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Review: कर्ज में डूबे फोटोग्राफर के रूप में दिल जीत ले जाते हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी

ये कहानी उत्तर प्रदेश के रफ़ी की है जो मुंबई में फोटोग्राफर है. नवाजुद्दीन ने बेहद संजीदगी से रितेश बत्रा के निर्देशन में रफ़ी के किरदार को निभाया है.

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विशु सेजवालनई दिल्ली, 15 March 2019
Review: कर्ज में डूबे फोटोग्राफर के रूप में दिल जीत ले जाते हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी नवाजुद्दीन सिद्दीकी और सान्या मल्होत्रा
फिल्म: फोटोग्राफ
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सान्या मल्होत्रा
निर्देशक: रितेश बत्रा

साल 2012 में रितेश बत्रा ने फिल्म लंचबॉक्स के जरिए चिट्ठियों से पनपी दो अजनबियों की प्रेम कहानी को बयां किया था. वो दौर ऐसा था जब देश के उम्रदराज़ मिडिल क्लास लोग ईमेल और एसएमएस जैसी सुविधाओं के साथ बहुत सहज नहीं थे. राहुल बोस की कमाल की फिल्म "द जैपनीस वाइफ" में भी कुछ ऐसा ही कॉन्सेप्ट था.

7 साल बाद जब सोशल मीडिया जैसी चीज़ें भारत के एक तबके के लिए आम होती जा रही हैं, जब हर दूसरा शख़्स यूट्यूब पर अपना चैनल खोलकर स्टार बनना चाहता है और इंस्टाग्राम पर मनमोहक तस्वीरें डालकर मिनी सेलेब्रिटी बनने के ख्वाब संजोएं बैठा रहता है, ऐसे आपाधापी वाले दौर में रितेश एक बार फिर दर्शकों को कुछ साल पीछे ले जाते हैं. उनके निर्देशन में बनी फोटोग्राफ आपको थोड़ा ठहरने और ज़िंदगी की छोटी चीज़ों में खुशियां ढूंढने के लिए प्रेरित करती है.

उत्तर प्रदेश का रहने वाला रफी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) कर्ज में डूबा है. अपनी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए गेटवे ऑफ इंडिया पर लोगों की तस्वीरें खींचता है. एक सेल्समैन की तरह ही वो लोगों की तस्वीरें खींचने के लिए शब्दों के मायाजाल की लुभावनी मार्केटिंग करता है और ऐसे ही एक दिन वह मिमोनी (सान्या मल्होत्रा) से टकरा जाता है. वह कहता है -

"आप सालों बाद जब ये फोटो देखेंगी, तब आपको आपके चेहरे पर यही धूप दिखाई देगी. आपके बालों में ये हवा और कानों में हज़ारों लोगों की आवाज़ें हमेशा के लिए सब चला जाएगा."

मिमोनी, मुंबई में मिडिल क्लास गुजराती लड़की है. बिल्कुल सीधी-साधी, पढ़ाई में ध्यान देने वाली और प्यार-मोहब्बत से दूर रहने वाली लड़की. लेकिन रफी का ये डायलॉग सुनकर वह ठिठक जाती है. वो फोटो तो खिंचवा लेती है, लेकिन उसका भुगतान नहीं कर पाती. वहीं रफी की दादी अपने पोते को घर बसाते हुए देखना चाहती है. वो इस कदर रफी के पीछे पड़ चुकी है कि दवाई ना लेकर उसे ब्लैकमेल तक करती है.

अपनी दादी को टरकाने के लिए रफी कहता है कि उसे मुंबई में एक लड़की मिल चुकी है. इस बात से उत्साहित दादी मुंबई पहुंचती है. अब लड़की की तलाश में रफी एक बार फिर मिमोनी को खोजता है. मिमोनी रफ़ी की मुलाक़ात कैसे होती है और कहानी में क्या क्या होता है, इसके लिए फिल्म देखने जाना होगा.

रितेश बत्रा को वास्तविक और रिलेटेबल किरदारों को लिखने में महारत हासिल है. वे अपने चिर-परिचित अंदाज़ में दो बेमेल लोगों के मिलन को खूबसूरत अंदाज में पेश करते हैं. फिल्म की रफ्तार कुछ लोगों को काफी बेसब्र कर सकती है. क्योंकि फिल्म के दोनों मुख्य किरदार भावनात्मक उफानों से भरे सीन्स में भी किसी ड्रामेटिक अंदाज में नजर नहीं आते. इन किरदारों को कहीं बहुत जल्दी जाने, पहुंचने, अपने मन का गुबार निकालने की तड़प या अस्तित्ववादी सवालों की झुंझलाहट जैसी समस्या नहीं है.

अपनी क्लास और दायरे के भीतर रहकर ही ये किरदार व्यवहार करते हैं. ऐसे में बॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फिल्मों के आदी हो चुके कुछ लोगों को फिल्म बेहद धीमी लग सकती है. फिल्म के कुछ एलिमेंट्स सोफिया कोपोला की फिल्म "लॉस्ट इन ट्रांसलेशन" की याद दिलाते हैं जिसमें बिना लाग-लपेट और ड्रामा के एक बेमेल जोड़ी की यात्रा को दिखाया गया था.

फिल्म में यूं तो गाने नहीं हैं, लेकिन 60-70 के दशक के रेट्रो सदाबहार गाने फिल्म में एक किरदार की तरह प्रभावी नज़र आते हैं. खासकर "तुमने मुझे देखा" और "नूरी" गाने को जिन सीन्स में इस्तेमाल किया गया है, उससे रितेश की निर्देशन की काबिलियत का पता चलता है. क्रिस्टोफर नोलन की फिल्मों का क्लाइमैक्स पेचीदा और अस्पष्ट होता है, लेकिन रितेश बेहद साधारण सब्जेक्ट और कम जटिल किरदारों के साथ भी फिल्म के क्लाइमैक्स में ऐसी संशयात्मक स्थिति क्रिएट कर जाते हैं कि दर्शकों को निर्देशक की राइटिंग की जगह अपने परसेप्शन पर निर्भर होना पड़ता है.

हालांकि फिल्म की राइटिंग थोड़ी बेहतर हो सकती थी. ये फिल्म लंचबॉक्स की तीव्रता और उसके स्तर से थोड़ा पीछे रह जाती है.

बालासाहेब ठाकरे के रोल के ठीक बाद नवाज को इस रोल में देखना अच्छा लगता है. नवाजुद्दीन रितेश की फिल्म लंचबॉक्स में भी एक साधारण मिडिलक्लास इंसान के रूप में नज़र आए थे. उस रोल को उनके फिल्मोग्राफी के सबसे बेहतरीन रोल में शुमार किया जाता है. हालांकि इस किरदार में उनकी पिछली कई मेनस्ट्रीम रोल्स जैसा चटकीलापन नहीं है. लेकिन कर्ज में डूबा और अपने दिल में तमाम तरीके की परेशानियां लिए रफी थोड़े संवाद और भावशून्य अंदाज़ के साथ अपनी बात कह जाते हैं.

सान्या शुरुआत में नवाज के सामने अंडरप्ले करती हुईं लगती है. मगर फिल्म बढ़ने के साथ ही वे सहज हो जाती हैं. अगर उनके रोल को थोड़ा और बेहतर लिखा जाता तो ये सान्या का सबसे यादगार कैरेक्टर हो सकता था. विजय राज अपने छोटे से कैमियो में छा जाते हैं. वहीं नवाज की दादी (फारुख जफर) जब-जब स्क्रीन पर आती हैं, अपने डायलॉग्स से  माहौल बना देती हैं. नवाज के अपनी दादी के साथ संवाद बेहतरीन हैं. फिल्म में जिम सरब का कैमियो भी अच्छा है.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी की एक्टिंग और रितेश बत्रा की मुंबई को लेकर डिटेलिंग देखने के लिए ये एक जरूरी फिल्म है. रियलिस्टक मिडिल क्लास किरदारों की एक अनूठी प्रेम कहानी देखना चाहते हैं तो ये फिल्म आपके लिए है. लेकिन अगर आप मसाला फिल्में पसंद करते हैं तो भी इस फिल्म को देखने के लिए जा सकते हैं. बस एक जरूरी शर्त यह होगी कि आप फिल्म देखते हुए धीरज रख सकें.

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