एडवांस्ड सर्च

देश का वो महान निर्देशक जिसने नेहरू के न्यू इंडिया की कलई उतार दी थी

50 का दशक एक ऐसा दौर था जब सारा देश पंडित नेहरू के गोल्डन इंडिया के खुमार में था. ये वो दौर था जब राष्ट्रवाद की धारा जोरों पर थी और आजाद देश के युवाओं में नए भारत को लेकर तमाम उम्मीदें थीं जो सिनेमा में भी दिखने लगी. इसी मेनस्ट्रीम सिनेमा में गुरुदत्त ने सिनेमाई पर्दे पर उजले भारत की इस तस्वीर के स्याह पहलुओं से रूबरू कराया.

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 10 October 2019
देश का वो महान निर्देशक जिसने नेहरू के न्यू इंडिया की कलई उतार दी थी गुरुदत्त और पंडित जवाहरलाल नेहरू

27 क्लब. ये किसी बार या पब का नाम नहीं है बल्कि उन विख्यात लोगों का एक ग्रुप है  जिसमें दुनिया भर के सबसे ज्यादा मशहूर म्यूजिशियन्स और रेबेल आर्टिस्ट्स का नाम शुमार किया जाता है जिनकी मृत्यु 27 साल की उम्र में हुई थी. इनमें से ज्यादातर आर्टिस्ट्स ऐसे थे जो सत्ता के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन जताते थे और मुख्यधारा से अलग सोच रखने वाले रैडिकल आर्टिस्ट्स के तौर पर पहचाने गए.

महान फिल्ममेकर गुरुदत्त भले ही 39 साल की उम्र में गुजरे हों लेकिन उन्हें कायदे से 27 क्लब में शामिल कर लिया जाना चाहिए क्योंकि सीमित संसाधनों के बीच अपनी मेहनत और जिद के चलते जिस तरह एक सोशल प्रोपगैंडा से भरे दौर में वे बिना प्रभावित हुए अपनी फिल्मों की आत्मा को बचाने में कामयाब रहे, ऐसा केवल रियल आर्टिस्ट्स के मामलों में ही देखने को मिलता है.

50 का दशक एक ऐसा दौर था जब सारा देश पंडित नेहरू के गोल्डन इंडिया के खुमार में था. ये वो दौर था जब राष्ट्रवाद की धारा जोरों पर थी और आजाद देश के युवाओं में नए भारत को लेकर तमाम उम्मीदें थीं. इन्हीं उम्मीदों को अमलीजामा पहनाने के लिए फिल्मों का इस्तेमाल किया जा रहा था. अंग्रेजों से आजादी के बाद उपजी उम्मीदें और पंडित नेहरू के सरकार द्वारा 'इकोनॉमिक ट्रांसफॉर्मेशन और आधुनिकीकरण' वाले नए इंडिया में निराशावाद और अस्तित्ववाद सिनेमा के लिए जगह नहीं थी.

साल 1957 में आई फिल्म नया दौर नेहरुवियन मॉडल का क्लासिक उदाहण कही जा सकती है. इस फिल्म के गांव फलते फूलते और विकास से भरे दिखाई दिए. फिल्म का नायक गर्व के साथ 'ये देश है वीर जवानों का' और 'मेरे देश की धरती' गाने को गुनगुना रहा है. फिल्म की मॉर्डन नायिका शहर से गांव में पहुंचती है. ये वही फिल्म थी जिसमें पहली बार उड़े-उड़े जब जुल्फें तेरी गाने के साथ कोई नायिका खुले तौर पर पहली बार नायक के लिए गाना गा रही थी. गांव में सब कुछ खुशहाल लगता है. मॉडर्न तकनीक के हिमायती नेहरु और मशीनों की खिलाफत करने वाले गांधी के बीच फिल्म ने एक क्रिएटिव संतुलन भी प्रदान किया जिसका सार था कि बिना मशीनों के मॉर्डन होती दुनिया के बराबर खड़ा होना मुश्किल है जो कि कहीं ना कहीं नेहरु के मॉर्डनाइजेशन से मिलता जुलता था.

साल 1960 में आए सॉन्ग 'छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी' हो, या फिर फिल्म हम हिंदुस्तानी का सटल नेशनल्जिम. फिल्म अब दिल्ली दूर नहीं में एक बच्चे द्वारा अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए पंडित नेहरू के पास तक चलने की कोशिश कर दी थी और उस दौर में कई ऐसी फिल्में आई जिसने नेहरुवियन मॉडल को मजबूत करने का काम किया. 

नेहरु के न्यू इंडिया को मिली गुरुदत्त के सिनेमा से चुनौती

हालांकि मेनस्ट्रीम और खुशनुमा सिनेमा के बीच गुरुदत्त ने सिनेमाई पर्दे पर उजले भारत की तस्वीर को गहरे धुंधलके के जरिए तलाशने की कोशिश की. उन्होंने नेहरु के न्यू इंडिया को चुनौती दी और सिनेमा के डार्क रुप से लोगों को रुबरु कराया. उन्होंने अपने सिनेमा के सहारे गरीबी, बेरोजगारी, वेश्यावृति जैसे मुद्दों को छुआ. इटालियन सिनेमा में नियो रियलिस्ट सिनेमा की तर्ज पर ऐसी फिल्में बनाईं जो लोगों को असहज करती थी और उन्हें निराशा के अनंत सागर में ले जाकर  झकझोरती थीं. गुरुदत्त की इन फिल्मों में त्रासदी भरा क्लाइमैक्स होता था और अस्तित्व से जुड़े सवाल होते थे. लेकिन यही फिल्में देश के लोगों के सपनों और उम्मीदों के मुगालते पर पानी फेर रही थी जिससे कड़वे सच को पचा पाना मुश्किल हो रहा था.

गुरुदत्त की फिल्मों में रोमांस ट्रैजिक था. समाज और व्यवस्था द्वारा शोषित किरदार थे, जिनकी रियैल्टी डार्क थी, महत्वाकांक्षाएं केवल गुजारा भर करने के लिए ही सीमित थी. जाहिर है, नए दौर और नए इंडिया की उम्मीदों से भरे उस दौर के लोगों ने सिनेमा के स्याह पहलुओं से दूरी बनाए रखी और उनकी ज्यादातर फिल्में फ्लॉप साबित हुईं. हालांकि वे नेहरुवियन दौर में एक ऑल्टरनेट सिनेमा की नींव रखने में कामयाब रहे. 

गुरुदत्त सामाजिक तौर पर अवेयर तो थे ही, एक फिल्ममेकर के तौर पर भी वे कई स्तर पर ट्रेंडसेटर साबित हुए. उन्होंने अपनी फिल्मों में प्रतीकात्मकता का बेहतरीन इस्तेमाल किया है और कहीं ना कहीं फिल्ममेकिंग को लेकर उस थ्योरी को भी अपने सिनेमा के सहारे मजबूत किया था कि फिल्में विजुएल माध्यम होती है और एक्सपोजिशन यानि डायलॉग्स की मदद लिए बिना भी फिल्म को कई डाइमेंशन में दिखाया जा सकता है.

इसका उदाहरण फिल्म प्यासा में देखने को मिलता है जब विजय और गुलाब के बीच बातचीत का ज्यादातर दौर सीढ़ियों में दिखाया गया है जो उनके बीच श्रेणी व्यवस्था को दर्शाता है. इसके अलावा उन्होंने अपनी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम में एक सॉन्ग में बैकग्राउंड डांसर्स कठपुतलिया या शैडोज की तरह दिखाई देते हैं. गुरुदत्त उस दौर में एक खास किस्म का क्लोजअप शॉट लेते थे जिसे बाद में गुरुदत्त शॉट तक कहा जाने लगा था. इन प्रयोगों को आज दुनिया भर की फिल्मों में इस्तेमाल किया जाता है.

एक विजनरी डायरेक्टर के तौर पर वे जानते थे कि देश अगर अपनी कमियों से दूर भागता रहा तो चीज़ें बद से बदतर हो जाएंगी. वे पारंपरिक माध्यम से आगे बढ़ना पसंद करते थे. उनकी फिल्मों में महिलाओं का किरदार भी काफी चैलेंजिंग होता था और वे अपनी फिल्मों में लाइट्स और शैडो का अद्भुत इस्तेमाल करते थे जिसके चलते उन्हें भारत का ऑर्सन वेल्स भी कहा जाता है और आज भी गुरुदत्त से कई फिल्ममेकर्स और एक्टर्स प्रभावित हैं.

गुरुदत्त ना केवल अपनी फिल्मों बल्कि गानों के सहारे भी नए नवेले आजाद हुए भारत में राष्ट्रवाद की लहर का काउंटर नैरेटिव तैयार कर रहे थे और वे उस दौर के संभ्रांत राष्ट्रवादियों को इस गाने के सहारे चुनौती देते दिखाई दे रहे थे. 

ये कूचे ये नीलम घर दिलकशी के

ये लूटते हुए कारवां जिंदगी के

कहां है मुहाफिज खुदी के

जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay