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गांव के सैनिक-प्रेग्नेंसी लीव, परमानेंट कमीशन के खिलाफ केंद्र के अनोखे तर्क

अभि‍षेक भल्ला
18 February 2020
गांव के सैनिक-प्रेग्नेंसी लीव, परमानेंट कमीशन के खिलाफ केंद्र के अनोखे तर्क
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भारतीय सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने और सैनिकों को कमांड करने का मौका देने के विरोध में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बेहद अजीब दलीलें पेश कीं. सरकार की तरफ से दिए गए तर्क सेना में महिला अधिकारियों के खिलाफ पूर्वाग्रह से पूरी तरह ग्रसित हैं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी दलीलों को खारिज करते हुए सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन और कमांड रोल देने के पक्ष में आदेश दिया.
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आइए जानते हैं सरकार की ओर से गिनाए गए कुछ वो विचित्र दलीलों के बारे में जिन्हें सुनकर आपको लगेगा कि शायद हम अभी तक 21वीं सदी में नहीं पहुंचे हैं-

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सरकार ने सबसे पहली वजह महिलाओं की सीमित शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को बताया. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि देश की दो सरहदें ऐसी हैं जिनका समाधान होना बाकी है और भारतीय सेना अधिकतर मुश्किल क्षेत्रों में और प्रतिकूल मौसम वाली परिस्थितियों में तैनात हैं. कई चौकियां निर्जन और अलग-थलग वाले स्थानों पर हैं. ये परिस्थितियां महिला अधिकारियों को उनकी सीमित शारीरिक क्षमताओं, मातृत्व, बच्चों की देखरेख आदि को देखते हुए अनुकूल नहीं है.
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सरकार ने ये भी दलील दी कि महिला सैनिकों या अधिकारियों को शत्रु की ओर से बंदी बनाए जाने की स्थिति में उन्हें भारी शारीरिक और मानसिक दबाव से गुजरना पड़ सकता है. यही स्थिति तब संगठन और सरकार के लिए भी होगी. ऐसी स्थिति से महिलाओं को सीधी कॉम्बेट पोस्टिंग से दूर रख कर बचा जा सकता है.
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सरकार ने एक दलील हाईजीन और बुनियादी सुविधाओं की कमी की दी. सरकार की तरफ से कहा गया कि अग्रिम क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत बुनियादी और न्यूनतम हाइजिन वाला है. अधिकारियों और सैनिकों को अस्थायी व्यवस्थाओं से काम चलाना होता है. ऐसी जगहों पर महिलाओं की नियुक्ति की सलाह नहीं दी जा सकती. अग्रिम क्षेत्रों में महिलाओं की तैनाती आम जीवन से कटकर रहने की भावना दे सकती है जहां संचार के बहुत सीमित साधन हैं.
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सरकार ने कहा कि यूनिट को कमांड करने का मतलब फ्रंट से लीड करना है. महिलाओं की मौजूदा शारीरिक फिटनेस मानक उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में कम हैं. सरकार ने कहा कि कमांड यूनिट में महिलाओं को स्वीकार करने के लिए अभी तक सेना के जवान मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाए हैं क्योंकि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं.
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सरकार ने यह भी कहा कि महिलाओं को सीधे लाइन ऑफ फायर में नहीं रखा जा सकता है. नियुक्ति नीति सुनिश्चित करती है कि महिलाओं को सीधे लाइन ऑफ फायर या शत्रु की मौजूदगी के करीब नहीं रखा जा सकता.

सरकार की तरफ से पेश की गई दलीलों में पुरुष अधिकारियों को महिलाओं की तुलना में ‘बैटल हार्डी’ बताया गया. दलील में कहा गया कि पुरुष शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी ‘बैटल हार्डी’ (युद्ध के लिए उपयुक्त) होते हैं क्योंकि वो कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स और नॉर्थईस्ट में असम राइफल्स में रहते हुए विपरीत परिस्थितियों का सामना करते रहते हैं.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अगर समाज जेंडर भूमिकाओं को लेकर ऐसे सख्त विचार रखता है कि, पुरुष सामाजिक तौर पर प्रभावशाली, शारीरिक तौर पर मजबूत और परिवार के लिए रोटी-रोज़ी का इंतजाम करने वाले हैं. वहीं महिलाएं कमजोर और शारीरिक तौर पर अधीन हैं, और मुख्यत: घरेलू माहौल में बंधी केयरटेकर हैं. ऐसे में कम ही संभावना है कि माइंडसेट बदले.
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