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कॉरपोरेट अपराधों पर नरमी! कंपनी एक्ट की 65 धाराओं में बदलाव की तैयारी कर रही सरकार

सरकार अब कंपनी अधिनियम में भी बदलाव करने जा रही है. इन बदलावों का उद्देश्य यह होगा कि छोटे कॉरपोरेट अपराधों के मामलों में सजा में नरमी बरती जाए.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 19 August 2019
कॉरपोरेट अपराधों पर नरमी! कंपनी एक्ट की 65 धाराओं में बदलाव की तैयारी कर रही सरकार कॉरपोरेट अपराध पर सख्त सजा के प्रावधान हटाने की तैयारी

अर्थव्यवस्था को तेजी देने के तमाम उपायों के तहत सरकार अब कंपनी अधिनियम में भी बदलाव करने जा रही है. इन बदलावों का उद्देश्य यह होगा कि छोटे कॉरपोरेट अपराधों के मामलों में सजा में नरमी बरती जाए. सूत्रों के मुताबिक उद्योग-कॉरपोरेट जगत के दिग्गजों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के बीच बैठक में इसका संकेत दिया गया है. पीएमओ के वरिष्ठ अधिकारी और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी इस मसले पर मिलकर काम कर रहे हैं. हालांकि गंभीर अपराधों के मामले में कोई रियायत नहीं दी जाएगी.

सरकार इस बात के लिए तैयार दिखती है कि उद्यमियों की तरक्की के लिए छोटी अनियमितताओं के मामले में कठोर सजा देने के चलन को खत्म किया जाए. गौरलतब है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के वरिष्ठ अधि‍कारियों ने शनिवार को वित्त मंत्रालय के पांच सचिवों समेत शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की है जिसमें दौलतमंद आयकरदाताओं पर सरचार्ज से लेकर ऑटो और रियल एस्टेट क्षेत्र की सुस्ती को दूर करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया. इससे पहले वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार सुधार के उपायों पर विचार कर रही है. पीएमओ के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा की अगुवाई में यह बैठक हुई.

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार कंपनी अधिनियम की उन 65 धाराओं में बदलाव की तैयारी कर रही है, जिनमें अपराध बहुत गंभीर नहीं होते या वे कम्पाउडेंबल (समाधान लायक या छोटे-मोटे अपराध) प्रकृति के होते हैं, जिनमें प्रक्रियागत या तकनीकी गलती होती है. अधिकारियों का ऐसा मानना है कि अनियमितताओं को अपराध बनाए जाने से कुछ खास फायदा नहीं हुआ है. इसलिए ज्यादातर कम्पाउंडेबल गलतियों को अपराध के दायरे से बाहर करने पर विचार हो रहा है.

जिन अपराध के लिए कारावास, जुर्माना या दोनों होते हैं उन्हें कम्पाउंडेबल कहते हैं और जिन अपराध के मामले में कारावास के साथ जुर्माना होता है नॉन-कम्पाउंडेबल कहते हैं. नॉन-कम्पाउंडेबल अपराधों में जालसाजी, आय से ज्यादा संपत्ति, कंपनी के बारे में सही जानकारी सार्वजनिक न करने मामले आते हैं जिनमें मामला दर्ज करने में समय दिया जा सकता है या अगर जनहित का कोई नुकसान न हुआ हो तो मामले का निपटान भी किया जा सकता है.

सरकार इस मामले में बनी समिति का नए सिरे से गठन करेगी और यह समिति दो चरणों में 65 धाराओं में बदलाव पर काम करेगी. पहले चरण में 30 और दूसरे चरण में 35 धाराओं में बदलाव किया जाएगा.

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में भारत में कॉरपोरेट कंपनियों के कर्ज डिफाल्ट और बहीखातों में गड़बड़ी के कई मामले सामने आए हैं. कॉरपोरेट जगत इस बात के लिए लगातार दबाव बना रहा है, छोटे-छोटे मामलों में कारोबारियों को जेल भेजने का चलन बंद होना चाहिए और ऐसे मामलों के लिए सजा में नरमी बरती जानी चाहिए.

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