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सैक्रेड गेम्स 2 : कलियुग से सतयुग की हैरतअंगेज न्यूक्लियर यात्रा, देश का सर्वश्रेष्ठ शो

सैक्रेड गेम्स सीजन 2 लगभग आठ घंटे की ऐसी ट्रिप है जो आपको ना केवल अपने मन के भीतर झांकने पर मजबूर करेगी बल्कि एक चेतावनी देती हुई नज़र आएगी कि अगर धार्मिक अंधता और अपने कॉमन सेंस को इस दौर में भी इग्नोर करते नजर आए तो वापसी की राह नामुमकिन होती चली जाएगी.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 16 August 2019
सैक्रेड गेम्स 2 : कलियुग से सतयुग की हैरतअंगेज न्यूक्लियर यात्रा, देश का सर्वश्रेष्ठ शो सैक्रेड गेम्स 2 का पोस्टर
फिल्म: सैक्रेड गेम्स 2
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सैफ अली खान, पंकज त्रिपाठी, रणवीर शौरी, अमृता सुभाष
निर्देशक: अनुराग कश्यप/नीरज घेवान

'जब दुनिया में सब कुछ निरर्थक लगने लगे तो नए अर्थों की तलाश जारी हो जाती है'

फिल्ममेकर स्टैनली क्युब्रिक समेत दुनिया के महानतम आध्यात्मिक गुरु इस दौर के शून्यवादी और सच की तलाश में निकले लोगों को इसी तरह का सात्विक मार्ग सुझाते आएं हैं. लेकिन अगर किसी इंडिविजुअल की आंतरिक यात्रा और निरर्थक और अर्थ की तलाश से दूर उस 'अर्थ' के बारे में सोचा जाए जो लगातार अमानवीयता के चलते संघर्ष कर रही है तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

कितने ही ऐसे लोग हैं जो कहते मिल जाएंगे कि दुनिया कल खत्म होती है, आज हो जाए मेरी बला से...

कितने ही लोग ऐसे हैं जो एक नए जहान को देखना चाहते हैं, एक ऐसी जगह जहां सुकून हो, प्रगतिशीलता हो, जीने का सलीका हो, जहां ना दुख हो, ना हार हो... भारत यूं भी विश्व के सबसे 'डिप्रेसिंग' देश में शुमार किया जाता है.

लेकिन क्या इस आभासी और मायावी दुनिया के लिए ये लोग वर्तमान की दुनिया को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं?

सेक्रेड गेम्स सीजन 2 लगभग आठ घंटे की ऐसी ट्रिप है जो आपको ना केवल अपने मन के भीतर झांकने पर मजबूर करेगी बल्कि एक चेतावनी देती नजर आएगी कि अगर धार्मिक अंधेपन और कॉमन सेंस को इस दौर में भी इग्नोर किया गया तो वापसी की राह नामुमकिन होती चली जाएगी.  

दूसरे सीजन की कहानी

गणेश गायतोंडे (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) इंस्पेक्टर पारूलकर और ईसा से बदला लेने के लिए तड़प रहा है. उससे मिलने एक रॉ एजेंट केडी यादव पहुंचती है जिसके सहारे गायतोंडे केन्या में अपना स्रामाज्य चलाने लगता है. केडी यादव, गायतोंडे के सहारे किसी भी तरह पाकिस्तान के खतरनाक आतंकवादी शाहिद खान को पकड़ना चाहती है. वो भारत में कई आतंकी हमलों में शामिल रह चुका है. केडी यादव के लिए काम करते हुए गायतोंडे का दम घुटने लगता है और गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) से मुलाकात के बाद गायतोंडे की जिंदगी की दिशा बदल जाती है.

गायतोंडे को गुरूजी के साथ एक ऐसा कॉस्मिक कनेक्शन फील होता है जो उसे दुनिया में किसी इंसान के साथ महसूस नहीं होता है. वही सेक्रेड गेम्स 1 से शुरू हुई पॉलिटिक्स अब देश से आगे निकल इंटरनेशनल हो चुकी है. अमेरिका की आर्थिक मंदी, मिडिल ईस्ट के सिविल वॉर, ओसामा बिन लादेन और 9/11 जैसे कई प्रसंग इस बार शामिल किए गए हैं.

गायतोंडे केन्या छोड़कर गुरुजी की शरण में चला जाता है और क्रोएशिया में उनके एक प्रलयकारी प्रोजेक्ट का हिस्सा बनता है. प्रोजेक्ट सतयुग के इस भयंकर युद्ध में जहां गुरूजी के मार्गदर्शन में कुछ लोग अहं ब्रहास्मि का विचार दिमाग पर हावी किए हुए हैं वही दूसरी तरफ मौजूद है तमाम गलतियों से भरी, हताश और निराशा ये दुनिया.

उधर, सरताज सिंह (सैफ अली खान) को पता चलता है कि मुंबई में न्यूक्लियर अटैक होने वाला है जिसमें रसूखदार नेता से लेकर पुलिस और आईएस भी शामिल है. वो अपनी टीम के सहारे इस हमले को रोकने की कोशिश करता है. लेकिन क्या वो इस दुनिया को बचा पाता है? उससे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये दुनिया बचाने लायक है?

सशक्त हैं सभी किरदार

गुरुजी का किरदार निर्विवाद रूप से पंकज त्रिपाठी की जिंदगी का सबसे यादगार किरदार है. एक ही समय पर ये कैरेक्टर इतना डार्क और सटल है कि कहीं-कहीं पंकज भी इस किरदार में जूझते दिखते हैं. एक महाशातिर आध्यात्मिक गुरु जो धरती पर पैदा नहीं बल्कि अवतरित हुआ है. जिसे इस दुनिया को लेकर कोई उम्मीद नहीं है. वो एक ऐसा सीक्रेट आध्यात्मिक कल्ट ग्रुप खड़ा करता है जो इस दुनिया को कलियुग से सतयुग ले जाना चाहता है.

सत्ता, अहंकार, भौतिकवाद से दूर, एक ऐसी दुनिया से दूर जहां धर्म, युद्ध, म्यूजिक, यहां तक की प्यार भी कारोबार हो चुका है. वो मानता है कि कैप्टिलिज्म, अहंकार और ग्लोबल वार्मिंग की मारी ये दुनिया अपने आप को खुद ही अनजाने में खत्म कर रही है और गुरुजी अपने ग्रुप के सहारे केवल दुनिया के खात्मे के लिए उत्प्रेरक बनने की कोशिश कर रहे हैं. अपनी बीस वर्षों की मेहनत के बाद वे एक कालग्रंथ भी तैयार कर चुके हैं जो लोगों को सतयुग में जीने का सलीका सिखाएगा. माइंड कंट्रोल और आध्यात्मिक आतंकवाद का इससे बड़ा नमूना इससे पहले शायद ही किसी फिल्म में देखा गया है.

दूसरे सीजन में कई सीन्स ऐसे हैं जो आपको डिस्टर्ब भी कर सकते हैं. मसलन गुरुजी और गायतोंडे के बीच 'पंकजासन' के दौरान नवाजुद्दीन की एक्टिंग आपको डराने के साथ ही साथ हैरान करती है. इस सीजन में गौच्ची नामक ड्रग ने भी सिनेमाटोग्राफी को मौका दिया है स्क्रीन पर जमकर रंग भरने का. 60 के दशक में अमेरिका के साइकेडेलिक कल्चर की याद दिलाते इस ड्रग को लेने पर सरताज से लेकर गायतोंडे तक, भूतकाल के अपने शैतानों से संघर्ष करते नज़र आते है. इस ड्रग का ये अलौकिक कल्चर कई सभ्यताओं में फैला है जिस पर फिर कभी बात हो सकती है.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी पिछले कुछ समय में टाइपकास्ट हुए हैं और कई बार ऐसा होता है कि उनका अभिनय चौंकाता नहीं हैं. लेकिन सेक्रेड गेम्स 2 देखकर नवाज के आलोचक भी उनके अभिनय की रेंज को देखकर चौंकेंगे. बदला लेने की तड़प में बैठे गायतोंडे कैसे अपने अस्तित्व से जुड़े सवालों को ढूंढता है और लगातार बदलते अपने किरदार में वे अपना दबदबा बनाए रखते हैं. भगवान बनने के बाद भी गायतोंडे कितना असुरक्षित है, ये उसे गुरूजी की शरण में जाकर ही मालूम चलता है. गैंग्सटर के तौर पर वो अपनी इगो डेथ के बाद एक नया जीवन पाता है जिसे अंत में एहसास होता है कि उसे भले ही दुनिया से कोई मतलब ना हो, लेकिन वो बंबई को कितना चाहता है. इस सीरीज को देखने के बाद वाकई ये एहसास होगा कि अनुराग कश्यप के लिए नवाजुद्दीन सिद्दीकी कुछ भी कर सकते हैं.

वहीं सरताज के रोल में सैफ अली खान नाजुक इमोशनल हालातों में हैं. एक ऐसा शख्स जिसकी जिंदगी से धीरे धीरे सब खत्म होता जा रहा है और जो अंजाने में ही सही साध्वी बेत्या के साथ अपने अंदरूनी जख्मों को कुरेदता है. सरताज इस सीरीज में अपने पिता के आदर्शों पर चलने की भरसक कोशिश में लगा हुआ है. सीरीज के क्लाइमैक्स में नवाजुद्दीन और सैफ अली खान फाइट क्लब के एडवर्ड नोर्टन और ब्रैड पिट जैसा कुछ करिश्मा कर जाते हैं. इस सीरीज का क्लाइमैक्स रोंगटे खड़े करने वाला है, जिससे लगभग वैसी ही उत्सुकता पैदा होती है जैसा क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म इनसेप्शन के क्लाइमैक्स को देखकर हुई थी.

इस सीजन की सबसे सशक्त महिला के रूप में केडी यादव (अमृता सुभाष) हैं. सुभाष एक भरोसेमंद मराठी एक्ट्रेस रह चुकी हैं और रमन राघव 2.0 में नवाज की बहन के किरदार में अपनी एक्टिंग से लोगों को हैरान भी कर चुकी हैं खासकर वे जिस बेबसी के साथ रोती हैं. केडी यादव का रोल इतना पावरफुल है कि गायतोंडे उससे डरता नहीं है बल्कि उसकी इज्जत करता है.

फिलीस्तीनी मां से पैदा हुई कल्कि की जिंदगी ही कॉन्फ्लिक्ट यानि द्वंद्व से भरी हुई है. वो अपने दौर में ऐसी त्रासदियों से गुजरी है कि उसे यकीन हो चला है कि इस दुनिया में बचाने लायक कुछ भी नहीं है. वो अपनी मन की शांति कई डगर घूमती है और आखिरकार उसकी यात्रा गुरूजी पर आकर खत्म होती है. एक अतिशून्यवादी महिला जिसके मंसूबे उसकी नजरों में भले मासूम हों, लेकिन दुनिया के लिए खतरनाक हैं. वो एक ऐसे ग्रुप का प्रतिनिधित्व करती है जो अपने आपको एनलाइटन्ड मानते हैं और एक नई दुनिया के नए उत्तराधिकारी के तौर पर अपने आपको देखते हैं.

गायतोंडे के लव इंटरेस्ट के तौर पर जोजो भी डिप्रेशन से जूझती और ग्लानि से भरी महिला है जो अदाकारा बनने का सपना लिए मुंबई पहुंचती है, लेकिन मायानगरी की डार्क रियैल्टी से सामना होने के बाद जीने की उम्मीदें छोड़ने लगती है. नवाज और जोजो के बीच के संवाद एक ट्रैजिक लवस्टोरी जैसे लगते है. हालांकि जोजो का एक खुलासा नवाज का दिल तोड़ कर रख देता है.

बंटी का इस सीजन में खास रोल नहीं है. हालांकि अपने चिर परिचित अंदाज में बोले गए उसके डायलॉग्स एक बार फिर सोशल मीडिया पर छा सकते हैं. लेकिन जैसा कि गायतोंडे कहता है कि ये खेल इन सब चीजों से बहुत बड़ा है. इस सीजन में गुरुजी का चेला त्रिवेदी और गृहमंत्री भोंसले इस देश के करप्ट सिस्टम के वो प्यादे हैं जो समय आने पर राजा बनकर खेल पलट सकते हैं. मॉर्डन दौर के ये वो शैतान चेहरे हैं जिनमें रत्तीभर भी मानवता नहीं बची है. इनसे आप नफरत करना चाहते हैं और अपने शानदार अभिनय से वे ऐसा कराने में सफल रहते हैं.

इंस्पेक्टर पारूलकर का किरदार क्लाइमैक्स तक आते-आते अपने लिए तमाम संवेदना पैदा करा जाता है. ये तीनों ही मंजे हुए कलाकार हैं और इस सीजन के बाद भोंसले और पारूलकर बॉलीवुड के नए भरोसेमंद कैरेक्टर एक्टर बन कर उभर सकते हैं.  

सीजन 1 की तुलना में माजिद की जिंदगी के उतार-चढ़ाव के चलते ये केरेक्टर भी पॉजिटिव छाप छोड़ जाता है. पहले सीजन में पारूलकर के पीछे पीछे नजर आने वाला माजिद जब ऐसा करने की असल वजह बताता है तो आपको एहसास होता है कि भारत में कमोबेश बेहतर स्थिति में होने के बावजूद लोग अपनी आइडेंटिटी के चलते लोगों को किस तरह का बलिदान देना पड़ता है.  

शाहिद खान और मैल्कम के रोल में रणवीर शौरी और ल्युक केनी खूंखार लगते हैं. अपने इरादों को पूरा करने के लिए ब्रेनवॉश इंसानों के तौर पर वे एकदम फिट बैठते हैं. गजवा-ए-हिंद का सपना पूरा करने के लिए तत्पर शाहिद खान का जब सरताज सिंह के साथ कनेक्शन सामने आता है तो जाहिर होता है कि कैसे नफरत की आग में इंसान सारी हदें पार कर सकता है.

एक ऐसे दौर में जब फिलीस्तीन-इजरायल, भारत-पाकिस्तान, उत्तर और नॉर्थ कोरिया जैसे द्वंद्व पूरी दुनिया के लिए नफरत का ट्रिगर बन सकते हैं, एक ऐसे समय में जब इंटरनेट पर धार्मिक प्रचार, ग्लोबल वार्मिंग, धार्मिक उन्माद के कारण पूरी दुनिया में एक अलग तरह की तानाशाही नजर आ रही है, एक ऐसे कलियुग में जहां अहंकार, बाजारवाद, हेट का कारोबार हावी है, उस दौर में किसी के लिए भी इस दुनिया के खात्मे का अध्याय लिखकर इसे और भी बेबस, लाचार और मानवताहीन बनाया जा सकता है.

सवाल ये है कि क्या हम ऐसी स्थिति चाहते हैं? क्या हम अपने कृत्यों के सहारे अपने आपको धीमी मौत के लिए धकेलना चाहते हैं? क्या हम तमस के अंधकार में जीकर अपने आपको खो देना चाहते हैं क्योंकि अगर वाकई खोना ही जीवन का असली रस है तो हमें तैयार रहना चाहिए. क्योंकि धरती पर हम रहे ना रहें, समय मौजूद रहेगा उसी रेडियोएक्टिव की तरह जो घटता है और बढ़ता है... अनंतकाल के लिए.

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