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Film Review: डियर जिंदगी नहीं यह तो 'आह जिंदगी' है

डायरेक्टर गौरी शिंदे  के निर्देशन में बनी फिल्म 'डियर जिंदगी' रिलीज हो गई है. शाहरुख खान और आलिया भट्ट स्टारर यह फिल्म कैसी है आइए जानते हैं...

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aajtak.in
नरेंद्र सैनी नई दिल्ली, 09 December 2016
Film Review: डियर जिंदगी नहीं यह तो 'आह जिंदगी' है 'डियर जिंदगी'

बॉलीवुड कई बार समय के साथ कदमताल करने की कोशिश करता नजर आता है और वह अच्छा विषय भी उठा लेता है. लेकिन फिर एक समय आने पर ऐसा लगता है कि वह अब भी पहले जैसा ही है और उसमें कुछ नहीं बदला है. जब यह एहसास होता है तो बहुत झटका भी पहुंचता है. अगर ऐसा करने वाला कोई बहुत ही सधा हुआ डायरेक्टर हो और वह भी गौरी शिंदे जैसा जिसने 'इंग्लिश विंग्लिश' जैसी फिल्म बनाई हो तो उससे उम्मीदें दोगुनी हो जाती हैं.

लेकिन 'डियर जिंदगी' पर आकर गौरी बहुत बुरी तरह से निराश करती हैं. वे फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं दे पाती हैं जो बांध कर रख सके और फिल्म शुरू से ही बहुत ज्यादा धीमी और कई एंगल्स में घूमती नजर आती है, और कहीं भी कनेक्ट नहीं कर पाती है. फिल्म में शाहरुख खान अच्छे लगते हैं लेकिन वह सिर्फ आलिया भट्ट को सहारा देते नजर आते हैं. फिल्म स्क्रिप्ट के मामले में बेहद कमजोर और स्पीड तो दम निकाल देने वाली है. कहीं-कहीं ऐसी भी लगता है कि जैसे आधुनिक युवाओं के जीवन को लेकर विज्ञापन दिखाया जा रहा हो, जिसकी अवधि कुछ ज्यादा ही लंबी खिंच गई हो.

कहानी में कितना दम
आधुनिक दौर की लड़की है आलिया भट्ट. जिसे हैंगओवर की तरह इश्क होता है और जो एक झटके में उतर भी जाता है. वह विचारों से आधुनिक है, और अपने दोस्तों को ही अपनी दुनिया और जिंदगी समझती है. लेकिन इश्क का शिकार होने के बाद जब वह टूटने लगती है तो वह दिमाग के डॉक्टर शाहरुख खान के पास पहुंचती है और उनकी शरणागत बन जाती है. फिर डॉक्टर और पेशंट का खेल शुरू हो जाता है. शाहरुख जब भी आते हैं तो अच्छा लगता है लेकिन उनका रोल कुछ ऐसा है जिसका स्कोप कुछ ज्यादा नहीं है. लेकिन शाहरुख दिल जीतने में कामयाब रहते हैं . फिल्म में कसी हुई स्क्रिप्ट और कहानी का अभाव है. यही बात फिल्म को पटरी पर नहीं आने देती है, और फिल्म के तेवर पूरे समय ऑफ रहते हैं.

स्टार अपील
आलिया भट्ट अच्छी अदाकारा है और उन्हें जिस तरह का रोल दिया गया है, उसे बेहद खूबसूरत ढंग से उन्होंने निभाया भी है. हालांकि बीच-बीच में कहीं वह ओवर ऐक्टिंग का शिकार भी लगती हैं, और ऐसा भी लगता है कि डायरेक्टर को समझ नहीं आ रहा है कि उनसे करवाना क्या है. लेकिन कुल मिलाकर वह अच्छी हैं. शाहरुख खान फिल्म का प्लस पॉइंट हैं लेकिन उनके हाथ में ऐसा कुछ नहीं है कि वह फिल्म को दौड़ा ले जाएं. अली जफर अच्छे लगते हैं, उनकी प्रेजेंस बहुत ही प्यारी लगती है. सिंगर का किरदार उन्होंने अच्छा निभाया है. बाकी सभी औसत हैं.

कमाई की बात
'डियर जिंदगी' पूरी तरह से शहरी भारत को केंद्रित में रखकर बनाई गई फिल्म है या कहें मल्टीप्लेक्स के नेचर की फिल्म है. लेकिन इन दिनों नोटबंदी ने तेल निकाल रखा है, ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि ठंडे तेवरों वाली यह फिल्म दर्शकों को किस हद तक सिनेमाघरों तक खींच पाती है. फिल्म में शाहरुख के आने से पहले तक अंग्रेजी का खूब इस्तेमाल है, इसे देखकर यह भी एहसास होता है कि डायरेक्टर ने फिल्म को भारत के ज्यादा अंदरूनी इलाकों तक न ले जाने के बारे में पहले ही सोच लिया था. आजकर जिस तरह की बॉलीवुड की अंग्रेजीदां फिल्में आ रही हैं, उनसे तो ऐसा लगता है कि इन्हें देखने के लिए भी योग्यता कहीं बी.ए. पास न हो जाए. 'डियर जिंदगी' एक औसत फिल्म है, और अंत आते-आते आह भरने पर मजबूर कर देती है.

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