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लौट रहा यूपीए वाला दौर! 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है ब्रेंट क्रूड का भाव

कच्चे तेल की कीमत फिर बढ़ने लगी है. ब्रेंट क्रूड का भाव 75 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया है और इस बात की आशंका है कि यह 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है. यूपीए सरकार के दौर में कच्चे तेल के भाव की इसी ऊंचाई की वजह से महंगाई काफी बढ़ गई थी. 

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दिनेश अग्रहरि नई दिल्ली, 26 April 2019
लौट रहा यूपीए वाला दौर! 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है ब्रेंट क्रूड का भाव कच्चे तेल की बढ़ती जा रही कीमत

ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने के अंदेशे से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का रुख लगातार बना हुआ है. ब्रेंट क्रूड का भाव 75 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया है और इस बात की आशंका है कि यह 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है. यह वही स्तर है जिसकी वजह से यूपीए सरकार में महंगाई काफी बढ़ गई थी. यूपीए सरकार के दौर में कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के पार करता हुआ जुलाई 2008 में 132 डॉलर तक पहुंच गया था.

अमेरिकी लाइट क्रूड डब्ल्यूटीआई का भाव भी 66 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रहा है. न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, ऊर्जा विशेषज्ञों का यह मानना है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से तेल की आपूर्ति का संकट आने वाले दिनों में और गहराने की आशंकाओं से निकट भविष्य में ब्रेंड क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकता है.

मोदी सरकार की तकदीर अच्छी रही  

गौरतलब है कि वर्ष 2014 के आम चुनाव में महंगाई मुख्य चुनावी मुद्दा था. सत्तारूढ़ यूपीए की हार में ईधन की ऊंची कीमतों की निर्णायक भूमिका रही थी. वर्ष 2011 से 2014 के बीच कच्चे तेल का औसत भाव 108 डालर प्रति बैरल रहा था जिससे रोजमर्रा की वस्तुएं काफी महंगी हो गईं थीं. अपनी दूसरी पारी में यूपीए सरकार महंगाई को काबू करने में ही जूझती रही. सत्ता विरोधी लहर के कारण आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रचंड बहुत मिला. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की यह खुशकिस्मती रही कि कच्चे तेल के दाम लगातार गिरते गए. भारतीय बास्केट में इसके भाव मई 2014 में 113 डालर प्रति बैरल से लुढ़क कर जनवरी 2015 में 50 डालर के स्तर पर आ गए. इसके बाद लंबे समय तक इसी दायरे में बने रहे.

क्यों आई तेजी

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध में भारत समेत कुछ प्रमुख देशों को दी गई छूट दो मई के बाद आगे नहीं बढ़ाने की घोषणा के बाद कच्चे तेल के दाम में तेजी का रुख बना हुआ है. हालांकि इस बीच अमेरिका में तेल का भंडार बढ़ने की रिपोर्ट के बाद तेजी पर ब्रेक लगा, लेकिन उसका असर ज्यादा समय तक नहीं रहा. कच्चे तेल का भाव बढ़ने से भारत में पेट्रोल और डीजल फिर महंगे हो जाएंगे. हालांकि भारत सरकार ने तेल की आपूर्ति पर्याप्त होने का दावा किया है.

ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का कहना है कि भारत सरकार की चिंता तेल की आपूर्ति से कहीं ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमत है. उन्होंने कहा कि ईरान से तेल का आयात प्रभावित होने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आने वाले दिनों में ब्रेंट क्रूड का दाम 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है, जोकि भारत के लिए एक चिंता का विषय है.

भारत ने पहले से ही ईरान से तेल का आयात कम कर दिया है और इसमें 50 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है. ईरान दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शुमार है और वहां से तेल की आपूर्ति घटने से दाम में पहले से ही तेजी का रुख बना हुआ है. पिछले साल भी ब्रेंट क्रूड का भाव 86 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया था जोकि 2014 के बाद का सबसे उंचा स्तर था.

गौरतलब है कि ओपेक और गैर-ओपेक देश रूस द्वारा तेल के उत्पादन में इस साल जनवरी से 12 लाख बैरल रोजाना की कटौती की जा रही है जिसके कारण इस साल तेल के दाम में तेजी का रुख रहा है. इस बीच वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध से इस तेजी को और सहारा मिला.  अमेरिकी एजेंसी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, सऊदी अरब, रूस, कनाडा, चीन और इराक के बाद ईरान दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. 2018 में ईरान का रोजाना उत्पादन 44.7 लाख बैरल था.

अभी और तेजी आ सकती है

केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया ने कहा कि ओपेक और गैर-ओपेक देश रूस द्वारा तेल के उत्पादन में इस साल जनवरी से 12 लाख बैरल रोजाना की कटौती की जा रही है जिसके कारण इस साल तेल के दाम में तेजी का रुख रहा है. इस बीच वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध से इस तेजी को और सहारा मिला.

केडिया ने कहा कि ओपेक की जून में होने वाली बैठक में तेल का उत्पादन बढ़ाने या तय कटौती में कमी करने का फैसला ले सकता है, इससे पहले आपूर्ति संकट के कारण कीमतों को सपोर्ट मिलता रहेगा. ऐसे में 80 डॉलर प्रति बैरल तक ब्रेंट क्रूड का भाव चला जाए इसमें कोई संदेह नहीं है.  

आगे अमेरिका में जुलाई-अगस्त में तूफान का सीजन शुरू होने से पहले तेल के कुओं को रखरखाव के लिए मई में कुछ समय के बंद किया जा सकता है, जिससे उत्पादन में कमी आ सकती है. यह भी तेल की कीमतों में आगे तेजी आने का एक कारण हो सकता है.

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