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सियाचिन: खाने-पीने से लेकर टॉयलेट तक, जानें कैसे जिंदा रहते हैं जवान

aajtak.in [Edited by: रविकांत सिंह]
03 June 2019
सियाचिन: खाने-पीने से लेकर टॉयलेट तक, जानें कैसे जिंदा रहते हैं जवान
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सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र है, जहां मातृभूमि की रक्षा में हिंदुस्तानी सेना के जवान जी-जान से डटे रहते हैं. यहां जिंदगी कितनी मुश्किल है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पिछले 30 साल में हमारे 846 जवानों ने प्राणों की आहुति दी है. बेहद खतरनाक मौसम के बावजूद देश के 10 हजार जवान इस बर्फीली चोटी पर दिन रात डेरा जमाए रहते हैं और दुश्मन देश के नापाक मंसूबे को नाकाम करते हैं. (फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव)

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सियाचिन ग्लेशियर 20 हजार फुट की ऊंचाई पर है. यहां सैनिक एकसाथ चलते हैं. समूह में चल रहे जवानों के पैर एक रस्सी से बंधे होते हैं ताकि कोई साथी अगर गिर या फिसल जाए तो समूह से वह अलग न हो पाए. ऊंचाई वाले जिस स्थान पर जवानों की तैनाती होनी होती है, वहां तक पहुंचने के लिए सैनिकों को बेस कैंप से 10 दिन पहले यात्रा शुरू करनी पड़ती है. इसके लिए सैनिकों की टुकड़ी रात को ढाई या 3 बजे निकल पड़ती है ताकि 9 बजे से पहले वहां पहुंचा जा सके. दिन में बर्फ धंसने का खतरा ज्यादा होता है इसलिए रात में निकलता होता है.
(फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव)

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हर फौजी के साथ 20-30 किलो का बैग होता है जिसमें बर्फ काटने वाली एक कुल्हाड़ी, उसके हथियार और रोजमर्रा के कुछ सामान होते हैं. शून्य से नीचे तापमान रहने के बावजूद सैनिक पसीने से तरबतर होते हैं क्योंकि शरीर पर 6-7 तह मोटे और गर्म कपड़े होते हैं. सैन्य पोस्ट पर पहुंचते पहुंचते फौजियों के शरीर और कपड़े के बीच पसीने की पतली परत जम जाती है. गर्मी बढ़ने के साथ इसके टूटने की आवाज सुनी जा सकती है. (फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव)

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खाने में लिक्विड ज्यादा उपयोग होता है. खाने के सामान टीन के कैन में सप्लाई होते हैं. सूप पीना हो तो पहले उसे पिघलाना पड़ता है. टीन का कैन भी जम गया होता है इसलिए पहले उसे आग पर रखकर नर्म करते हैं. सूप के पिघलते ही जितनी जल्द हो सके उसे पीना पड़ता है क्योंकि शून्य से नीचे तापमान पलभर में उसे फिर जमा देता है. मौसम की हालत ये होती है कि कुछ ही समय में तापमान शून्य से 60 डिग्री नीचे तक चला जाता है और बर्फीला तूफान ऐसा कि पलक झपकते ही सेना की पूरी टुकड़ी काल के गाल में समा सकती है.(फोटो-रॉयटर्स)

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दूध के कैन को खोलने में 40 मिनट तक का वक्त लग जाता है क्योंकि हाथ इतने बंधे होते हैं और उस पर कपड़े की इतनी मोटी तह होती है कि डिब्बे को पकड़ना इतना आसान काम नहीं होता. चॉकलेट और सूखे मेवे सैनिकों के लिए काफी मुफीद माने जाते हैं क्योंकि वो बर्फ में जमते नहीं और जम भी जाएं तो उन्हें पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ती. पानी के लिए अलग से कोई सुविधा नहीं होती क्योंकि जवानों को बर्फ पिघला कर ही पीना होता है. इसमें भी सावधानी बरतनी होती है क्योंकि बर्फ भी दूषित हो सकता है.(फोटो-रॉयटर्स)

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भूख की कमी बड़ी समस्या है लेकिन जिंदा रहने के लिए कुछ न कुछ खाना पड़ता है. इसमें गर्म और ठंडे की दिक्कत ज्यादा है. गर्म किए खाने और पेय पदार्थ को ठंडा होने से पहले लेना पड़ता है जिसका असर सैनिकों के पाचन तंत्र पर पड़ता है. इसलिए किसी सेहतमंत जवान को भी टॉयलेट में 2-3 घंटे वक्त लगता है. नहाने के लिए जो पानी उपयोग होता है उसके साथ भी पूरी सावधानी बरती जाती है. नहाने के दौरान पानी जमे नहीं, इसलिए उसे बराबर स्टोव पर रखा जाता है. केरोसिन तेल यहां की लाइफलाइन है क्योंकि इसी पर सब कुछ निर्भर करता है. पहले इसे कैन में सप्लाई करते थे, लेकिन अब पाइपलाइन बिछा दी गई है.(फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव)
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सियाचिन में सबसे बड़ी समस्या अंगों के जमने की है. शरीर का जो हिस्सा किसी मेटल के संपर्क में आता है, पलक झपकते ही वह जम या कट जाता है. फिर उसे दुरुस्त करना काफी मुश्किल काम है. ठंड से अंगों के कटने का भी खतरा होता है जिसे शीतदंश या फोर्स्टबाइट कहते हैं. दुश्मन देश की गोलियों से ज्यादा खतरा हमारे सैनिकों को शीतदंश का होता है. इसलिए जवानों को ऐसे कपड़े मुहैया कराए जाते हैं जो इस खतरे को टाल सकें. बेहोशी और बराबर सिरदर्द बने रहना यहां की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है.(फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव)

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जो जवान यहां डटे रहते हैं उनमें शरीर का वजन घटना, भूख की कमी, निंद न आना और याददाश्त खोने (मेमोरी लॉस) की शिकायत सामान्य है. बोचलाल भी सामान्य नहीं रह जाती है, जीभ फंसने से धीरे धीरे हकलाहट आने लगती है. सियाचिन में जवानों के लिए टीन के कैन में राशन भेजा जाता है. सेब या संतरे पल भर में जमकर क्रिकेट के बॉल की तरह हार्ड हो जाते हैं. इस लिहाज से खाने-पीने में भी तकनीकी स्तर पर काफी सावधानी बरती जाती है. अन्यथा कुछ ही सेकंड में खाने के सामान या पानी जमकर धेले जैसे हो जाते हैं.(फोटो-रॉयटर्स)

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