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नई वित्त मंत्री को विरासत में मिलेंगी अर्थव्यवस्था की ये चुनौतियां

नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अर्थव्यवस्था की कई चुनौतियां मिलने वाली हैं. आम चुनाव से कुछ महीनों पहले से ही देश में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर नकारात्मक खबरें आने लगी थीं. इससे नई वित्त मंत्री को निपटना होगा.

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aajtak.in
दिनेश अग्रहरि नई दिल्ली, 31 May 2019
नई वित्त मंत्री को विरासत में मिलेंगी अर्थव्यवस्था की ये चुनौतियां नॉर्थ ब्लॉक में वित्त मंत्रालय का दफ्तर

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अब मोदी के मंत्रियों का शपथग्रहण भी हो गया है. निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्री बनाया गया है. रक्षा मंत्रालय में उनका प्रदर्शन बेहतर रहा है, लेकिन वित्त मंत्रालय की बात करें तो विरासत में उन्हें अर्थव्यवस्था की कई चुनौतियां मिलने वाली हैं.

असल में आम चुनाव से कुछ महीनों पहले से ही देश में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर नकारात्मक खबरें आने लगी थीं. अर्थव्यवस्था में सुस्ती है. रोजगार में पर्याप्त बढ़त नहीं हो पा रही. देश के औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई है, महंगाई दर बढ़ी है और इस वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर अनुमान से कम रहने का अनुमान है. तो इन सब चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को खपत बढ़ानी होगी, निवेश और निर्यात को बढ़ाव देना होगा और वित्तीय सेक्टर में नकदी के संकट को दूर करना होगा.

अर्थव्यवस्था में सुस्ती

देश में आर्थिक वृद्धि दर (GDP) वित्त वर्ष 2018-19 में सिर्फ 6.98 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पिछले वित्त वर्ष की GDP ग्रोथ रेट 7.2 फीसदी से कम है. मार्च में खत्म चौथी तिमाही में तो जीडीपी बढ़त महज 6.5 फीसदी रहने का ही अनुमान जारी किया गया है. जीडीपी ही अर्थव्यवस्था की तरक्की को मापने का सबसे बड़ा आंकड़ा होता है.

दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादन में भी गिरावट हो रही है. उद्योंगों को अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत पहिया माना जाता है जिनके दम पर रोजगार सृजन जैसा जरूरी कार्य संभव होता है. विनिर्माण क्षेत्र में सुस्ती बने रहने की वजह से इस साल मार्च में देश का औद्योगिक उत्पादन (IIP) में पिछले साल इसी माह की तुलना में 0.1 फीसदी की गिरावट आई है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक औद्योगिक उत्पादन का यह 21 माह का सबसे कमजोर प्रदर्शन है. पूरे वित्त वर्ष 2018-19 में औद्योगिक वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत रही. यह पिछले 3 साल में सबसे कम है.

औद्योगिक उत्पादन में कमी का मतलब है कि उद्योगों को अगले महीनों के लिए ऑर्डर कम आ रहे हैं  यानी न तो जनता खर्च करने को तैयार है और न सरकार. अर्थव्यवस्था को गति देना है तो औद्योगिक उत्पादन को फिर से पटरी पर लाना होगा. मांग में कमी की वजह से ही अप्रैल में कारों की बिक्री में करीब 17 फीसदी की गिरावट आई है, जो आठ साल की सबसे बड़ी गिरावट है.

रोजगार बढ़ाना है चुनौती

मोदी सरकार 2.0 के लिए सबसे बड़ी चुनौती रोजगार में तेज बढ़त करने की होगी. रोजगार के मोर्चे पर मौजूदा सरकार को काफी आलोचना का शिकार होना पड़ा था. ईपीएफओ के मुताबिक, अक्टूबर 2018 से अप्रैल अंत तक औसत मासिक नौकरी सृजन में 26 फीसदी की गिरावट आई है. नौकरियों के सृजन के मोर्चे पर भी गति काफी धीमी है. हाल में मीडिया में लीक एनएसएसओ की पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) रिपोर्ट में कहा गया था कि 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी तक पहुंच गई जो 45 साल में सबसे ज्यादा है. पिछले वर्षों में आए लगभग सभी चुनावी सर्वे में लोगों की सबसे बड़ी चिंता बेरोजगारी को बताया गया है.

सरकारी खर्च और खपत बढ़ानी होगी

खपत में कमी और निर्यात में मामूली बढ़त होने से अगले महीनों में जीडीपी ग्रोथ पर दबाव बना रहेगा. पिछले महीनों में निजी खपत के साथ ही सरकारी खर्चों में कमी आई है. जानकारों का कहना है कि वित्त वर्ष के अंत यानी मार्च तक सरकारी खर्च बढ़ जाते हैं. लेकिन इस बार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार ने अपने खर्चों में कटौती की. हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था भी धीमी वृद्धि दर के दौर से गुजर रही है. हालांकि नई सरकार बन जाने के बाद कंपनियों के प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद की जा रही है.

निर्यात की वृद्धि दर अप्रैल में चार महीने के निचले स्तर पर आ गई. अप्रैल में वस्तुओं का निर्यात पिछले साल के समान महीने की तुलना में 0.64 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 26 अरब डॉलर रहा, इससे व्यापार घाटा भी पांच महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल माह में माह में आयात महज 4.5 प्रतिशत बढ़कर 41.4 अरब डॉलर रहा, हालांकि इतने कम बढ़त के बावजूद छह माह की सबसे अधिक वृद्धि है.

बढ़ता राजकोषीय घाटा और कर्ज

टैक्स कलेक्शन कम होने से वित्त वर्ष 2018-19 (अप्रैल-मार्च) के शुरुआती 11 महीनों में भारत का राजकोषीय घाटा बजटीय लक्ष्य का 134.2 फीसदी हो गया. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीजीए) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष के शुरुआती 11 महीनों में राजकोषीय घाटा उस साल के लक्ष्य का 120.3 फीसदी था. वित्त वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटा 7.04 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो सकल घरेलू उत्पाद का 3.4 फीसदी है. तो टैक्स कलेक्शन बढ़ाकर राजकोषीय घाटे को काबू में रखना और सरकारी खर्च बढ़ाना एक तरह से संतुलन साधने की चुनौती नई वित्त मंत्री के सामने होगी.

देश पर कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है. इसे काबू में लाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. सितंबर, 2018 तक के लिए ही जारी रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी सरकार के कार्यकाल में देश पर कर्ज 49 प्रतिशत बढ़कर 82 लाख करोड़ पहुंच गया है.  

वित्तीय सेक्टर में नकदी संकट

नए वित्त मंत्री के सामने एक बड़ी चुनौती वित्तीय सेक्टर में बने नकदी संकट को दूर करने की होगी. इन्सॉन्वेंसी ऐंड बैंकरप्शी कोड (IBC) एनडीए प्रथम सरकार का एक बड़ा आर्थ‍िक सुधार था. इसका लक्ष्य 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के फंसे कर्जों का कोई समाधान निकालना था. लेकिन अब वित्तीय सेक्टर में नकदी का संकट खड़ा हो गया है, जिसका नए वित्त मंत्री को समाधान निकालना होगा. पिछले साल सितंबर में IL&FS के कर्ज डिफाल्ट शुरू करने के बाद यह संकट बना है. उसके ऊपर करीब 90 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. इसकी वजह से बहुत सी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने कर्ज वितरण में कंजूसी बरतनी शुरू कर दी है.

कच्चे तेल और महंगाई की चुनौती

इंटरनेशनल मोर्चे पर अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर से तनाव बढ़ा है और अमेरिका ने ईरान से तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. इसकी वजह से कच्चे तेल की कीमत बढ़ने लगी है. ब्रेंड क्रूड ऑयल का रेट पिछले दिनों में 65 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहा है. चुनाव की वजह से सरकार पिछले काफी दिनों से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़त को रोके हुए थी, लेकिन अब इसमें अच्छी खासी बढ़त करनी पड़ेगी और यह सिलसिला धीरे-धीरे शुरू भी हो गया है. इसकी वजह से महंगाई फिर से बढ़ने लगेगी. देश की खुदरा महंगाई अप्रैल में 2.92 फीसद रही जो मार्च के 2.86 फीसद की तुलना में अधिक है. वास्‍तव में, खाद्य पदार्थों के दामों में हुई बढ़ोतरी की वजह से अप्रैल में मार्च की तुलना में खुदरा महंगाई में इजाफा हुआ है.  

मॉनसून और सूखा

आगे अर्थव्यवस्था क्या मोड़ लेती है, इसके लिए कच्चे तेल की कीमतों के अलावा मॉनसून पर भी नजर रखनी होगी. इस साल मार्च से मई महीने के दौरान होने वाले प्री-मॉनसून बारिश में 22 फीसदी की गिरावट आई है. इस गिरावट से गन्ना, सब्जियों, फलों और कपास जैसे फसलों के उत्पादन पर विपरीत असर पड़ सकता है. आईआईटी गांधी नगर में बने सूखे के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम के द्वारा यह चेतावनी जारी की गई है कि देश के 40 फीसदी से ज्यादा हिस्से में सूखा पड़ सकता है और इसके करीब आधे हिस्से में गंभीर या असाधारण सूखा पड़ सकता है. इस बार मॉनसून के सामान्य से नीचे 93 फीसदी तक रहने की संभावना है.

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