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नागरिकता कानून: पूर्वोत्तर और बाकी राज्यों में अलग-अलग हैं विरोध की वजह

बिल पास होने के बाद जो हिंसक विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर के राज्यों में शुरू हुआ था, अब वह देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया है. पूर्वोत्तर के राज्यों को एक ओर जहां अपनी अस्मिता की चिंता है, तो देश के अन्य राज्य इस कानून को ही गैर-संवैधानिक करार दे रहे हैं.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 16 December 2019
नागरिकता कानून: पूर्वोत्तर और बाकी राज्यों में अलग-अलग हैं विरोध की वजह नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ हिंसक हुआ प्रदर्शन (फोटो: PTI)

  • नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ देश में प्रदर्शन
  • दिल्ली में रविवार को हुआ हिंसक प्रदर्शन
  • पूर्वोत्तर से दिल्ली तक सड़क पर उतरे छात्र

दिल्ली से लेकर असम तक, उत्तर प्रदेश से लेकर बेंगलुरु-मुंबई तक हर जगह नए नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है. मोदी सरकार के द्वारा इस बिल को पास तो करा लिया गया है, लेकिन अब देशभर में इसका विरोध हो रहा है. बिल पास होने के बाद जो हिंसक विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर के राज्यों में शुरू हुआ था, अब वह देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया है. पूर्वोत्तर के राज्यों को एक ओर जहां अपनी अस्मिता की चिंता है, तो देश के अन्य राज्य इस कानून को ही गैर-संवैधानिक करार दे रहे हैं.

पूर्वोत्तर में क्यों हो रहा है बिल का विरोध?

नए नागरिकता कानून के तहत बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से आए हिंदू-जैन-बौद्ध-ईसाई-पारसी-सिख शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलना आसान होगा, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्य इसका विरोध कर रहे हैं. दरअसल, पूर्वोत्तर के कई राज्यों का कहना है कि अभी भी बड़ी संख्या में उनके राज्य या इलाके में इस समुदाय के लोग ठहरे हुए हैं, अगर अब उन्हें नागरिकता मिलती है तो वह स्थाई हो जाएंगे.

पूर्वोत्तर के संगठनों का कहना है कि अगर अधिकतर बाहरियों को वहां की नागरिकता मिलती है, तो स्थानीय अस्मिता, भाषा, कल्चर, लोगों पर इसका बुरा असर होगा. इसका अधिकतर विरोध असम में किया जा रहा है.

हालांकि, ये भी बता दें कि पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों/राज्यों को केंद्र सरकार ने इनर लाइन परमिट में रखा है, जिसके कारण ये कानून वहां पर लागू नहीं होता है. इनमें मणिपुर, अरुणाचल, मेघालय के कुछ क्षेत्र शामिल हैं.

पूर्वोत्तर में कई छात्र संगठन इस बिल के खिलाफ सड़कों पर उतरे हुए हैं और केंद्र सरकार से इस कानून को वापस लेने की अपील कर रहे हैं.

अन्य राज्यों में क्या है मुद्दा?

देश के अधिकतर क्षेत्र में इस कानून का विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इस कानून को संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन बताया जा रहा है. संगठनों का तर्क है कि ये बिल संविधान के आर्टिकल 14 के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, यही एक विरोध का असल कारण है. इसके साथ ही तर्क ये भी है कि ये कानून भारत के मूल विचारों यानी गंगा-जमुनी तहजीब का उल्लंघन करता है.

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार देश को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश कर रही है और अपने वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रही है. वहीं दूसरी ओर दिल्ली में हुए हिंसक प्रदर्शन पर दिल्ली की राजनीति गरमा गई है, जिससे बीजेपी बनाम AAP की जंग छिड़ गई है. दिल्ली में अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, ऐसे में इस हिंसक प्रदर्शन का असर चुनावी माहौल में भी दिख सकता है.

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