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बासुदेव सिंह: सादा जीवन, उच्च विचार

माकपा के एमएलसी बासुदेव सिंह सारी सरकारी सुविधाओं को तिलांजलि देकर सादा जीवन जी रहे.

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aajtak.in
अशोक कुमार प्रियदर्शीपटना, 04 August 2012
बासुदेव सिंह: सादा जीवन, उच्च विचार बासुदेव सिंह

उनके कमरे में तीन बेड हैं, जिसमें से दो बेड पर रात में कौन ठहरेगा, उन्हें नहीं पता रहता. उनके लिए एक बेड आरक्षित है, जिसके आधे हिस्से में किताबें और कागजात हैं तथा बाकी के आधे हिस्से में वे आराम करते हैं. उनसे कोई मिलने आ जाए तो बेड ही कुर्सी बन जाता है. बेड की बगल में जरूरत का सामान रहता है. हर रोज दो चम्मच सत्तू का नाश्ता और कैंटीन का खाना उनकी दिनचर्या है. हम बात कर रहे हैं बिहार विधान परिषद के 86 वर्षीय सदस्य बासुदेव सिंह की, जो पिछले 22 साल से निर्वाचित प्रतिनिधि हैं. लेकिन वे सरकारी बंगले में रहने की बजाए पटना के जमाल रोड स्थित बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ भवन के सात नंबर कमरे में रहते हैं.

ऐसा नही है कि उन्हें बंगला नहीं मिला, बल्कि यह रास्ता उन्होंने खुद चुना है. 1990 में पहली बार जब वे सीपीएम से बेगूसराय के एमएलए निर्वाचित हुए थे तब उन्हें विधायक क्लब में दो फ्लैट आवंटित हुए थे, जिसमें से  उन्होंने एक फ्लैट को पार्टी कार्यालय और दूसरे को जनता के लिए छोड़ दिया था. 1996 में दूसरी बार जब वे दरभंगा शिक्षक स्नातक क्षेत्र से विधान पार्षद निर्वाचित हुए तो उन्हें एक सरकारी बंगला मिला था, लेकिन उसे पार्टी के पूर्व विधायक को रहने के लिए दे दिया, जबकि बंगले का किराया और बिजली के बिल का भुगतान बासुदेव सिंह ही करते  हैं.

उन्हें गाड़ी के लिए पैसे और सुरक्षा के लिए बॉडीगार्ड उपलब्ध कराए गए, लेकिन उन्होंने दोनों लौटा दिया. लिहाजा, वे रिक्शे से ही आते-जाते हैं. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने जमीन और फ्लैट नहीं खरीदे बल्कि पार्टी ऑफिस के लिए जमीन खरीदकर ऑफिस बनवा दिया. विधान परिषद के सदस्य के रूप में मिलने वाली मानद राशि का आधा हिस्सा वे पार्टी लेवी और आधा समाज, परिवार और अपनी मद में खर्च करते हैं. फंड की अनुशंसा जरूरतों के हिसाब से करते हैं, इसलिए कमीशन देकर काम लेनेवालों की भीड़ नहीं रहती.

बेगूसराय जिले के वासुदेवपुर चांदपुरा के किसान बोढ़न सिंह के पुत्र बासुदेव सिंह परिवारवाद में भी नही फंसे. उनकी दो संतानें हैं. बेटा अजय सिंह क्लर्क और पुत्रवधू रेखा देवी लाइब्रेरियन हैं. बेटी मीना देवी को छह माह पहले शिक्षक की नौकरी तब मिली, जब वे रिटायरमेंट की अवस्था में पहुंच गईं.

उनकी यही सादगी उन्हें दूसरों से जुदा करती है. 1990 में छह एमएलए थे, 1995 में चार लेकिन अब वे अकेले हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों में निर्वाचित हुए. लोग उन्हें संत मानते हैं. बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष नरेंद्र कुमार कहते हैं, ''बासुदेव बाबू राजनैतिक संत हैं, जिनकी ईमानदारी और सेवा से लोगों को प्रेरणा लेने की जरूरत है. अब जब लोग राजनीति को कमाई का जरिया मानते हैं, लेकिन वे सेवा का माध्यम.'' सदन में भी उनकी छवि सर्वाधिक सवाल उठानेवालों की रही है, जिसकी तारीफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव करते रहे हैं.

हालांकि वे दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं, लेकिन राज्‍यभर के शिक्षकों की समस्याओं के प्रति गंभीर रहते हैं. बिहार प्रोजेक्ट उच्च विद्यालय शिक्षक संघ के सचिव मिथिलेश कुमार सिन्हा कहते हैं कि वे शिक्षा और शिक्षकों के लिए समर्पित इनसान हैं, जिनके लिए क्षेत्रवाद और पार्टी कोई बाधा नहीं है.'' कुछ लोग उनकी सादगी पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है. वे कहते हैं, ''जितना सम्मान मुझे मिलना चाहिए उससे ज्‍यादा सम्मान समाज से मिल रहा है, मुझे और क्या चाहिए.''

वे शिक्षक से नेता बने हैं. शिक्षकों की समस्या उठाने पर जब एक शिक्षक नेता ने उनकी हैसियत पर सवाल उठाया तब वे चुनाव लड़ने को उतरे, लेकिन उनकी लोकप्रियता के कारण उन्हें पहले ही सचिव मनोनीत कर दिया गया. फिर सीपीएम ने तत्कालीन गृह राज्‍यमंत्री डॉ. भोला सिंह के खिलाफ चुनाव में उतारा, तब उन्होंने साइकिल से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की.

बहरहाल, राजनीति में ऐसा माना जाता है कि पूरी व्यवस्था भ्रष्ट है. लेकिन यह उनकी अवधारणा हो सकती है, जिनकी मुलाकात बासुदेव सिंह जैसे नेता से नहीं हुई है.

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