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Movie Review: घाटी के जरूरी सवाल को अपनी तरह से दिखाती है नो फादर्स इन कश्मीर

इंशाल्लाह फुटबॉल और इंशाल्लाह कश्मीर जैसी डॉक्यूमेंट्री फिल्में बना चुके निर्देशक अश्विन कुमार नो फादर्स इन कश्मीर लेकर हाजिर हैं. आइए जानते हैं फिल्म में किस तरह के मुद्दों को उठाया गया है और कैसी बन पड़ी है नो फादर्स इन कश्मीर...

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समृद्धि घोष [Edited By: मोनिका गुप्ता]नई दिल्ली, 05 April 2019
Movie Review: घाटी के जरूरी सवाल को अपनी तरह से दिखाती है नो फादर्स इन कश्मीर सोनी राजदान
फिल्म: No Fathers In Kashmir
कलाकार: Soni Razdan, Zara Webb, Shivam Raina
निर्देशक: Ashvin Kumar

इंशाल्लाह फुटबॉल और इंशाल्लाह कश्मीर जैसी डॉक्यूमेंट्री फिल्में बना चुके निर्देशक अश्विन कुमार इस बार 'नो फादर्स इन कश्मीर' लेकर हाजिर हैं. अश्विन कुमार ने फिल्म 'नो फादर्स इन कश्मीर' से घाटी में व्याप्त अशांति को संजीदगी से दिखाने की कोशिश की है. हालांकि, जैसे फिल्म में गायब लोगों, अवैध प्रतिबंधों और अवैध धरपकड़ मुठभेड़ों की वास्तविकता को उजागर करने का प्रयास किया गया है, हालांकि इस चीजों के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दे 'पाकिस्तान' को नजरअंदाज कर दिया गया है. शुरुआत में पता चलता है कि कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच रस्साकशी में फंसा हुआ है. दो देशों के बीच संघर्ष ने सैकड़ों हजारों लोगों के जीवन को बर्बाद कर दिया है. आइए जानते हैं कैसी बन पड़ी है फिल्म...

क्या है फिल्म की कहानी?

नो फादर्स इन कश्मीर एक ब्रिटिश-कश्मीरी लड़की 'नूर मीर' (जारा वेब) की कहानी है. फिल्म में नूर अपनी मां और सौतेले पिता के साथ कश्मीर पहुंचती है. यहां वो दादा (कुलभूषण खरबंदा) और दादी (सोनी राजदान) के पास आती है. नूर को बताया गया था कि उसके पापा कई साल पहले घर छोड़कर चले गए थे. लेकिन कश्मीर पहुंचकर उसे पता चलता है कि पिता को कई साल पहले भारतीय सेना ने उठा लिया था और फिर वो कभी घर नहीं लौटे. इसके बाद वो अपने पापा को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़ती है. यहां नूर की मुलाकात माजिद (शिवम रैना) से होती है. माजिद के पिता भी गायब हैं. माजिद और नूर के पापा अच्छे दोस्त थे.

नूर और माजिद की तलाश उन्हें भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर ले जाती है. वहां सेना के जवान उन्हें आतंकवादी समझ कर पकड़ लेते हैं. हालांकि, नूर को ब्रिटिश नागरिकता की वजह से जाने दिया जाता है. लेकिन माजिद को हिरासत में रखा जाता है. इसी के साथ फिल्म में तमाम उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं. क्या नूर हामिद को निर्दोष साबित करके वहां से निकाल पाएगी? या नूर अपने पापा के बारे में कुछ जान पाएगी? ये जानने के लिए फिल्म देखनी होगी. वैसे विस्तार से फिल्म की कहानी आपको देखने-सुनने के बाद ही समझ आएगी.

डायरेक्टर अश्विन कुमार किसी का पक्ष ना लेते हुए कश्मीर में व्याप्त उग्रवाद के पीछे की वजहों का पता लगाने की कोशिश को बखूबी फिल्माते नजर आए हैं. कश्मीर की जटिलता के साथ-साथ इमोशनल कनेक्शन फिल्म को बांधे रखता है. सेना के अधिकारियों द्वारा पुरुषों को पूछताछ के लिए उठाया जाता और फिर वो कभी वापस लौटकर नहीं आते हैं. वहीं परिवार वाले उनके इंतजार में अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं. कश्मीर के गायब हुए पुरुषों के कारण औरतों की हालात विधवा महिलाओं से कम नहीं है.

एक्टिंग

जारा वेब और शिवम रैना ने अपने-अपने किरदार के साथ न्याय किया है. अपनी एक्टिंग से वो लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहे हैं. अश्विन कुमार ने भी फिल्म में अर्शिद के अहम किरदार निभाया है. कुलभूषण खरबंदा और सोनी राजदान ने सधी परफॉर्मेंस दी है.  नताशा मागो, अंशुमन झा, माया सराओ, सुशील दाहिया सभी ने शानदार काम किया है. अपनी-अपनी परफॉर्मेंस में सभी परफेक्ट लगे हैं.

फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा बोरिंग है, क्योंकि उसमें थोड़ा बहुत खिंचाव महसूस होता है. हालांकि, फिल्म का सेकेंड हाफ स्पीड पकड़ लेता है और शानदार बन पड़ा है. कैमरा वर्क काफी अच्छा है. घाटी की वादियों को बहुत ही खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है. हालांकि, कुछ-कुछ सीन में जर्क भी फील होता है. हॉन्टिंग म्यूजिक फिल्म से जोड़े रखता है.

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