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प्रस्थानम रिव्यू: संजय दत्त की दमदार अदाकारी, बेहतर हो सकती थी फिल्म की कहानी

जेल से बाहर आने के बाद भूमि और साहेब बीबी और गैंग्स्टर जैसी फिल्में दर्शकों के बीच पैठ नहीं बना पाई लेकिन नेटफ्लिक्स और ग्लोबल स्ट्रीमिंग कंटेंट के दौर में भी संजू बाबा एक ठीक-ठाक फिल्म को हिट कराने का माद्दा रखते हैं, प्रस्थानम भी उसी फिल्म की बानगी हो सकती है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली , 20 September 2019
प्रस्थानम रिव्यू: संजय दत्त की दमदार अदाकारी, बेहतर हो सकती थी फिल्म की कहानी प्रस्थानम में संजय दत्त
फिल्म: प्रस्थानम
कलाकार: संजय दत्त, अली फजल, मनीषा कोईराला, जैकी श्रॉफ, चंकी पांडे, अमायरा दस्तूर
निर्देशक: देव कट्टा

एक लवर बॉय इमेज से अपने करियर की शुरुआत करने वाले संजय दत्त की सिनेमाई यात्रा एक खलनायक, अपराधी, फ्री स्पिरिट शख्स, गैंगस्टर, मुन्नाभाई जैसे किरदारों के बाद अब एक बाहुबली नेता तक पहुंच चुकी है. संजय दत्त भले ही सलमान खान के स्तर का स्टारडम एंजॉय ना करते हों लेकिन वे अपने दम पर फिल्में हिट कराने में कामयाब रहे हैं. हालांकि बीच-बीच में लचर स्क्रिप्ट्स के चलते उनकी फिल्मों की सक्सेस की निरंतरता में कमी देखने को मिली, यही कारण है कि जेल से बाहर आने के बाद भूमि और साहेब बीबी और गैंग्स्टर जैसी फिल्में दर्शकों के बीच पैठ नहीं बना पाई लेकिन नेटफ्लिक्स और ग्लोबल स्ट्रीमिंग कंटेंट के दौर में भी संजू बाबा एक ठीक-ठाक फिल्म को हिट कराने का माद्दा रखते हैं, प्रस्थानम भी उसी फिल्म की बानगी हो सकती है.

कहानी

अमीनाबाद के बाहुबली विधायक बलदेव प्रताप सिंह(संजय दत्त) अपने रसूख के चलते पूरे शहर में मशहूर हैं. उन्हें ये सीट भी काफी विवादास्पद तरीके से मिली थी. अमीनाबाद से कोई दूसरा शख्स विधायक हुआ करता था जिसे एक दुश्मन गैंग ने मार गिराया था. संजय दत्त ना केवल इस सीट से जीते बल्कि उन्होंने उस नेता की पत्नी सुक्मिनी (मनीषा कोईराला) से शादी भी रचाई. आयुष (अली फजल) और पलक (चाहत खन्ना) सुक्मिनी के पहले पति के बच्चे हैं और काफी सेंसिबल हैं वही संजय दत्त के बेटे विवान ( सत्यजीत दुबे) पर सत्ता का नशा सवार होता है. प्यार, लोभ और पावर की इस लड़ाई में एक शातिर बिजनेसमैन (बाजवा खत्री) ट्विस्ट्स लाते हैं. अपने हमराज़ ड्राइवर (जैकी श्रॉफ) और यंग पॉलिटिकल लीडर बेटे के साथ ही बलदेव प्रताप सिंह एक बार फिर एमएलए की कुर्सी हासिल करने के लिए पुरजोर कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन क्या उनकी ये कोशिश पूरी हो पाती है, ये देखने के लिए आपको थियेटर का रुख करना होगा.  

एक्टिंग

गॉडफादर और सरकार जैसी फिल्मों की तर्ज पर ही कहानी का ज्यादातर प्लॉट दोनों बेटों के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है. मिर्जापुर और विक्टोरिया एंड अब्दुल जैसे प्रोजेक्ट्स के साथ ही अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने वाले अली फजल इस फिल्म में भी अपनी परफॉर्मेंस से प्रभावित करते हैं. वही संजय दत्त के बेटे के तौर पर कई बार ओवर द टॉप एक्टिंग करते दिखते हैं. शायद पावरफुल कलाकारों के साथ काम करने के चलते ही वे थोड़े नर्वस लगते हैं और नैचुरल एक्टिंग से दूर लगते हैं. लेकिन उनका किरदार खलता नहीं है और वे अपनी भूमिका जी ले गए हैं.  एक पावरफुल नेता लेकिन संवेदनशील और असुरक्षित पिता के तौर पर संजय दत्त अपनी एक्टिंग रेंज का प्रदर्शन करते हैं और फिर साबित करते हैं कि उनके पास किसी भी रोल में एडाप्ट हो जाने की क्षमताएं हैं.

हालांकि फिल्म में मनीषा कोईराला का रोल काफी सतही और वन डाइमेन्शनल है. उनके कैरेक्टर पर खास काम नहीं किया गया है. इसके अलावा अमायरा दस्तूर और अली फजल की लव स्टोरी प्रासंगिक नहीं लगती है. जैकी श्रॉफ अपने छोटे लेकिन इफेक्टिव किरदार में अच्छे लगते हैं. दत्त और जैकी की स्क्रीन पर मौजूदगी असरदार है. वही चंकी पांडे ऑफस्क्रीन भले ही कितनी मस्ती करते हों लेकिन साहो के बाद वे फिर साबित करते हैं कि वे नेगेटिव किरदारों के साथ न्याय कर सकते हैं.

डायरेक्शन

कबीर सिंह के बाद ये दूसरी ऐसी फिल्म है जिसे साउथ के डायरेक्टर ने ही हिंदी में बनाने की कोशिश की है. कबीर सिंह के साथ ये फॉर्मूला सफल रहा लेकिन डायरेक्टर देवा कट्टा उस स्तर का प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं. यूपी के बैकड्रॉप पर बनी इस फिल्म के कई सीन्स को देखकर एहसास होता है कि डायरेक्टर ने इस जगह और क्षेत्र के पहलुओं को लेकर बहुत ज्यादा रिसर्च नहीं की है. फिल्म का पहले हाफ में कैरेक्टर्स को स्थापित करने में फिल्म का फ्लो अच्छा लगता है और फिल्म अच्छी रफ्तार से आगे बढ़ती है लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म धीमी हो जाती है. इसके अलावा क्लाइमैक्स बहुत ज्यादा प्रभावशाली नहीं गढ़ा गया है. रियलिस्टक सिनेमा के दौर में कुछ डायलॉग्स भी आज के दौर के हिसाब से कई जगह बचकाने लगते हैं, जिससे साफ होता है कि कुछ किरदारों को छोड़कर ज्यादा किरदारों को गढ़ने में ज्यादा मेहनत नहीं की गई है. हालांकि फिल्म की सिनेमाटोग्राफी प्रशंसनीय है और कई वाइड शॉट्स के सहारे एक पॉलिटिकल थ्रिलर को भव्य फिल्म की फील देती है. फिल्म फर्स्ट हाफ में अच्छी है लेकिन सेकेंड हाफ में टुकड़ों में अच्छा प्रदर्शन करती है.

क्यों देखें

भूमि और साहेब बीबी और गैंग्स्टर के बाद इस फिल्म को संजय दत्त का बेहतर प्रयास कहा जा सकता है. अगर आप संजू बाबा के फैन हैं तो इस फिल्म को मिस करना ठीक नहीं होगा. इसके साथ ही अली फजल, जैकी श्रॉफ और चंकी पांडे की एक्टिंग के लिए भी इस फिल्म को देखा जा सकता है. हालांकि अगर आप गॉडफादर, वन्स अपॉन ए टाइम इन अमेरिका, गुडफेलाज़, दि वायर जैसी टॉप क्वालिटी पॉलिटिकल मेलोड्रैमेटिक प्रोजेक्ट्स पसंद करते हैं तो इस फिल्म को देखकर आपको काफी निराशा हो सकती है.

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