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दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजे गए देवानंद और प्राण

हिंदी फिल्मों से सरोकार रखने वालों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे मशहूर फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में देवानंद और प्राण की खूबसूरत अदाकारी ने मुत्तासिर न किया हो. नायक और खलनायक की भूमिकाओं में दोनो ने इस फिल्म को यादगार बना दिया.

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aajtak.in
प्रज्ञा बाजपेयी मुंबई, 30 April 2010
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजे गए देवानंद और प्राण

हिंदी फिल्मों से सरोकार रखने वालों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे मशहूर फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में देवानंद और प्राण की खूबसूरत अदाकारी ने मुत्तासिर न किया हो. नायक और खलनायक की भूमिकाओं में दोनो ने इस फिल्म को यादगार बना दिया.

दशकों बाद यह दोनो एक बार फिर एक मंच पर एक साथ नजर आए. दोनो को हिंदी फिल्मों में उनके योगदान के लिए क्रमश: 86 और 90 साल की उम्र में दादासाहब फालके पुरस्कार से नवाजा गया. प्राण को फाल्के आइकॅन और बहुमुखी प्रतिभा का सिनेस्टार पुरस्कार दिया गया. वहीं देवानंद को फाल्के रत्न पुरस्कार से नवाजा गया.

पुरस्कार मिलने के बाद प्राण ने कहा कि इतना बड़ा पुरस्कार पाकर वह गौरवान्वित हैं और इस प्यार एवं सहयोग के लिए सिने जगत को धन्यवाद देते हैं. इस मौके पर देवानंद ने कहा, ‘मैं खुद को बहुत खास महसूस कर रहा हूं. मुझे चुनने के लिए मैं अकादमी को सलाम करता हूं. भारतीय सिनेमा जगत से मिले प्यार और अपनेपन के लिए मैं उसे नमन करता हूं.

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल ने दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच गुजरे जमाने के इन दोनो मशहूर सितारों को पुरस्कार प्रदान किया. छगन भुजबल ने इस मौके पर कहा कि प्राण साहब की फिल्में देखने के दौरान मैं उनकी भूमिका से नफरत करता था.

उन्होंने इन चरित्रों को इतनी शिद्दत के साथ जिया की उनके किरदार से लोग नफरत करने को मजबूर हो जाते थे. उन्होंने कहा, ‘मुझे याद है कि देवानंद साहब की फिल्मों को देखने के लिए मैं टिकट खिड़की के सामने लगी लंबी लाइनों में खड़ा होता था. ‘गाइड’, ‘हम दोनों’, ‘खोया-खोया चांद’ जैसी उनकी फिल्में मेरी पसंदीदा हैं.’

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