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9 दिन में 100 मासूमों की मौत, मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का कहर

अजय भारतीय [Edited By: सना जैदी]
17 June 2019
9 दिन में 100 मासूमों की मौत, मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का कहर
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उठ मेरे लाल... उठ..! तू क्यों कुछ नहीं बोलता? ये वेदना है उस मां की जिसके बेटे को चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) ने निगल लिया. बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चे लगातार दिमागी बुखार का लगातार शिकार हो रहे हैं. 7 जून से लेकर अब तक 100 मासूमों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है. कोई इसकी वजह लीची बता रहा है तो कोई दूसरी वजह बता रहा है.
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मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में अपने बच्चों को खो चुकी मांओं की दहाड़ सुनकर लोगों का कलेजा फटा जा रहा है. खो चुके बच्चों की माएं दहाड़ मार कर रो रही हैं, तो उनके पिता और परिजन उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं. औलाद को खोने का घाव कितना गहरा होता, उसका दर्द कितना असहनीय होता है, ये तो कोई पीड़ित मां-बाप ही जानें! रोने, बिलखने, तड़पने, हांफने, कांपने और रोने की ये तस्वीरें चुभती हैं और जैसे कई सवाल पूछ रही हों कि क्यों एक दशक से ज्यादा समय के बाद बिहार एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम को मात नहीं दे सका? क्यों आज भी इसके सामने प्रशासन बेबस नजर आ रहा है?
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वहीं, इतने बच्चों की मौत के बाद भी प्रशासन को कुछ समझ नहीं आ रहा है कि वजह से बच्चों की मौत हुईं? सवाल के जवाब पर वे चुप हैं. इस बीच, केंद्र सरकार को भी होश आया और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन रविवार को मुजफ्फरपुर के दौरे पर पहुंचे. इस दौरान हर्षवर्धन ने कहा, बीमारी की पहचान करने के लिए शोध होना चाहिए, जिसकी अभी भी पहचान नहीं है और इसके लिए मुजफ्फरपुर में शोध की सुविधा विकसित की जानी चाहिए.
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मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार के कारण भयावह स्थिति बनी हुई है. आलम ऐसा है कि अस्पताल में एक ही बेड पर दो बच्चों का इलाज हो रहा है. हॉस्पिटल में जिधर देखो उधर चमकी बुखार से पीड़ित बच्चे ही बच्चे नजर आ रहे हैं और उनके साथ उनकी माएं बैठी हुई हैं. नम आंखों में बस एक ही प्रार्थना है कि उनका बच्चा जल्द ठीक हो जाए, लेकिन दूसरी ओर बुखार रूपी मौत का पंजा बच्चों पर कसता ही जा रहा है.
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अस्पताल में डॉक्टरों की टीम बीमार बच्चों पर जरूरी दवाएं और ग्लूकोज चढ़ा रहे हैं. इस दौरान मां-बाप अपने-अपने बच्चों की तीमारदारी में लगे हुए हैं. लेकिन जब उनके बगल के बेड पर भर्ती किसी बच्चे की सांसें थमती हैं तो उन्हें भी अपने बच्चे के बिछड़ जाने का डर सताने लगता है. वो मन ही मन ईश्वर से अपने बच्चे के ठीक होने की प्रार्थना करते हैं.
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बरूराज के पगठिया की रहने वाली आठ साल की फरीदा की अम्मी शाहबानो की आंखों के आंसू रुक नहीं रहे हैं. उनकी पथराई आंखें मानो गुजर चुकी फरीदा की पुरानी यादों को हर समय के लिए अपनी अंतरात्मा में बसा लेना चाहती हैं. शाहबानो ने अपनी फूल-सी प्यारी बच्ची को बुखार आने के बाद अधिक तबियत खराब होने के कारण एसकेएमसीएच अस्पताल में भर्ती कराई थी, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके. अब तो शाहबानो की मानो दुनिया ही उजड़ गई है. (नोट: तस्वीर शाहबानों की बेटी की नहीं है.)  
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इस बीच, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बीमारी को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि स्वास्थ्य विभाग इस पर नजर बनाए हुए हैं. उन्होंने कहा, ‘लोगों को इस बीमारी को लेकर जागरूक कराना होगा. हर साल बच्चे काल के गाल में समा जा रहे हैं. ये चिंता का विषय है.’ बता दें कि उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी और वैशाली में दिमागी बुखार का प्रभाव दिखता है. इस साल अब तक एसकेएमसीएच में जो मरीज आ रहे हैं, वे मुजफ्फरपुर और आस-पास के हैं.
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चमकी बुखारी की चपेट में 15 साल तक की उम्र के बच्चे आ रहे हैं. इस कारण मरने वालों में अधिकांश की आयु एक से सात साल के बीच है. इस बीमारी का शिकार आमतौर पर गरीब परिवार के बच्चे होते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी का मुख्य लक्षण तेज बुखार, उल्टी-दस्त, बेहोशी और शरीर के अंगों में रह-रहकर कंपन (चमकी) होना है.
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गौरतलब है कि हर साल इसी मौसम में मुजफ्फरपुर इलाके में जापानी बुखार का कहर देखने को मिलता है. पिछले साल गर्मी कम रहने के कारण इस बीमारी का प्रभाव कम देखा गया था.

(सभी फोटो ANI से लिए गए हैं)
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