं, क्योंकि सरकारी आंकड़ों की गुणवत्ता पर संदेह किया जाता रहा है. जीडीपी के आकलन की प्रक्रिया अभी तक अपारदर्शी रही है. इसीलिए आर्थिक सर्वेक्षण तैयार करने में साल 2014 से 2018 तक सरकार के मुख्य आर्थि‍क सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमणि‍यन जुलाई 2019 में लिखते हैं कि, ‘अंतर्निहित आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए सीएसओ के बाहर का कोई भी व्यक्ति जीडीपी का अनुमान नहीं लगा सकता.' नेशनल एकाउंट्स डिविजन कार्यक्रम क्रियान्वयन एवं सांख्यिकीय (MoSPI) मंत्रालय के केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) का हिस्सा है. एनएससी के पूर्व चेयरमैन पीसी मोहनन कहते हैं कि साल 2011-12 के बेस ईयर से पहले इसे बदलने के लिए जो भी डेटा इस्तेमाल किए जाते थे, वे सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होते थे. इन सबमें साल 2015 से बदलाव आ गया, जब बेस ईयर को बदलकर 2011-12 कर दिया गया.

संरचनात्मक बदलाव काफी खामियों वाले MCA21 डेटा सेट पर आधारित

साल 2011-12 के सीरीज में पहली बार कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के एक अपरीक्षित और अज्ञात टाइप के डेटाबेस का इस्तेमाल किया गया. इसमें मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की कॉरपोरेट कंपनियों के उत्पादन का आकलन करने की बात कही जाती है. 2011-12 के सीरीज में मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं के संरचनात्मक हिस्सेदारी में जो बड़ा बदलाव दिख रहा है, वह इसी वजह से है. नीचे तुलनात्मक वर्षों में 2004-05 और 2011-12 के सीरीज का इस्तेमाल करते हुए आप इसका असर देख सकते हैं.

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इसमें मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा काफी तेजी से बढ़ा है  (14.9 फीसदी से वित्त वर्ष 2014 में बढ़कर 17.2 फीसदी) और सर्विस सेक्टर का हिस्सा तेजी से गिरा है (67.4 फीसदी से वित्त वर्ष 2014 में 59.9 फीसदी). MCA21 को आज भी सार्वजनिक नहीं किया गया है.

हालांकि, अप्रैल 2019 में जब एनएसएसओ ने MCA21 डेटासेट पर अपनी ‘टेक्निकल रिपोर्ट ऑन सर्विसेज सेक्टर एंटरप्राइजेज इन इंडिया’ प्रकाशि‍त की तो इसके खुलासे से अर्थशास्त्री और अन्य सभी लोग चौंक गए थे.

इसमें कहा गया है, ‘एमसीए की करीब 45 फीसदी इकाइयां सर्वे से बाहर थीं, जबकि ईसी/बीआर फ्रेम में ऐसे 18 फीसदी केस थे.’ इसका मतलब यह है कि ए- सर्विस सेक्टर में MCA21 की करीब 45 फीसदी इकाइयों का वास्तव में जमीन पर कोई अस्तित्व ही नहीं है, उनका कोई कामकाज नहीं है (वे बंद या बेकार हैं) अथवा जिस श्रेणी का उन्हें बताया गया है उनमें उनकी कोई गतिविधि‍ नहीं है. बी- अन्य डेटासेट जैसे आर्थि‍क गणना (EC)  या बिजनेस रजिस्टर (BR)  में ऐसी गलती बहुत कम 18 फीसदी होती है.

MoSPI ने मई 2019 के इस निष्कर्ष पर अपनी सफाई भी जारी कर दी है, लेकिन इससे संदेह को कम करना मुश्किल है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के MCA21 यूनिट का अभी तक ऐसा परीक्षण नहीं हुआ है.

जीडीपी के संदिग्ध आंकड़े

जनवरी 2015 में जब 2011-12 सीरीज जारी किया गया, तो यह बताया गया कि भारत का जीडीपी ग्रोथ चीन से भी ज्यादा हो गया है. इससे पहली बार अर्थशास्त्रियों के मन में संदेह पनपा जो जीडीपी और अन्य संकेतकों के बीच असंतुलन की बात कर रहे थे.

इसके बाद एक फिर संदेह पैदा हुआ जब करीब चार साल बाद नवंबर 2018 में बैक सीरीज डेटा जारी किया गया. इसके पहले खुलकर ड्रामा सामने आया. नीति आयोग ने दो पुराने संशोधनों को खारिज कर‍ दिया जिसमें यह दिखाया गया था कि यूपीए शासन के दौरान जीडीपी में तेज बढ़त हुई थी, जबकि सच्चाई तो यह है कि इस मामले में नीति आयोग की किसी भी तरह की विशेषज्ञता नहीं है.

नीति आयोग ने आखि‍रकार जब बैक सीरीज को जारी करने की इजाजत दी,  तो उसके बाद MoSPI दस्तावेजों से निम्न ग्राफ बनता है, जिससे यह पता चलता है कि किस तरह किस तरह से उसमें यूपीए सरकार के जीडीपी आंकड़ों को कम कर‍के दिखाया गया है.

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नोटबंदी और जीएसटी के बाद के जीडीपी आंकड़े बढ़ाए गए

इसके बाद 1 फरवरी, 2019 को बजट पेश होने से एक दिन पहले जीडीपी आंकड़ों में फिर संशोधन किया गया. नोटबंदी के साल यानी वित्त वर्ष 2017 में जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े को 7.1 फीसदी से बढ़ाकर 8.2 फीसदी कर दिया गया, जो कि दशक में सबसे ज्यादा है, और जीएसटी लागू होने वाले साल यानी वित्त वर्ष 2018 के लिए जीडीप ग्रोथ के आंकड़े को 6.7 फीसदी से बढ़ाकर 7.2 फीसदी कर दिया गया.

साल 2018 की अपनी एक पुस्तक में सुब्रमणियन बताते हैं कि किस तरह से नोटबंदी और जीएसटी दोहरे झटके की तरह थे और इनसे किस तरह से इकोनॉमी को भारी नुकसान हुआ था. नोटबंदी के बारे में वह लिखते हैं, ‘नोटबंदी एक व्यापक, गंभीर, मौद्रिक झटका था’ जिसकी वजह से अगली 7-8 तिमाहियों में जीडीपी में गिरावट देखी गई.

जून 2019 में सुब्रमणि‍यन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के लिए एक पेपर लिखा जिसमें यह कहा गया कि भारत के ग्रोथ अनुमान को साल 2011-12 से 2016-17 के बीच करीब 2.5 फीसदी बढ़ाकर दिखाया गया. यह हमला अभी ठंडा ही पड़ा था कि एक और पेपर में सुब्रमणि‍यन ने एक और गोला दाग दिया, जिसमें उन्होंने कहा, ‘अंतर्निहित आंकड़े सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं होते, इसलिए सीएसओ के बाहर का कोई भी व्यक्ति ‘जीडीपी का अनुमान’ नहीं लगा सकता.'  

बेस ईयर में बदलाव के बारे में क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सेन कहते हैं कि साल 2017-18 को बेस ईयर चुनना अच्छा नहीं है, क्योंकि यह एक ‘सामान्य वर्ष’ नहीं था और इससे बेहतर 2018-19 को चुनना हो सकता है. उनका कहना है कि इसकी वजह यह है कि साल 2017-18 में दो बड़े आर्थिक झटकों का सामना करना पड़ा- नवंबर 2016 में नोटबंदी का ऐलान हुआ और जुलाई 2017 में जीएसटी लागू किया गया.

कार्यक्रम क्रियान्वयन एवं सांख्यिकीय मंत्रालय (MoSPI) द्वारा इस बारे में सक्रियता दिखाने के सवाल पर सेन ने कहा कि संशोधन में महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजगार और उपभोक्ता व्यय सर्वे के आंकड़े उपलब्ध हैं या नहीं. रोजगार के आंकड़े से यह पता चलता है कि 2017-18 को इस मामले में काफी खराब साल माना जाता है (बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी) और दूसरा आंकड़ा भी शायद अच्छा नहीं है (इसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है)

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर मोहनन और सी. रंगराजन का भी यह मानना है कि 2017-18 का साल सामान्य वर्ष नहीं है, क्योंकि उस साल नोटबंदी और जीएसटी का असर था. रंगराजन ने कहा कि सरकार यदि 2017-18 जैसे कम आमदनी वाले साल को चुनती है तो मुश्किल में पड़ सकती है.  

मोहनन ने कहा कि उनकी मुख्य चिंता MCA21 के बारे में है, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग जीडीपी का हिस्सा काफी बढ़ा दिया गया है और सर्विस जीडीपी का हिस्सा घटा दिया गया है. यह डेटासेट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है और इसकी गुणवत्ता के बारे में अप्रैल 2019 के एनएसएसओ रिपोर्ट में जो सवाल उठाए गए थे उसका समाधान करना चाहिए और इसको फिर से इस्तेमाल करने से पहले तमाम एक्सपर्ट को संतुष्ट करना चाहिए.

MoSPI के अधि‍कारियों की चुप्पी

बेस ईयर में प्रस्तावित बदलाव को लेकर हमने अपने कई सवालों और आशंकाओं को दूर करने के लिए कार्यक्रम क्रियान्वयन एवं सांख्यिकीय मंत्रालय (MoSPI) के अधि‍कारियों से लगातार संपर्क करने की कोशि‍श की और उनकी प्रतिक्रिया लेनी चाही (मुलाकात, फोन या मेल के द्वारा), लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला. MoSPI के सेक्रेटरी प्रवीण श्रीवास्तव ने हमारे सवालों को अपने सहयोगियों- केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) में टीके सान्याल (GD)  और एनके शर्मा (ADG) के पास भेज दिए, जिन्होंने कोई जवाब देने से इंकार कर दिया. अनंत अब UPSC के सदस्य बन चुके हैं, उनके पास यह बहाना था कि मीडिया में या सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी न करने की यूपीएससी की ‘परंपरा’ रही है.

अब इसके बारे में कुछ और स्पष्टता तभी आएगी, जब मंत्रालय (MoSPI) द्वारा नई सीरीज जारी होगी.

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