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बॉलीवुड के हरफनमौला कादर खान हुए 72 के

विलेन से लेकर कॉमेडियन तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर खान अब तक 300 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती. वह 80 से अधिक लोकप्रिय फिल्मों के लिए संवाद लिख कर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं.

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aajtak.in
महेन्द्र गुप्ता मुंबई, 21 October 2009
बॉलीवुड के हरफनमौला कादर खान हुए 72 के

विलेन से लेकर कॉमेडियन तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर खान अब तक 300 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती. वह 80 से अधिक लोकप्रिय फिल्मों के लिए संवाद लिख कर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं. हरफनमौला कादर खान आज 72 साल के हो गए.

अमिताभ की फिल्मों ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘शराबी’, ‘लावारिश’ और ‘कुली’ के संवाद आज भी अगर दर्शकों की जुबां पर हैं, ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’, ‘तकदीरवाला’, ‘दुल्हे राजा’, ‘जुदाई’, ‘कुली नं0. 1’ और ‘राजा बाबू’ जैसी फिल्में लोगों को अगर अभी भी गुदगुदाती हैं तो उसका एक बड़ा कारण कादर खान ही हैं.

बॉलीवुड के प्रख्यात निर्देशक मनमोहन देसाई का कहना था, ‘‘आज तक मैने जितने संवाद लेखकों के साथ काम किया है, कादर खान उन सबमें सर्वश्रेष्ठ हैं. उन्हें आम बोलचाल की भाषा आती है. मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है.’’ आठ साल की उम्र से शुरू हुआ कादर का रंगमंच और फिल्मी सफर सात दशक पार करने के बाद भी बदस्तूर जारी है.

कादर खान ने अपने करियर की शुरूआत एक शिक्षक के तौर पर की. अभिनय का मौका उन्हें दिलीप कुमार ने दिया. यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं. फिल्म जगत में उन्होंने इसका भरपूर उपयोग किया. सत्तर और अस्सी के दशक में वह संवाद लेखक थे, वहीं एक दुष्ट खलनायक भी, जिसकी कुटिल मुस्कान खासी खतरनाक हुआ करती थी.

उनकी वही खौफनाक मुस्कान वक्त के साथ हंसी के फुहारों में बदल गई. डेविड धवन की फिल्मों में गोविंदा के साथ उन्होंने दर्शकों को खूब लोट-पोट किया. हालांकि वक्त के साथ वह रूपहले पर्दे से दूर होते गए लेकिन जिस गालिब और मंटों की रचनाओं से प्रेरणा पाकर उन्होंने इतना कुछ लिखा, आजकल वह उन्हीं पर काम कर रहे हैं. गालिब की गजलों को कैसे गाया जाए, इसके लिए वह सीडी तैयार कर रहे हैं. इकबाल और कबीर पर भी काम जारी है.

फिल्म जगत की नई पीढी के साथ काम करने में वह सहज महसूस नहीं करते. उनका कहना है कि आज की पीढी कम्प्यूटर साइंस, तकनीक और बिजनेस मैनेजमेंट पर ज्यादा निर्भर है जबकि शब्दों और अभिनय में जान अनुभव से आती है.

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