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प्रदीप की पुण्यतिथि पर जानें कैसे बना 'ऐ मेरे वतन के...' गाना

25 साल की उम्र में उन्होंने 'बंधन' में देशभक्ति रचनाओं से पहचान बनाई. 'चल चल रे नौजवान' प्रदीप के कलम से ही निकली थी. देश की पहली गोल्डन जुबली फिल्म 'किस्मत' के गीत 'दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है' ने उन्हें बड़ा गीतकार बना दिया.
प्रदीप की पुण्यतिथि पर जानें कैसे बना 'ऐ मेरे वतन के...' गाना कवि प्रदीप (फोटो-बीबीसी)
aajtak.in [Edited By: सुरेंद्र कुमार वर्मा]दिल्ली, 11 December 2017

रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी को हिंदी सिनेमा का राष्ट्रकवि कहें तो आप अचानक आश्चर्य से भर जाएंगे, आखिर ये है कौन? लेकिन जब कवि प्रदीप का नाम लेंगे तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी. कवि प्रदीप का नाम सुनते ही हर किसी को देशप्रेम से ओत-प्रोत अमर गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' याद आ जाता है.

मृदुभाषी और बेबाक शैली में देशभक्ति से भरे गीत लिखने वाले कवि प्रदीप ने 83 साल की उम्र में 1998 में 11 दिसंबर को जीवन का अंतिम सांस लिया और दुनिया को अलविदा कहा था. 25 साल की उम्र में उन्होंने 'बंधन' (1940) में देशभक्ति रचनाओं से पहचान बनाई. मशहूर नगमा 'चल चल रे नौजवान' प्रदीप के कलम से ही निकली थी. 1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान दादा साहेब फाल्के सम्मान से नवाजा गया था.

इसके 3 साल बाद 1943 में उस समय की सुपर-डुपर हिट या यों कहें देश की पहली गोल्डन जुबली फिल्म 'किस्मत' के एक देशभक्ति गीत ने उन्हें बड़ा गीतकार बना दिया. उस गीत के बोल हैं 'दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है' और 'आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकारा है' जिसने जल्द ही करोड़ों भारतीय की जुबान पर अपनी जगह बना ली थी. 'दूर हटो' यह गाना उस समय इस कदर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा में दर्शक बार-बार इसे सुनने की मांग करते थे और फिल्म के खत्म होने पर इस गीत को दोबारा सुनाया जाता था.

प्रदीप उज्जैन के पास बडनगर में एक मिडिल क्लास ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्धालय से स्नातक की डिग्री हासिल की. उन्हें शुरुआत से ही हिंदी कविता लिखने का शौक था. अपनी कविता के अनोखे के साथ कवि सम्मेलनों में जाया करते थे. इसी बीच उन्होंने अपना पेन नेम प्रदीप कर लिया जो बाद में उनकी पहचान बनी.

एक बार वह कवि सम्मेलन के लिए बॉम्बे (अब मुंबई) गए तो वहां उन्हें बॉम्बे टॉकिज के हिमांशु रॉय ने अपनी फिल्म कंगन (1939) के लिए कुछ गाने लिखने का न्यौता मिला. इसके लिए वह बॉम्बे में शिफ्ट हो गए और गाने लिखे, जिसमें कुछ गाए भी.

फिल्मों में देशभक्ति गानों की धूम

कवि प्रदीप ने कई देशभक्ति गाने लिखे जिन्होंने अपार लोकप्रियता हासिल की. 1954 में फिल्म जागृति के लिए कई यादगार गीत लिखे. 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है बलिदान की' और 'हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के' और 'दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल साबरमति के संत तुने कर दिया कमाल' ने जितनी धूम उस समय मचाई थी, उतनी ही लोकप्रियता आज भी बच्चों में कायम है. उनके कुछ गाने पाकिस्तान में भी बेहद लोकप्रिय हैं जिसके कुछ शब्द बदलकर उसे अपने हिसाब से किया गया.

1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान ढेरों वीर जवानों के शहीद होने से कवि प्रदीप काफी आहत हुए और उनके सम्मान में उन्होंने 'ऐ मेरे वतन के लोगों' को लिखा, जिसे पहले आशा भोंसले को गाना था, लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि संगीतकार सी रामचंद्रन ने प्रदीप की सलाह पर इसे लता मंगेशकर से गवाया. लता ने 26 जनवरी, 1963 में दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम में इसे पहली बार गाया, जिसे सुनकर पंडित नेहरू समेत वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं थी. कवि प्रदीप के ही सुझाव पर इस गाने से हुई कमाई को युद्ध में शहीद हुए विधवाओं के कल्याण के लिए दान कर दिया गया.

देशभक्ति के अलावा भक्ति गाने भी लिखे

कवि प्रदीप को देशभक्ति गाने में ही महारत नहीं हासिल थी, बल्कि उन्होंने कई अन्य विधाओं में भी गाने लिखे हैं. फिल्म नास्तिक में देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, तेरे द्वार खड़ा भगवान (वामन अवतार), काहे को बिसारा हरी नाम, माटी के पुतले (चक्रधारी), पिंजरे के पंक्षी रे (नागमणि), कोई लाख करे चतुराई (चंडीपूजा) और इंसान का इंसान से हो भाईचारा (पैगाम) ऐसे ही ढेरों नगमें हैं, जिनके जरिए उन्होंने समाज को संदेश देने की कोशिश की.

चल अकेला चल अकेला तेरा मेरा पीछे छुटा (संबंध), जो दिया था तुमने एक दिन मुझे फिर वही प्यार दे दो (संबंध), भारत के लिए एक वरदान है गंगा (हर हर गंगे) के अलावा 1975 में आई छोटे बजट की फिल्म 'जय मां संतोषी' के कई अमर गीत इन्होंने ही लिखे थे, जिसमें 'मैं तो आरती उतारू मां', 'यहां वहां जहां तहां', 'करती हूं मैं तुम्हार व्रत मैं' और 'मदद करो संतोषी मां' बेहद खास रही और फिल्म के साथ-साथ सारे गानों ने लोकप्रियता की नई मिसाल पेश की.

5 दशक लंबे चले करियर में उन्होंने 72 फिल्मों के लिए करीब 1,700 गाने लिखे. 1958 में एचएमवी (HMV) ने उनकी 13 कविताओं से सजा एक एलबम निकाला जिसका नाम दिया 'राष्ट्रकवि'.

उन्होंने कई गानों को अपनी खनकती आवाज भी दी, जिसमें 'देख तेरे संसार की हालत', 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की' 'यहां वहां जहां तहां' बेहद खास रही.

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