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कश्मीर की पाबंदी-गौरक्षक और बलूचिस्तान: ‘द फैमिली मैन’ में गूंजी इन मुद्दों की आवाज़

मनोज की वेबसीरीज़ द फैमिली मैन की इन दिनों काफी चर्चा हैं, लगातार सोशल मीडिया पर इसका जिक्र जारी है, रिव्यू लिखे जा रहे हैं. कोई तारीफ कर रहा है और कोई इसे उम्मीदों से अलग बता रहा है. लेकिन इस सीरीज़ में कई ऐसे मसलों को छुआ गया है, जो आज के वक्त में बिल्कुल सही बैठते हैं.

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aajtak.in
मोहित ग्रोवर नई दिल्ली, 25 September 2019
कश्मीर की पाबंदी-गौरक्षक और बलूचिस्तान: ‘द फैमिली मैन’ में गूंजी इन मुद्दों की आवाज़ द फैमिली मैन में मनोज वाजपेयी

  • अमेज़न प्राइम की नई वेबसीरीज़ द फैमिली मैन
  • मनोज बाजपेयी निभा रहे मुख्य किरदार
  • कई सामाजिक मसलों को सीरीज़ में दिखाया

‘सिनेमा समाज का आईना होता है, वही दिखाता है जो समाज में हो रहा है’, अक्सर यही बातें कही जाती हैं. हाल ही में आई मनोज बाजपेयी की वेबसीरीज़ ‘द फैमिली मैन’ की इन दिनों काफी चर्चा हैं, लगातार सोशल मीडिया पर इसका जिक्र जारी है, रिव्यू लिखे जा रहे हैं. कोई तारीफ कर रहा है और कोई इसे उम्मीदों से अलग बता रहा है. लेकिन इस सीरीज़ में कई ऐसे मसलों को छुआ गया है, जो आज के वक्त में बिल्कुल सही बैठते हैं. फिर चाहे जम्मू-कश्मीर में लगी हुई पाबंदियां हो या राष्ट्रवाद पर छिड़ी बहस हो या फिर 15 लाख के जुमले पर किया गया एक तंज ही क्यों ना हो.

अमेज़न प्राइम पर हाल ही में आई ‘द फैमिली मैन’ में कुल दस एपिसोड हैं, जिनमें एक कहानी दिखाई गई है. मनोज बाजपेयी इस सीरीज़ में NIA के एक अधिकारी का किरदार निभा रहे हैं. सीरीज़ में कुछ सीन या मुद्दे ऐसे उठाए गए हैं, जो आज के हालात से ठीक मेल खाते हैं.

कश्मीर का मसला

वेब सीरीज़ पूरी तरह से आतंकवाद पर आधारित है, जिसका सिरा मुंबई से शुरू होकर कश्मीर तक जाता है. मनोज बाजपेयी का किरदार मुंबई होते हुए दिल्ली फिर कश्मीर पहुंचता है. कश्मीर के सिरे को काफी बारीकी से दिखाया गया है, जिसमें किस तरह वहां पर जांच एजेंसी और स्थानीय पुलिस आतंकियों को तलाशती है और आतंकियों का एनकाउंटर किया जाता है. गांव वालों के द्वारा किसी आतंकी का बचाव करना, पुलिस पर पत्थरबाजी कर देना भी सीरीज़ में दिखाया गया है.

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बलूचिस्तान

जम्मू-कश्मीर से जब से अनुच्छेद 370 को हटाया गया है, तभी से बलूचिस्तान के मसले पर भी बहस जारी है. भारत की ओर से इस मसले को बार-बार उठाया जाता है और पाकिस्तान पर निशाना साधा जाता है. सीरीज़ में इसी को भुनाया भी गया है कि दिखाया गया है कि किस तरह भारत की पकड़ बलूचिस्तान पर है, वहां भारत के एजेंट काम करते हैं. बलूचिस्तान के इलाके को पाकिस्तान में आतंकियों का अड्डा दर्शाया गया है.

गौरक्षक और बीफ

गौरक्षा और बीफ को लेकर पिछले पांच साल में भाजपा की सरकारें विपक्ष के निशाने पर आई हैं. इस मसले का इस्तेमाल कहानी में शानदार तरीके से किया गया है, फिर चाहे हिंदू नेताओं के भड़काऊ भाषण हों या फिर आतंकी हमले या बीफ के शक में कथित गौरक्षकों के द्वारा की गई हत्या.

राष्ट्रगान और मुस्लिम की पिटाई

सिनेमा घरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजने पर काफी विवाद हुआ, लोगों में देशभक्ति का अलग ही जोश पैदा किया गया. लेकिन अगर राष्ट्रगान के दौरान कोई खड़ा ना हो, तो उसपर डर बना रहता है वो भी भीड़ का डर. इस भीड़ के डर को निर्देशक ने फिल्म में दिखाया भी है.

कॉलेज में छापे और एंटी नेशनल

कुछ छात्रों के द्वारा की जा रही संदिग्ध गतिविधियों के शक पर एक स्कूल में पुलिस के द्वारा छापे मार देना और फिर छात्रों को एंटी नेशनल बता देना. सीरीज़ में इस मसले को काफी सही तरीके से भुनाया गया है, सीरीज़ का ये हिस्सा आपको दिल्ली की JNU में हुए नारेबाजी के विवाद की याद दिलाता है.

इसे देखना मत भूलना...

सीरीज़ में एक सीन है, जहां मनोज बाजपेयी और गुल पनाग श्रीनगर की मशहूर लालचौक पर रात को चाय पी रहे हैं. इसी दौरान चर्चा चलती है घाटी में सेना की मौजूदगी पर.

मनोज बाजपेयी को जवाब देते हुए गुल पनाग कहती हैं, 'अफस्पा के दम पर हम कुछ भी कर सकते हैं, नतीजा उनकी तरफ से अटैक होता है और हम कर्फ्यू लगाते हैं. उनको दबाया जा रहा है, कीमत बच्चों को चुकानी पड़ रही है. किसी को खुलकर आज़ादी से जीने ना देना, अगर जुल्म नहीं है तो क्या है? इस खेल में कई खिलाड़ी हैं जिनमें पाकिस्तान-ISI-नेता-राज्य सरकार और केंद्र की सरकारें शामिल हैं, समझ नहीं आता कि क्या हो रहा है लेकिन पिसती सिर्फ कश्मीर की जनता ही है. अगर उनके नजरिए से देखो तो हमारे में और आतंकियों में फर्क ही क्या है'.

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